Camera – नामा ~ 06 (With Captain Cool)

Being hotelier and that to be of a standalone property of its kind in city, gives you certain benefits.

That was a wonderful day and I would say one of the luckiest day of my life, when I got some lovely moments to spend with our own captain cool “MSD”.

And as per the popular beliefs he turned out to be really cool. Have met and seen so many cricketers and celebrities till date but mahi turned out to be totally different.

Love you sir… Will always love to see you playing cricket for our country!!

One of your die hard fan😊😊

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Camera ~ नामा – 05 (कुल्हड़)

Few days back I was travelling back to Indore from my home town. It was just a routine journey which I avail with my annual leaves at least twice a year. So what made this one a little special ?

A small piece of earthen Cup!!

Yes, our previous railway minister Shri Laloo ji has made these earthen tea cups mandatory for tea vendors in railways. I would say it was a brilliant idea both from environmental and economical point of view. But Alas!!! Such a good initiative failed, reason our cheap attachment towards plastics. If those tea vendors and our railway ministry would have shown some responsibility towards society these earthenware would have still been in use and definitely providing bread and butter to poor people involved in its business.

So when my Train was about to reach Jamalpur an old man came selling tea with these cups. I got so delighted that couldn’t resist my self to have one. I just ask that old man why you are still using these cups when rest everyone has started using plastic cups once again. He smiled and replied

“Son I am from a nearby village and there are many friends of mine who use to make these cups, they are also poor as I am. If we would not purchase it, how they are gonna feed their family”

I was left awestruck, he said these beautiful lines before leaving.

“बेटा, जिन्दगी की गाड़ी भी चलती रहनी चाहिये ठीक इसी रेलगाड़ी की तरह तभी मंजिल आती है, और जितना हो सके उतना औरों की भी मदद करते चलो ताकि उनका भी सफ़र आसान बन जाए”

(Wish I would have clicked his pic as well)

~gouri

Camera ~ नामा – 04 ( Independence day)

आज स्वतंत्रता दिवस की तैयारियाँ जोर शोर से चल रही थी, मैं भी उनका हिस्सा था। पर बहुतेरे सवाल मेरे क्षुब्ध मन में डेरा जमाए बैठी थी। किसी भी देश का इतिहास एक लंबा कालखण्ड होता है, हमारे देश का इतिहास भी कोई 5000 वर्ष पुराना है। जिस स्वतंत्रता की बात हम कर रहे है वो तो मात्र पिछले 200 वर्षों की राजनीतिक हलचल की एक परिणीति है। क्या आज से 5000 वर्षों बाद इस 15 अगस्त के वही मायनें होंगे जो आज है, और क्या कभी भूत काल मे इस भारत भूमि पे कोई और दुसरा दिन इतना ही महत्वपूर्ण नहीं रहा होगा,जहाँ इतने राजवंशों का आरम्भ और पतन हुआ । वक़्त किसने देखा है.. इतिहास में नए पन्ने जुड़ते ही रहते, और कुछ जबरन मिटा दिये जाते हैं।

Camera ~ नामा – 03 (साक्षरता)

“अशिक्षा से, धुप्प अंधकारमय जीवन को,
रोशन करती उम्मीद की एक किरण हूँ मैं।
खंडित करती निर्धनता के अभिशाप को,
साक्षरता की हुँकार भरती एक कन्या हूँ मैं।” ~ ग़ौरी

(This picture is from a remote village in Bihar. No school bag, No dress and even no sleepers, but just look at the determination on their face as they are heading towards their school.)

ये तस्वीर काफी मायनों में बिहार की बदलती हकीकत को पेश कर रही हैं, सबने ये ठान लिया है कि सबसे अशिक्षित और गरीब राज्य होने का तमगा अपने राज्य के सर पर से हटाना है। इस कड़ी में कन्याओं का शिक्षित होना एक अहम कड़ी है। यही कन्याएँ कल को एक शिक्षित परिवार और समाज के गठन में सबसे अहम पहलू साबित होंगी।

Also Share your thoughts on this picture☺

~ जय हिंद , जय बिहार!!

Camera – नामा ~ 02 (सूखा कटहल)

अपने आँचल की छाँव तले,
मैंने, एक वक़्त गुजरते देखा है।
रोते, हंसते, या फिर ठिठुरते,
हर राही को पनाह से बक्शा है।

अब निर्जीव बन ठूँठ सा पड़ा हूँ,
फिर भी,
अपनी पहचान संभाले खड़ा हूँ।

~ ग़ौरी

(ये कटहल का सूखा पड़ा पेंड़ मेरे ननीहाल के प्राथमिक स्कूल के प्रांगण में खड़ा है, आज भी बचपन के वो दिन याद है जब इस पेंड़ की छांव में सुनहरे से खुशनुमां पल बीता करते थे, आज इसे सुखा देख दिल पे गहरा आघात सा पहुंचा)😢😢

(Please do share your thought on this picture)

Camera – नामा ~ 01 (जद्दोजहद)

साहेब जी, जिंदगी की जद्दोजहद तो बड़ी लंबी है,
इस सड़क का तो फिर भी अपना एक मुकाम है।

(My thought, share what you think when you look at this pic)

(कभी एक गुजरे वक़्त में ये नंगे पांव इसी कच्चे सड़क पे चला करते थे। आज जब तरक्की के जमाने में इसपर गिट्टी और अलकतरे की परत डल गयी है तो भी ये पांव नंगे हैं। बस मुश्किल ये है उस वक़्त पांव में छाले न पड़ते थे अब आज तो जेठ की दुपहरी में तलवों में फफोले निकल पड़ते हैं)