बूढ़ा बैल!

“अरे मोतिया उठ जाई, ई बीचे दियारवा पे हिम्मत न तोड़ी, ऊ पहाड़ी वाले भोले बाबा की कसम, अब आगे से तू दुवारिये पे रहिये, तोहके नइखे जोतब अब हम टप्परगाड़ी में। हमरे मत्था पाप न ढारि, ऐ मोतिया बस अंतेमे बार उठ जाई” (A)

बेइंतहा गर्मी थी, रामदीन के दो बूढ़े बैलों में से, मोती गश खाकर गिर पड़ा, हीरा भी फ़क़त हाँफ रहा था। बचने की उम्मीद न के बराबर थी। भतीजी की शादी के विदागी के सामानों से बैलगाड़ी पूरी तरह लदा हुआ था, और आज रात का ही लग्न था। दियारा के वीराने में फंस और सांझ उतरता देख रामदीन की धड़कनें और तेज हो गयीं, मोती को हिचकियाँ आने लगी वो उसकी गर्दन पकड़ रोने लगा।

“मोतिया तोहरे बहिनिया के बिहा बा हो, जे ई सामान के साथ न पहुंचब सही घड़िया पे, ते बहुते ऊँच नीच हो जाई, उठ जाई आखिरी बेरिया हमनी के इज्जत रख ली। तू बस भार थम लेहि, धक्का हम लगा देब, मोतिया उठ जाईईईई…!” (B)

तभी कुछ अप्रत्याशित सा घटित हुआ, मोती के शरीर में हलचल हुयी, और वह उठ खड़ा हुआ। दोंनो बैलों के बीच खुद रामदीन गाड़ी को खींचता रहा, देर रात गाड़ी दरवाजे पे आकर खड़ी हो गयी। बारात दरवाजे लग चुकी थी, और कानाफूसीयों से माहौल गर्म था। बैलगाड़ी पे नज़र पड़ते ही ज्वार ठंडा पड़ गया। सिंदूरदान हुआ और शादी समपन्न हुयी।

सुबह सुबह विदागी के मर्मस्पर्शी माहौल में, दरवाजे पे दम तोड़ चुके मोती के पास विलाप करती हुयी दुल्हन को जिसने भी देखा उनके हृदय खंड खंड हो गिर पड़े।

मौलिक एवं अप्रकाशित
©गौरव आनंद
इंदौर, मध्यप्रदेश
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(आंचलिक वाक्यों का हिंदी में अनुवाद)
A – “ओ मोतिया उठ जा, इस बीच दियारे पे हिम्मत न तोड़ो, पहाड़ वाले शंकर भगवान की कसम, अब आगे से तुम केवल दरवाजे पे ही रहना, बैलगाड़ी में नहीं जोतेंगे तुम्हें। मेरे माथे पे यह पाप मत ढोल, ओ मोतीया बस आखिरी बार के लिए उठ जा”
B – “मोतिया तुम्हारे बहन की ही शादी है, सामान अगर सही समय पर नहीं पहुंचा, तो बहुत ऊँच नीच हो जाएगी। उठ जा आखिरी बार हमारी इज्जत रख ले। तुम सिर्फ भार थाम लेना, धक्का हम लगा देंगे, मोतिया उठ जा”

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पारुल – एक लघुकथा!

पारुल आ रही थी कुछ दिनों के लिए। यूँ तो दूरस्थ शिक्षा के अंतर्गत सारी पढ़ाई गाँव में ही रहकर करती थी, पर साल में एक बार आना होता ही था, परीक्षाएँ देने के लिए। इस बार स्नातकोत्तर का अंतिम वर्ष था। पारुल मुझसे तो यूँ चार वर्ष छोटी थी, पर हक मुझ पे बिलकुल बराबरी का रखती थी।

“क्या भैया क्या हाल कर रखा है कमरों का, रेगिस्तान की माफ़िक सिर्फ धूल ही धूल है”
“पर्दे कब धोए थे आखिरी बार, चादर कब से नहीं बदली”
“ढंग के कपड़े तो पहना करो, क्या कहते होंगे मोहल्ले वाले भी” बीते वर्षों की वो सारी नोक झोंक और बातें याद आने लगी, यूँ तो हर बार माँ भी आ ही जाती थी साथ में और बीच बचाव का काम उनके हिस्से था, पर इस बार अस्वस्थता के कारण वो नहीं आ पायीं।

पारुल को अहले सुबह स्टेशन से ला, दफ्तर के लिए रवाना हो गया, महीने के अंतिम दिनों की व्यस्तता की वजह से अवकाश मिलने में मुश्किल आ गयी। मुझे लगा था इस बात पे भी पारुल झगड़ेगी मुझसे, पर आश्चर्य हुआ जब उसने कहा “कोई बात नहीं भैया”। पारुल वाकई में समझदार हो गयी थी या फिर अब वो पहले जैसी बात नहीं रह गयी। रास्ते भर यही सब मंथन चलता रहा और निर्णय लिया चाहे जो हो इस बार लड़ाई नहीं होगी बस थोड़े ही दिनों की तो मेहमान है, इतना सोचते ही आँखें सजल हो उठीं।

शाम को घर आया तो वहाँ का नज़ारा देख बस ठगा का ठगा सा ही रह गया, टेबल, अलमिरे और किताबों के ऊपर जमी हुई धूल की मोटी परत गायब थी। हर समान व्यवस्थित हो अपनी जगह पर रखा हुआ मानों अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध कर रहा हो। बुझी हुई रसोई में एक नई चमक बिखरी गयी थी। भीनी भीनी सी खुश्बू का इल्म हो रहा था हवाओं में। माता रानी के दरबार में ज्योत न जाने आज कितने दिनों के बाद प्रज्वलित हुई होगी।

“भैया चाय पी लो, शहर के दूध की चाय में तो कोई जायका ही नहीं और माँ ने कुछ नमकीन भिजवाया है आपके लिए, लो चखो तो जरा” पारुल की आवाज से तंद्रा भंग हुई। उसने तपाक से यह भी पूछ लिया, “रात के खाने में क्या खाओगे भैया, आलू के पराँठे बना दूँ, तुम्हें तो बहुत पसंद है ना”

रात भर मन मस्तिष्क में अजीब सी उथल पुथल मचती रही, नींद का आँखों से कोई सरोकार न रह गया। सुबह पौ फटते ही पारुल को जगाया “छोटी उठ तो, चाय बना दे जरा, सुबह वाली पहली पैसेंजर से गाँव को जा रहा हूँ,”

पारुल हड़बड़ा कर उठ बैठी, क्या हुआ भैया “माँ तो ठीक है ना, मुझे नहीं आना था उन्हें अकेला छोड़कर, तबियत ठीक नहीं थी उनकी” और जोर जोर से रोने लगी।

“अरे पगली शांत हो जा, देर रात तक वापस आ जाऊँगा आज ही।”

“मतलब” पारुल अवाक हो मुझे घूर रही थी।

“माँ को लाने के लिए जा रहा, जैसे यहाँ शहर के दूध का कोई जायका नहीं, उसी तरह तुम दोनों के बिना, मेरी ज़िंदगी का भी कोई जायका नहीं”

