दर्पण

उत्तुंग हूँ, छूता अम्बर मैं, होता गौरवान्वित हूँ,
हिमाद्रि बन, हिंदुस्तान का दर्पण कहलाता हूँ।

कालजयी हूँ, शाश्वत बन सदियों से गूँजता हूँ,
महाभारत हूँ, कलयुग का दर्पण कहलाता हूँ।

पलता गर्भ हूँ, वक्ष से सिंचित हो चहकता हूँ,
मातृत्व मर्म हूँ, स्त्रीत्व का दर्पण कहलाता हूँ।

धर्म का रूप हूँ, तात के कर्तव्यों का ज्ञाता हूँ,
पुरुषत्व हूँ, मर्यादाओं का दर्पण कहलाता हूँ।

कालखंड हूँ, मानवीय उद्यमों का उद्गाता हूँ,
इतिहास हूँ, भविष्य का दर्पण कहलाता हूँ।

जो जैसा, वैसा ही उसका भेष दिखलाता हूँ,
काँच पे पुते जो पारा, तो दर्पण कहलाता हूँ।

अनेक भावों में, कई शब्दों से बयाँ होता हूँ,
प्रतिबिम्बों को परोसकर दर्पण कहलाता हूँ।

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Author: Gouri (Gourav Anand)

शब्दों को जोड़ तोड़ कर अपने मन में आये हुए विचारों को लिख डालता हूँ। कोई पेशेवर या उच्च कोटि का कवि या लेखक तो नहीं, हाँ पर साहित्यिक और ऐतिहासिक विचारों से प्रेरित जरुर हूँ। Native of silk city Bhagalpur and feel proud to be from a state which is well known for its historical, political and literary significance. By profession a housekeeper and hotelier, Graduated from IHM Pusa, New Delhi. Apart from Hindi and English well fluent in Urdu, Sanskrit and Maithli. Settled in cleanest city of India. Indore, Madhya Pradesh.

19 thoughts on “दर्पण”

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