पारुल जो आजतलक सिर्फ नोंक झोंक ही करती रही थी, आज गले से लिपट रो पड़ी।

मेरे बढ़ते कदमों के साथ साथ, नयी सुबह के क्षितिज में भास्कर का भी उदय हो चुका था।

भोला ! एक पुनर्जन्म (कहानी)

परीक्षायें समाप्त हो चुकी थीं, एक हफ्ते पहले ही तृतीय वर्ष का समापन हो चुका था। छात्रावास का आखिरी दिन होने की वजह से चहल पहल भी काफी थी। अधिकांश छात्राओं ने अपना कमरा खाली कर दिया था पर कुछ एक अभी भी रुकी हुई थीं, जो थोड़ी ही देर में अपने अपने गन्तव्य के लिए प्रस्थान करने वाली थीं। माहौल भावुक था, बिछड़ने का गम तो था ही पर साथ ही साथ एक नए सुनहरे भविष्य की खुशियां भी थीं।

इन सब के बीच निहारिका बड़ी विचलित हुई इधर से उधर घूम रही थी, मानो बड़ी बैचनी से किसी को ढूंढ रही हो। भोला कहीं नज़र नहीं आ रहा था, कल के डले हुए बिस्किट पे चींटियों ने अपना हक़ जता दिया था और उसका दूध पीने वाला कटोरा भी कहीं नजर नहीं आ रहा था। आखिर कहाँ गया होगा, आज तीन सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि भोला आंखों से ओझल हुआ हो, ये सोचते सोचते वो अतीत के घटनाक्रम को याद करने लगीं।

तीन साल पहले की बात है, निहारिका के छात्रावास में आये हुए कुछ ही हफ्ते बीते थे और एक दिन सुबह पार्क से लौटते वक्त कुत्ते का एक नन्हा सा बच्चा उसके पीछे पीछे हॉस्टल तक आ पहुंचा। निहारिका द्वारा प्रेम पूर्वक दिए गए एक बिस्किट के टुकड़े के बंधन में वो ऐसा बंधा की फिर वहीं का होकर रह गया। अंदर छात्रावास में लाकर रखने की इजाज़त तो थी नहीं, सो सेक्युरिटी वाले नृपेंद्र चाचा ने निहारिका के आग्रह को स्वीकार करते हुए उसके उठने बैठने और सोने की व्यवस्था मेन गेट पे अपने ही केबिन में कर दी।

गहरे काले रंग और माथे पे चाँद जैसे सफेद निशान की वजह से सबने उसका नाम भोला रख दिया। वक़्त बीतने के साथ साथ भोला पूरे कॉलेज में सबका प्रिय हो गया, पर निहारिका के साथ उसका लगाव सबसे अलग और हटकर था। अहले सुबह जब तक वो खुद अपने हाथों से उसे दूध और बिस्किट न दे देती वो किसी और चीज़ पे मुंह तक भी न डालता। थोड़ा बहुत स्वभाव से जिद्दी जरूर था, पर समय और दैनिक दिनचर्या का भी उसे पूरा भान था। अगर कभी निहारिका को वापस आने में देर हो जाये तो खुद उसे ढूंढता हुआ क्लासरूम के दरवाजे तक आ पहुंचता और चुपचाप वहीं बैठा रहता जब तक कि प्रोफेसर क्लास समाप्ति की घोषणा नहीं कर देते थे।

इन सारे पुराने खयालातों में गुम निहारिका के चेहरे पे शिकन की लकीरें उभर आयी, परेशानी ऐसी जान पड़ी मानों कोई अपना गुमशुदा हो गया हो। गुस्सा थोड़ा बहुत उसे खुद पे भी आया, परसों से ही थोड़ा बदला बदला सा लग रहा था भोला, पर उसने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी इस बात को। सुबह से ही सुस्त और शांत था बस जहाँ जहाँ वो जाती चुपचाप वो भी पीछे पीछे हो लेता। उसे अब भान हुआ मानों वो कुछ कहना चाह रहा था, उसकी वो छोटी सी गोल गोल आंखें बहुत उदास थी उस दिन। क्या बात थी? क्या हुआ होगा..? कहीं भोला….!

निहारिका का दिल बैठ गया, और आँखों में पानी उतर आया। नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा.. पास के मोहल्ले में जरा रम गया होगा अपनी बोरियत मिटाने, उसने अपने मन को झूठी दिलासा देने की भर्शक कोशिश की।

तभी सहपाठी रंजना की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई जो अपना बैग लेकर जाने के लिए तैयार खड़ी थी, ” निहा फिर चल रहीं हूँ, कब से तुम्हें ही ढूंढ रही थी, तुम्हारा भाई भोला भी नज़र नहीं आ रहा, जाने से पहले तुम दोनों से ही विदा लेनी थी”

“हाँ रंजना दो दिन से नहीं दिख रहा, मैं भी उसे ही ढूंढ रही हूँ, आज मुझे भी जाना है, समझ नहीं आ रहा उसे हमेशा के लिए यहीं अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ, बहुत दिनों से यही सोच सोच कर परेशान थी, अब तो पता नहीं कहाँ चला गया” निहारिका ने व्यथित होते हुए जवाब दिया।

दोनों सहेलियों ने गले लग एक दूसरे को भावविह्वल विदाई दी, जाते जाते रंजना कह गयी, “भोला का समाचार कह सुनाना, वरना मुझे भी चिन्ता बनी रहेगी”। उसके जाते ही निहारिका फिर से अपनी छटपटाहट के कैदखाने में कैद हो गयी। तभी उसे नृपेंद्र चाचा आते हुए दिखे, मन में उम्मीद की दबी लौ फिर से जल उठी, शायद उन्हें जरूर कुछ पता होगा। तेज कदमों से चलकर उनके पास पहुँची और एक ही साँस में आतुर हो भोला के बारे में विस्तार से सब कुछ कह सुनाया।

भोला के गुमशुदा हो जाने की खबर से नृपेंद्र चाचा भी थोड़े परेशान से हो उठे और दो दिन पहले के घटनाक्रम को याद करते हुए बोल पड़े “निहारिका बेटे, उस दिन जब शाम के वक़्त मैं घर के लिए निकल रहा था तो भोला मुझे सामने के खेतों से आते हुआ दिखा, पास आया तो देखा उसने मुंह में रुद्राक्ष की एक माला दबा कर रखी थी, वो माला उसने अपने दूध पीने वाले कटोरे में रखा और उल्टे पाँव वापस खेतों की ओर चला गया, मैंने कितनी ही आवाज़ दी पर सिर्फ एक बार पलट कर देखा और जाता रहा। मैंने वो माला सहित उसकी कटोरी यहीं अलमिरे में रख दी थी। ये देखो” इतना कहते ही नृपेंद्र चाचा ने वो कटोरी निकाल के निहारिका के हाथों में दे दी।

रुद्राक्ष की वो माला देख, निहारिका वहीं चक्कर खा फर्श पे बैठ रही। वक़्त के साथ धुंधले पड़ चुके यादों के चित्रफलक पे, पुरानी तस्वीरें खुद बखुद उभरने लगीं। तस्वीरें वो भी ऐसी जो नासूर बन कर हृदय के किसी कोने में छुप कर बैठे हुए थे और मौका मिलते ही आँखों से ऊबकाई बन बाहर आने को बेचैन।


शिवम, बाल्यकाल से ही बुद्धि विवेक से सम्पन्न और पठन पाठन में उतना ही मेधावी । बचपन में ही उसकी योग्यता का संज्ञान लेते हुए प्रधानाध्यापक महोदय ने उसे दो कक्षा की उन्नति दी थी। हर बार कक्षा में प्रथम स्थान मानों उसके लिए पहले से ही आरक्षित हो। पारिवारिक रिश्ते से इतर दोनों सुख दुख में एक दूसरे के पक्के साझेदार थे। खुशियाँ हो दामन में तो वक़्त को भी पंख लग जाते। पर नियति के एक कठोर निर्णय ने इन खुशियों पे ग्रहण लगा दिया।

इस बार कक्षा में निहारिका को प्रथम स्थान मिला था, सभी ने बधाइयां दी पर वो खुश नहीं थी। स्मृति में कैद रह गए थे उसके लिए वो पल जब शिवम के सिराहने बैठ कर उसने कहा था “शिवा तेरे भी अच्छे नंबर आये है” और शिवम ने अपने रूग्ण शरीर की बची हुई सारी शक्ति को समेटकर मुस्कुराने की हर संभव कोशिश की थी। कर्क रोग की वीभत्सता की गवाही जर्जर होता जा रहा उसका शरीर था। पर अभी भी चेहरा सौम्यता और विश्वास से लबरेज, बोल पड़ा “आप देखना बारहवीं में मेरे अंक आपसे ज्यादा होंगे”। उसके इन शब्दों को सुन कर वो नकली हंसी हंस, फिर बाद में फूट फुटकर रोयी थी। कर्क रोग अंतिम चरण में था और अब वापसी की कोई गुंजाइश न थी। शिवम को भी इल्म था अपने सीमित जीवनकाल का, वो तो बस निहारिका और माँ बाबूजी के आँखों से अश्रुओं को बहते हुए नहीं देखना चाहता था।

बारहवीं के रिजल्ट आ गए थे, शिवम का वादा टूट गया था और साथ ही उसके संघर्ष और कष्ट के पूर्ण विराम की घड़ियां भी आ चुकी थीं। अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में बीप बीप करती मशीनों के सहारे अपने अंतिम क्षणों को जी रहा था शिवम। मध्यरात्रि के बाद का वो पसरा सन्नाटा जीवन के ही एक दुखद सच को बयां कर रहा था जिसे जानकर भी सब अनजान बने रहने की कोशिश करते हैं। सिराहने के एक तरफ माँ बाबूजी और एक तरफ निहारिका बस इतने में ही सीमित होकर रह गए थे उसके आखिरी क्षण। चीर निंद्रा के आगोश में समा जाने से पहले एक बार उसने आंखें खोली, एक झलक माँ बाबूजी को देखा और फिर निहारिका की और देखते हुए बोल पड़ा,

“माँ बाबूजी को मेरी कमी न महसूस होने देना”

वो फट पड़ी “तू क्यूँ जा रहा है रे शिवा, तेरे ही आराध्य भोलेनाथ से तो दिन रात तुम्हारी सलामती की दुआ मांगती रही मैं और माँ, वो तो बड़े निष्ठुर निकले! तेरे गैरमौजूदगी में क्लास रूम की दीवारें तो अब काटने को दौड़ेंगी। कॉलेज तक तो साथ निभा देता! बोल मेरी इतनी सी ख्वाईश भी पूरी नहीं करेगा!” कहते कहते निहारिका के स्वर रुंध गए और फिर कुछ न बोल सकी, माँ बाबूजी को भी संभालना था, जिम्मेदारी का वादा शिवम ने ले लिया था।

आज तलक शिवम ने उसे निहा ही कह कर पुकारा था, पर जाते जाते बोल गया

“दीदी, वादा रहा आऊंगा आपसे मिलने” और बस इतना कहते ही उसकी पलकें हमेशा के लिए खामोश हो गयी साँसे जरूर कुछ घंटे और चलती रहीं।

अनाथ पैदा हुआ था शिवम इस दुनिया में। पिताजी के दफ्तर के पास की झाड़ियों में फेंका मिला था। वात्सल्य भाव से घर ले आये थे उसे बाबूजी। पर जाते जाते उसने सबको ही अनाथ कर दिया।


पानी के छींटे पड़े तो होश आया, नृपेंद्र चाचा के जान में जान आयी। निहारिका ने एकटक कटोरी को देखा और रुद्राक्ष की माला लेकर अपने गले में डाल ली। भोलेनाथ का परम भक्त था शिवम, रुद्राक्ष की माला हमेशा उसके गले में ही रहा करती थी।

कहते है प्रेम भाव के बंधन में बंधा इंसान जीवन मरण के चक्र में उलझ कर बार बार जन्म लेने को मजबूर होता है। पर यह पुनर्जन्म अलौकिक था, अपने वादे को पूरा करने के लिये शायद वो भोलेनाथ की अनुमति से फिर इस धरती पे आया था, पर इस बार हमेशा के लिए बंधन मुक्त होकर चला गया था शिवम।

निहारिका के चेहरे पे तृप्ति के भाव थे जाते जाते नृपेंद्र चाचा से कह गयी।

“चाचा भोला अब कभी नहीं आएगा वापस”

-समाप्त-

बाबा ~ चाँद ला दो ना! (लघु उपन्यास, सम्पूर्ण कड़ियाँ)

Repost

Dear all I am really glad to present here the complete story of my short novel “Baba~Chand la do na”. All remaining episodes have also been included so it really took too long for me to get it completed, sorry for the delay. And a special thanks to Gargi Sidana (www.aethist.wordpress.com) for helping me out in drafting a lovely prologue for this novel.


Prolouge

Chori pe umra ka rang utar aya hai
Shiva, haldi ghontne ki taiyari kar lo..

Shrutis dreams got shattered and paralyzed when granny dictated about a perfect match for her Rishta. With broken dreams and wet eyes she was lying on bed finding comfort with pillows. Toddler sibling rahul tried his best to console, by wiping out accumulated tear droplets from her cheeks, but all went in vain. She was in deep slumber as her whole world crashed and darkness got prevailed in her soul. Somewhere in her distant dreams,words of her father Shiv Naranyan singh were echoing..

“Whatever may be the circumstances, but my daughter is going to study.. “

When people are still captivated with aristocratic and narrow mind set as what’s the need to educate daughters, Shiv Narayan singh, the father of three childrens Preeti, Rahul and Shruti strongly defied this logic. Though Shiv narayan singh as fondly called shiv babu is illiterate but knows the importance of education. As a farmer he works hard in small piece of ancestral land to fulfill the needs of his family. Shruti is most embracing child of him in the family. Due to some sort of permanent illness of his wife, Shruti’s fate was forced at a very tender age to manage the duties of a mother, along with that of sister and a daughter as well. Rahul, the youngest one always considered her as his mother instead of the one who gave him birth. She never failed and lapsed in any responsibilities towards family, but unfortunately she never received the affection and love from her own mother and granny which she actually deserved for.

The gleam, charm and lovely features of her face won many hearts and nobody failed to get astonished with her unmasked beauty. Apart from perfection in household works, she always exceled in studies and always used to be a high ranker in government school where she studied. After intermediate, like a young and sincere girl she wanted to go for higher studies but the financial conditions at home was not enabling her to achieve her dreams and along with that was the social stigma as how the girl will stay alone in city away from parents.

But one fine day she couldn’t hold it anymore and gathered all her courage to speak with father

“Papa I want to study further and don’t want to get married right now”

(And then rest became a part of history…)

She always gave priority to her family, the immense love, care and dedication towards family has made her a strong character in this short novel.

Shiv Naranyan singh is a strong, dignified man with determination strength like those of steel, He acted as a strong pillar for Shruti and went beyond his limits to let her achieve her dreams. The impeccable bond of father and daughter has the power to intrigues the reader’s mind. He not only set an example for the society which is infected by the shallow midset of marrying a girl at a young age but also dared to fight for the change.

The train to Allahabad has now dramatically changed the lives of Shiv Narayan’s family. One decision at a right time moulded Shruti’s life. Struggle, hardship, dedication of a beautiful soul Shruti and more than life efforts by a noble man Shiv narayan Singh as her father will put a powerful, long lasting and resonating effect on readers mind. Get yourself immersed in the beautiful story line of this short novel.

प्रथम अध्याय


पहली कड़ी


उसे अपने पांव कुछ उखड़े उखड़े से प्रतीत हो रहे थे। मन भी कुछ अनमना सा था। सड़क वही जानी पहचानी ही थी, फिर भी एक संशय की स्तिथि में गुम हो धीरे धीरे उसके कदम आगे को बढ़ रहे थे। बैसाख महीने की तेज धूप में अपने सर को पल्लू से ढंक, एक हाथ में टिफ़िन का डब्बा लिए वो चली जा रही थी। कच्ची सड़क पर तेज गर्म हवाओं की वजह से जब धूल का एक गुबार उठता तो परेशान हो, मुह फेर कर थोड़ी देर के लिए खड़ी हो जाती, और वेग कम होते ही फिर चलने लगती। दियारा पास में होने की वजह से गर्म दुपहरी में ऐसा होना एक आम बात थी।

पर आज कुछ अलग था जिस वजह से श्रुति अंदर ही अंदर घुली जा रही थी। दोपहर के समय रोज इस एक काम में उसे सबसे ज्यादा तसल्ली मिलती, जब वो स्कूल से वापस आकर अपने बाबा के लिए खाना लेकर बासा पे जाया करती थी। घर से कोई एक कोस की दूरी पे था बासा, फिर भी कच्ची सड़कों को रोज नापने में उसे बहुत ख़ुशी मिलती थी। उसे आया देख उसके बाबा क चेहरे पे जो हल्की सी मुस्कान बिख़र आया करती थी वो उसे किसी जेवर की चमक से कमतर न मालूम पड़ते थे।

एक निम्नवर्गीय किसान परिवार में जन्मी श्रुति तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, उससे छोटी उसकी बहन प्रीति और सबसे छोटा भाई राहुल था। श्रुति नाम उसके नाना जी ने रखा, जो उसके बाबा के जुबान पे कभी सही से न चढ़ पाया, वे उसे सारो और प्रीति को पारो ही कहकर बुलाते थे, शायद ई की मात्रा से उनका पुराने जन्म का कोई बैर रहा होगा, क्योंकि उन्होंने राहुल के नाम से कोई छेड़ छाड़ नहीं करी। सारो से तो कोई दिक्कत न हुई पर पारो नाम से बेचारी प्रीति कई मर्तबा व्यंग्य का शिकार हुई, इस बात को लेकर उसकी बाबा से एक अघोषित नाराजगी आज तलक जारी है।

कुछ दिन पहले ही श्रुति के बारहवीं के नतीजे घोषित हुए थे, अपने स्कूल में विज्ञान सर्ग में सबसे अच्छे दर्ज़े में पास हुयी थी। पर पूरे घर मे मानों सिर्फ वो और उसके बाबा ही थे जो इस बात पे फुले न समा रहे हों। माँ और दादी तो जैसे कोई बूत हो, कोई प्रतिक्रिया ही न हुई उनकी तरफ से, बहुत बड़ा भेद था ये, जिसे सिर्फ श्रुति ही जानती थी। अपने दिल पे एक भारी सा पत्थर रख कर उसने भी अपनी नियति से समझौता करने की तैयारी कर ली थी। पर कहीं न कहीं इस बोझ के तले उसका मन और हृदय गहरे गर्त में फिसलता जा रहा था। घर में कोई भी पढ़ा लिखा न था न माँ न बाबा, दादी अभी भी पुरातन ख़यालों की पूजक थी। ऐसा न था कि उसके अशिक्षित बाबा अपनी पढ़ी लिखी बच्ची के मनोभावों से अवगत न थे, पर वो भी मज़बूरी की जंजीरों में कुछ जकड़े से हुये थे।

दूसरी कड़ी


अतीत की सारी यादों को चलचित्र की भांति मन की आंखों से निहारते हुए वो चली जा रही थी, आधा रास्ता तय कर चुकने के बाद थक कर थोड़ी देर को सड़क किनारे पाखर के पेंड के नीचे बैठ गयी। पैरों के साथ साथ मन मस्तिष्क पे भी थकान ने डोरे डालने शुरू कर दिए थे।

सड़क वही था, बस वक़्त के कांटों को थोड़ा पीछे धकेलते हुए, श्रुती भूली बिसरी यादों के पन्नों को खोल बैठी..

“बाबा, पाँव दुख रहे मेरे” बस इतना ही तो कहना होता और बाबा कैसे एक हल्की झिड़की देते हुए उसे कांधे पे बिठाते हुए कहते, अब अगली बार से खेतों पर लेकर नहीं आऊँगा तुझे, फिर कभी जिद मत करना। इतना सुनते ही, एक रोनी आवाज़ का नाटक कर बस उनके गर्दन पे बाहों का थोड़ा कसाव ही तो बढ़ाना होता था और बाबा हार मानने का नाटक कर बोल पड़ते, ठीक है ठीक है, लाऊँगा, अब सांस तो आने को छोड़ दे।

तभी रंभाता हुआ गाय का एक बछड़ा वहाँ आ पहुंचा, शायद अपनी माँ से बिछड़ गया होगा, और उस कोलाहल से श्रुति का बैचैन मन फिर से वर्तमान में आकर टिक गया। उसने बछड़े को थोड़े प्यार से सहलाया तो वो भी अपना प्रेम वात्सल्य दर्शाता हुआ जीभ से उसकी गर्दन को चटोरने लगा। सिहरन और गुदगुदाहट की वजह से वो खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली “तू आया रे बड़ा छिछोरा”, बछड़ा सहम कर थोड़ा दूर को हट कर खड़ा हो गया। तभी उसे उसकी माँ नज़र आ गयी और वो कुलाँचे मारता हुआ वहां से दौड़ पड़ा। दो घड़ी की खुशियां फिर से शून्य में विलुप्त हो गयी, श्रुति का खिला खिला मन फिर से व्याकुल हो उठा।

कितने मजबूत काँधे थे बाबा के पर जिंदगी की झंझावातों ने उसे भी झुकने को मजबूर कर दिया। ऐसा न था कि गरीबी ने घर की खुशियों पे शुरू से ही कोई पहरा डाल रखा हो। बाबा की दुलारी तो थी ही और माँ का भी स्नेह प्रगाढ़ था, पर प्रीति के आने के बाद चीजें बड़ी तेजी से बदलती चली गईं। दूसरी लड़की हो जाने से दादी और माँ दोनों के चेहरे पे स्थायी तौर पे शिकन की लकीरें खींच गयी जो फिर कभी न गयीं। थोड़ी बहुत जो कसर रह गयी थी वो माँ की निरंतर बनी रहने वाली अस्वस्थता ने पूरी कर दी। बहुत चिढ़चिढ़ी सी रहने लगी थी वो, बार बार का चीखना चिल्लाना और नसीब का रोना अब इस परिवार की नियति बन चुकी थी। दादी माँ उम्र के अंतिम पड़ाव पे खड़ी होने के बावजूद भी घर के अधिकार की बागडोर को छोड़ने को तैयार न थी। दादी और माँ के बीच होने वाली खटपट ने माहौल को और भी तनाव पूर्ण बना कर रख छोड़ा था। पर इन सब के बावजूद बाबा का स्नेह श्रुति और प्रीति के प्रति कम न हुआ। उन दोनों के लिए बाबा उस वट वृक्ष के समान थे जो किसी भी तूफान या विषम परिस्थिति में भी अपने आश्रय देने का धर्म निभाना नहीं भूल जाता।

थोड़ी खुशियाँ तब आयी, जब काफी लंबे अरसे बाद घर में एक नन्हे बालक की किलकारियों ने अपनी गूंज दी। श्रुति अब बारह वर्ष की हो चुकी थी और काफी कुछ समझने भी लगी थी। उसे अपने नवागंतुक भाई की किलकारियों में, दादी के सामने अपनी माँ के पराजय का एहसास होता था। दादी के तानों से ही परास्त होकर इतनी अस्वस्थता और उम्र में भी माँ दुबारे गर्भ ठहराने के लिए मजबूर हुई। बार बार के तानों से की “मरने से पहले पोते का मुंह तो दिखला दे” ने माँ को अंदर तक से तोड़ डाला था। कही न कही माँ भी इन सब के लिए दोनों बहनों को ही जिम्मेदार मानने लगी थी और उनके प्रति सारा स्नेह जाता रहा। भगवान ने माँ की सुन तो ली पर उसे किसी काम के लायक का न छोड़ा, अस्वस्थता के गम्भीर मकड़जाल में वो ऐसे घिरी की फिर बाहर न निकल पायी। ऐसा न था कि दोनों अपने भाई से लगाव न रखती थीं, जान छिड़कती थी उसपे।

जैसे तैसे वर्ष गुजरते चले गए, दोनों बहनों के ऊपर घर की जिम्मेदारियों का भार भी उसी अनुपात में बढ़ता ही चला गया। इतनी कम उम्र में ही दोनों ने काफी अरसे को जी लिया था और समझदारी ऐसी की बड़ों बड़ो को शर्म आ जाये। चूल्हे चौके, झाड़ू बहाडू से लेकर भाई को संभालने तक का काम इन्हीं के हिस्से था। पर इन सब को निभाते हुए भी उन्होंने स्कूल जाना न छोड़ा, इस बात को लेकर भी कई बार घर में तनातनी की स्तिथि बनी। दादी और बाबा इस बात को लेकर कई बार आमने सामने आ गए कि छोरियों को क्या जरूरत स्कूल जाने की जब घर मे बीमारी है। पर बाबा हर बार ढाल बन कर खड़े हो गए ~ “मेरी लड़कियाँ पढ़ेंगी चाहे सूरज को पश्चिम से ही क्यूँ न उगना पड़े”

तीसरी कड़ी


बाबा के वो शब्द ज्यों ही श्रुति के अवचेतन मन में गूंजे वो अपनी चेतना में वापस लौट आयी। उसे सुध बुध ही न थी कि वो कितनी देर तलक यूँ ही पेड़ के नीचे बैठी रही। ध्यान जब टिफ़िन पे गया तो हड़बड़ा कर उठी, फिक्र हो आया कि भोजन कहीं ठंडा न हो गया हो। सूरज थोड़ा और नीचे को उतर आया, धूप अब सीधे चेहरे पे आकर गिर रही थी मानो आँखों में ही उतरने को बेताब हो। पलकों के ऊपर हथेलियों का छांव करते हुए वह कुछ और तेज कदमों से चलने लगी। सुबह दो रोटी खाकर ही तो खेतों पे चले गए थे बाबा, पता नहीं कब से भूख लगी हो, खामखाँ सुस्ताने को बैठ गयी, उसे अब अपने ऊपर थोड़ी खीझ सी मची।

पचास की उम्र पार कर चुके शिवनारायण सिंह(बाबा), की कदकाठी यूँ थी मानों अभी भी अपने उम्र को हर रोज मात दे रहे हों, उनके साथ के कई लोगों ने तो बिस्तर की राह पकड़ ली, पर एक वो थे मानों सीने में अश्व का बल लिए घूम रहे हों। शिव बाबू अभी भी जोश और जुनून से भरे, मिट्टी में इस कदर गुथे थे जैसे बरगद की पुरानी जड़ें दूर तलक फैली हों। जिंदगी की झंझावातों ने कई दफा उनके हौंसलों पर आघात डालने की कोशिश करी पर वो अपने कर्तव्यों की कसौटी पे हमेशा अव्वल रहे। शायद उनके लिए तीनों बच्चे उस किले की प्राचीर की भांति थे, जिसे वो किसी कीमत पे टूटते हुए नहीं देख सकते थे, ये तो जीवन के जंग में उनकी हार के समान होती।

आज भले ही शिव बाबू एक निम्नवर्गीय किसान की हैसियत में आ गए हों, पर उनकी रगों में बहता खून अभी भी जमींदारी ही था। अतीत के पन्नों को टटोला जाए तो वे उन पूर्वजों के वंशज थे जो कभी हजारों एकड़ जमीन के मालिक हुआ करते थे। पर पूर्वजों के मानसिक दिवालियापन और विलासिता के दीमक ने सबकुछ तबाह कर डाला। पुरानी हवेली को खंडहर में तब्दील हुए तो अब सौ वर्ष बीत गए होंगे। गांव से कोई दो कोस दूर उसके अवशेष अब अपने इतिहास को रोते हुए दिख पड़ते हैं। थोड़ी गिनी चुनी पीढियां ही उस वंश की आखिरी हकदार के रूप में इस गांव में बची थी सो इस परिवार का मान अभी भी कम न हुआ था। कर्मठ मिजाज वाले शिव बाबू ने और भी इज़्ज़त अपने लिए सबके दिलों में कमाई। तीन भाइयों और चार बहनों में वो सबसे छोटे थे, घर की हालत इतनी तंग, कि पढ़ना लिखना तो बहुत दूर की बात थी। खेतों में दिन रात की मेहनत और कितनी ही जमीनों के बिकने के बाद चारों बहनों की शादी हो पाई, जो बचा उसी में से ढाई एकड़ उनके हिस्से आया। उन्होंने भी कमर कस ली और उसी जमीन के सहारे परिवार की आजीविका चलाने लगे। दो बेटियों ने भी इस आँगन में जब जन्म लिया तो भी उन दोनों को लक्ष्मी सा ही मान मिला। खेतों ने भी झूम के खुशियाँ बरसाई, फिर भी घर पे दरिद्रता ने अपने पंजों को गड़ाए ही रखा। बेशक सारी आमदनी का हिसाब किताब दादी माँ के पास हो, पर बाबा की जेब हमेशा सारो पारो की खुशियों के लिए भरा ही रहा करते थे। हर साल दीपावली में जब नए कपड़ों की खरीदारी होती तो कुछ की कीमतों और उनके चमक में बड़ा भारी अंतर देख सब यही सोचते कि शिव बाबू ने बड़े सस्ते दामों में कितने अच्छे कपड़े खरीदे हैं, पर अंदर का भेद तो वही जानते थे।

श्रुती लगभग हाँफते हुये बासे पे पहुंची, पर वहाँ बाबा को न देख उसका दिल धक्क से रह गया। पता नही इन्तेजार करते करते वो कहाँ को चले गए होंगे वो सोच सोच कर के परेशान होने लगी। चौंकी का बिस्तर, वगेरह सबकुछ व्यवस्थित दिखा, गाय के चारे के दानों में भी भगोने पे बाकायदा उबाल आ रहा था और चूल्हे में आंच भी बराबर लगी हुई थी। हर दिन ये काम वो ही आकर किया करती थी, जो कि शिव बाबू पिछले कुछ दिनों से खुद ही करने लगे थे। वो सोचने को मजबूर हुई की कहीं बाबा मेरे चले जाने के बाद कि आदत तो नहीं डाल रहे, इतना सोचते ही एक कंपन की लहर सर से पांव तक दौड़ गयी।

वो टिफ़िन ले वहीं धम्म से मचान के ऊपर बैठ, बेमन हो झूलते अपने नंगे पाँवों को निहारने लगी। गीली पुतलियों से उंगलियों में अंतर कर पाना बड़ा मुश्किल था, और लाल नेलपॉलिश की लकीर ऐसी जान पड़ रही थी मानों नए द्वितीय अध्याय\n\nआठवीं कड़ी\n\nव्यस्त सड़कों की चिल्लम पों भी एक खतरनाक जहर ही है, आम तौर पे शांत स्वभाव वाला अहमदाबाद शहर भी आज कल न जाने क्यूँ इतना उतावला सा हुए जा रहा है, शायद राजस्थान की गर्मी इधर को भी उड़ने लगी है, कुछ यही बड़बड़ाते हुए शंकर पटेल अपनी साईकल थामे पैदल पैदल ही चले जा रहे थे, किसी मनचले बाइक वाले कि आवारागर्दी का शिकार उनकी द्विचक्रवाहिनी हो चुकी थी। इस बात का उन्हें फ़क़त मलाल हो रहा था की जिस सायकिल को वो अपना हमसफ़र मान कर चलाया करते थे उसे आज वो बचा न पाये।\nसाठ की दहलीज पे पहुँच चुके शंकर बाबू के लिए ये वाकया बड़ा कष्टप्रद साबित हुआ, उन्हें तो कहीं चोट न पहुंची पर सायकिल को घिसटाते हुए अपने सरकारी बैंक के दफ्तर तक लेकर जाना बड़ा दुश्वार साबित हुआ। तीस सालों से बैंक के मुख्य शाखा में बतौर पैंट्री कर्मी काम कर रहे थे। बैंक के अंदर भी बुदबुदाते हुए ही दाखिल हुए।\n\”अरे शंकर चाचा आ गये, मैं कब से आप की ही राह तक रही थी, दफ्तर की पहली चाय जो हर रोज़ मेरे ही नाम पे बनती उसका कब से इंतेज़ार था मुझे\” नयी मेम साहब ने शंकर बाबू को देखते ही कहा।\n\”मेम साहब माफ़ी चाहूँगा, आज जरा एक छोटी सी दुर्घटना का शिकार हो गया मैं, इसलिए देरी हो गयी आने में\” और शंकर बाबू ने सारा वृतांत कह सुनाया। मैडम को भी बड़ा दुख पहुंचा उनके सायकल को हुए नुकसान के बारे में जानकर। बोली \”चाचा आप चिन्ता न करो, अभी दिवाकर आता ही होगा उसके हाथों भेज के आपकी साईकल सही करवा दूँगी, आप तो पहले अच्छी सी चाय पिलाओ\”\nमेम साहब की इसी दरियादिली के कायल वहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारी थे, अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे बतौर प्रोबेशनरी अधिकारी यहाँ पे पदस्थापित हुए और ओहदे में उनसे भी कुछ बड़े लोग थे शाखा में, पर जो इज़्ज़त और सम्मान उन्हें हाँसिल था वो किसी और को नहीं। आज एक साल हो गए थे उन्हें यहाँ काम करते करते पर सबकी ज़ुबान पे जो संबोधन के लिए \”नई मेम साहेब\” का जुमला चढ़ा तो वह फिर कभी नहीं उतरा।\nशंकर बाबू के हाथ से चाय लेती हुई मेम साहब बोलती है \”चाचा अगले हफ्ते अपने घर को जा रही हूँ, लंबी छुट्टियों पे\”\nशंकर बाबू: अरे वाह मेम साहब, हम सब इस बात की ही चर्चा करते रहते थे कि आज एक साल से ऊपर हो गए पर अब तलक आपने कभी छुट्टी नहीं ली\”\n\”तभी तो पूरे महीने भर की छुट्टी पे जा रही हूँ\” मेम साहब बोलीं।\n\”अच्छा चाचा सुनों, मुझे आपकी थोड़ी मदद की जरूरत पड़ेगी, कल रविवार को मैं नए घर में शिफ़्ट हो रही, सो बहुत सारा सामान है अकेले न हो पायेगा, आप थोड़ा हाथ बंटाने आ जाओगे\” मेम साहब ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।\nशंकर बाबू: अरे मेम साहब ये भी कोई कहने वाली बात हुयी, मैं कल सुबह हाज़िर हो जाऊंगा आप बेफिक्र रहो, सारी जिम्मेदारी मेरी, पर नया घर क्यूँ? पहले वाला भी तो कितना अच्छा था\”\nमेम साहब : \”नहीं चाचा इस बार थोडा बड़ा घर लिया है, तीन कमरों वाला, किराये में ज्यादा अंतर नहीं है, हाँ ये है कि अब दफ़्तर आने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लग जायेगा, नया घर थोड़ा दूर है\”\nशंकर बाबू: \”पर इतना बड़ा घर वो भी आप अकेले के लिए कुछ समझा नहीं, कहीं शादी करने तो नहीं जा रहे\”\nमेम साहब : \”अरे धत चाचा, अभी इतनी जल्दी शादी कहाँ, हो सकता अबकी बार घर के कुछ लोगों को भी साथ लेते आऊँ, इसलिए बड़ा घर लिया है\”\nअगले दिन ही मेम साहब नये घर में शिफ्ट हों गयी, उन्होंने चाचा को बतौर ख़ुशभक्ति कुछ देना भी चाहा पर शंकर बाबू ने नहीं लिए। एक हफ्ते बाद, जाने वाले दिन भी मेम साहब दफ़्तर आयीं हुई थी जिन्हें देखते ही शंकर बाबू ने कहा \”अरे मेम साहब, आज तो आपकी ट्रेन है ना, फिर आफिस कैसे आना हुआ, मुझे तो लगा आप आज से ही छुट्टी पे होंगी\”\nमेम साहब : \”चाचा ट्रेन रात के एक बजे है, सो दिन भर तो वैसे भी नया घर काटने को दौड़ता इसलिए चली आयी, और कुछ लोगों के लोन की अर्ज़ियों के बाबत भी तो कुछ अधूरे काम निपटाने थे वरना फिर दीपावली की छुटियाँ आ जाएंगी बीच में। अच्छा है न अपनी टेबल पे कोई भी काम लंबित न रहेगा पीछे से\”\nशंकर बाबू : मेम साहब आपने बताया था कि ट्रेन रात में एक बजे है, आप घर से अकेले ही जाएंगी क्या स्टेशन तक इतनी रात में\”\nमेम साहब :\”हाँ चाचा, अब जाना तो पड़ेगा ही और देखो न इतना सारा सामान भी तो हो गया है, सबके लिए थोड़ा थोड़ा सा ही कुछ न कुछ लेते हुए। जा भी तो इतने दिनों बाद रही न, तो जायज है की सब की उम्मीदें तो होंगी ही सही\”\nशंकर बाबू : \”मेम साहब आप फिक्र ना को करो, में रात को ऑटो लेकर, घर तक आ जाऊँगाघाव से बहता हुआ रक्त ही हो।

चौथी कड़ी


रक्त कैसा रक्त? वो जो आँखों से बहने को बेताब हो उठा था! शरीर के जख्म तो फिर भी ढँक जाते, पर दिल के? वो कहाँ छुपाये छुपते। आँखों मे घुल रहा वो नमकीन पानी भी तो लहू के माफ़िक ही था, जो श्रुती के गालों पर से ढुलकता हुआ, उसी के कदमों पे जा गिरा। क्या सिर्फ अश्रुओं को बहा देने मात्र से मनुष्य अपनी सभी घुटी हुई कुण्ठाओं से मुक्त हो जाता है? शायद नहीं, ये तो बस वो उस क्षणिक राहत के सामान है जो मृत्यु शैया पे लेटे व्यक्ति को अपनों के पास बैठे होने के एहसास मात्र से मिलता।

परीक्षाफल घोषित हुए ज्यादा दिन नहीं बीते थे। श्रुती के मन मस्तिष्क का वो प्रकाशित कोना, जो कि उम्मीद की किरणों के आखिरी डोर के साथ भी आशाओं की उड़ान को गति देने की इच्छा रखता था, वो हिस्सा बहुत सारे स्वप्नो को जी भर के जी लेने के लिए उद्यत हो रहा था। परंतु कहीं न कहीं उसे भी इस बात का भान था कि ये सब सिर्फ एक कोरी कल्पना मात्र न बन कर रह जाये। नियति को भी शायद छुपन छुपायी खेलने का शौक था, हुआ भी वही जिसका उसे डर था।

दस दिनों पहले की बात है, हर दिन की तरह शिव बाबू थके हारे शाम को बासे से घर को लौटे। पारो को आवाज़ लगाई पानी लाने को और आँगन के ओसारे पे बैठ रहे। श्रुती जो हर रोज बाबा को वापस आया देख, चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ जाते हुए बातों की गठरी का पुलिंदा खोल बैठती थी, आज नहीं उठी। उठती भी कैसे आँगन में बैठी गेहूँ के दानों से कंकड़ बीनती, वो भी तुलनात्मक भावनाओं के सागर में गोते जो लगा रही थी। क्या मैं भी इन पत्थर के कणों की तरह एक अवांछनीय पदार्थ भर तो नहीं ? क्या मेरा अस्तित्व समाज के लिये सिर्फ एक पूरक वस्तु मात्र तो नहीं? सवाल बड़े थे पर उत्तर कहाँ हाँसिल था।

सुबह सुबह बड़े मामा का एक जरूरी संदेश घर के एक मात्र फ़ोन जो पारो के पास रहता, पे आया था। माँ और दादी दोनों से बात हुई थी, कह रहे थे विष्णुपुर गांव में कोई लड़का है अभी अभी ही नई बहाली हुई है, पुलिस महकमे में, बतौर कॉन्स्टेबल, सारो के साथ जोड़ी अच्छी जमेगी। घर परिवार भी तंदरुस्ती में है, बाप सरकारी स्कूल में मास्टर , जमीन जगह भी काफी और संतानों में सिर्फ दो लड़के ही हैं। पिछले साल श्रावण मास के मेले में लड़के ने सारो को देखा है और पता चला है की वो पूरा ही लट्टू हो गया है उसपर, सो दान दहेज और लेने देने की तो चिंता ही छोड़ दो। जीजा जी से सहमति मिले तो अगले पूर्णिमा मेहमानों के साथ दरवाजे पे रिश्ते के लिए आ जाएं।

दादी ने कह दिया “शिव की तरफ से तो हाँ ही समझो, पढ़ाई को लेकर बतंगड़ बनाता था सो अब तो पढ़ाई भी हो गयी पूरी। अब क्या है लड़की सयानी हो गयी है नया घर संभालेगी, उम्र भी तो देखनी है। सारो के बाद अभी एक और भी तो है, पहली शादी निपटे तो उसके बारे में भी सोचें। फिर कुछ समय भी तो लगता दूसरी शादी के लिए बंदोबस्त करने में, तुम तो बात आगे बढ़ाओ मैं शिव को राजी कर लूँगी। मामा ने फिर दोहराया “लड़के को जब लड़की ही पसंद आ गयी है तो बात तो फिर तय ही समझो “

एक कहावत आज भी गांव देहात में खूब प्रचलित है, जो सुंदरता गरीबी में निखर कर दिख जाए तो फिर दिखावेपन पे ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं रह जाती। ईश्वर ने श्रुति को जितना ही गुणों से लबरेज रखा था, रूप में भी कोई कसर बांकी नहीं छोड़ी। चेहरे की हर बनावट उभर कर सामने आ जाती थी मानों किसी शिल्पकार ने बड़े शिद्द्त से नक्काशी की हो। जहां चेहरे की रेखाएँ अपने माँ से मेल खाती थी, तो कद काठी और लंबाई अपने बाबा से। घर में बस बाबा और श्रुति ही थे जिन्हें ऊंचाई के लिए सीढ़ी या सहारे की जरूरत शायद ही कभी पड़ी हो। यही वजह थी दसवीं पास करते करते ही घर पे रिश्तों का तांता सा लगना शुरू हो गया, माँ दादी की चलती तो कब की ये शादी तय हो जाती, पर ये तो बाबा ही थे जो कभी टस से मस न हुये। हर रिश्ते की बात के साथ कोहराम मचना तो तय था पर श्रुती को कभी इन बातों से फर्क नहीं पड़ा। पर क्या था ऐसा जो आज आये हुए इस रिश्ते की बात से वो अंदर तक से बिफर पड़ी थी। शायद इसलिए कि उड़ान की सीमायें पहले से ही तय हो चुकी थीं। जब भी इस बात को लेकर विवाद हुआ तो शिव बाबू हर बार ब्रह्मास्त्र चला देते की बारहवीं तक जब गाँव में ही स्कूल है, तो फिर पढ़ने देने में दिक्कत क्या है? वैसे भी कौन सी महँगी पढ़ाई है, सरकारी तो स्कूल ठहरा! पर बाबा के इस ब्रह्मास्त्र की मियाद भी अब पूरी हो चली थी।

शिव बाबू : सारो !! आज बाबा को चाय नहीं पिलाओगी क्या, किस चिंता में डूबी है, और बालों को भी ऐसे बना रखा हैं जैसे द्रौपदी के खुले केश हो। क्या हुआ तुझे, मुँह क्यों उतरा उतरा सा है।

श्रुति : अकचका कर अपने विचारों के मंथन से बाहर निकलते हुए बोली “बाबा आप आ गए, मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कुछ तो नही, बस तबियत थोड़ी सही नहीं । बहाना बनाते हुए श्रुति रसोई को चली गयी

शिव बाबू: थोड़ी देर से छाई चुप्पी को तोड़ते हुए बोले “सारो पता है, आज तुम्हारे स्कूल के हेडमास्टर साहब मिले थे रास्ते में आते वक्त, बड़ी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी। बोल रहे थे श्रुति को परसों स्कूल भेज देना, जिले से कोई शिक्षा अधिकारी आ रहे, सो वो तुमसे भी मिलेंगे।

श्रुति: जी बाबा चली जाऊंगी, वैसे भी अब तो फिर कभी स्कूल जाना नहीं है, सो आखिरी बार हो आउंगी।

श्रुति की माँ: पलंग पर से लेटे लेटे हुए ही, “हां हां, जाएगी क्यूँ नहीं, इसी स्कूल ने और तेरे बाबा ने ही तो तेरा दिमाग खराब किया है, बड़ी होती जा रही और बोल रही अभी शादी नही करनी।

रसोईघर से श्रुति के धीमे से सिसकने की आवाज सुनाई पड़ी। पारो और राहुल वक़्त की नजाकत को भाँपते हुए दरवाज़े को खिसक लिए। शिव बाबू को भी मामला पकड़ते देर न लगी, जरूर फिर से कोई रिश्ते की बात उठी होगी।

तभी दादी माँ कहीं बाहर से टहलते हुए आयी, श्रुति ने सबको चाय थमाई और अन्दर के कमरे में जाकर लेट गयी। लाल आंखों को छुपाने का कोई और तरीका भी तो न था। दादी ने मामा द्वारा भेजे हुए संदेश को और बढ़ चढ़ कर कह सुनाया, हर बार की तरह इस बार बाबा ने कोई जिरह न करी। इस बात पे तेजी से धड़कता हुआ श्रुति का दिल पूरी तरह धौंकनी देने लगा, उम्मीद अब पूरी तरह से जो टूट चुकी थी, आँखों से उसके अलकनंदा और मंदाकिनी की धार फूट पड़ी, पर कोई गर्जना न हुई। आज फिर से एक निरीह कन्या ने अपनी नियति को आत्मसात जो कर लिया था।

प्रीती ने किसी तरह रात्रि का भोजन अकेले ही तैयार किया, दादी का कोई मतलब था नहीं, माँ उठ नहीं सकती थी, और श्रुती उठी नहीं, न जाने कब की उसकी आँखें लग चुकी थी। धमाचौकड़ी मचाने वाला राहुल भी आज बहन को उठाने का भरसक प्रयास करता हुआ थक कर उस से लिपट कर सो रहा। बाल मन कहाँ जाने की उसकी सबसे बड़ी बहन आज उस से क्यूँ रूठ गयी है।

पांचवी कड़ी


प्रीति रसोई के सारे काम निपटा कर श्रुती को उठाने की कोशिश करने लगी। “दिदिया ओ दिदिया, खाना खा ले, सबने खा के बिस्तर की राह भी पकड़ ली, उठ कब तक यूँ मुँह फूला के पड़ी रहेगी”

श्रुती ने पहले तो एक दो बार अनसुना कर दिया पर फिर थोड़े झुंझलाहट में आकर बोल पड़ी “नहीं खाना मुझे, एक दिन नहीं खाऊँगी तो कोई मर थोड़े न जाऊंगी।”

पर प्रीति भी कहाँ हार मानने वालों में से थी, इस बार भावनात्मक पहलू का सहारा लेकर बोली “अच्छा चल तू न को भी खा कन्वारी माँ, पर तेरा ये लाड़ला कौन सा तेरे बिना खाने वाला है उसे तो भूखा मत रख।”

इस बार श्रुती एक लंबा निःश्वास छोड़ते हुए उठ बैठी, और पूछा “कहाँ है वो”।

प्रीति ईशारा करते हुए बोली “ये तो रहा तेरे पीछे बैठा है, कब से तो जगा रहा था तुझे पर एक तू है कि उठ ही नहीं रही।”

उनींदी आँखे की वजह से वह राहुल को देख नहीं पायी थी, उसने अपने दोनों हाथ राहुल के काँधे पे रखा और थोड़ा सख्ती से हिलाते हुए गंभीर आवाज़ में बोली “क्यूँ रे क्यों नहीं खाता तू मेरे बिना, अब चली जाऊंगी थोड़े दिनों में फिर क्या करेगा, मर गई तेरी …” इतना बोलते बोलते उसका गला भर आया,आगे को कुछ बोलती तो लफ्ज़ रुंध जाते।

इतना सुनते ही राहुल जो शाम से सदमें में था, उसकी शक्ल अब रोया तब रोया जैसी हो गयी। वो रो पड़ता की इस से पहले श्रुति ने उसे भिंच के सीने से लगा लिया और शान्त करने लगी “चुप ,चुप.. कहीं नहीं जा रही मैं, भला मैं अपने शैतान को छोड़ कहाँ जाऊँगी, चल आ जा खाना खा ले, देख तो सही आज तेरी पारो दीदी ने क्या क्या बनाया है।”

छह वर्ष का ही तो था राहुल, जमाने से बेख़बर उसकी दुनिया तो बस श्रुती में ही सिमटी थी। माँ ने जन्म जरूर दिया था, पर माँ किसे कहते है इसके लिए उसकी परिभाषा हमेशा बड़ी बहन श्रुती पे ही जाकर थम जाया करती थी। बचपन से लेकर अब तलक उसकी तरफ की सारी जिम्मेदारी भी तो उसी ने ही पुरी करी, कहते हैं बहन में मां की ही प्रतिछाया होती इसे श्रुति ने बखूबी निभाया। बीमारी की वजह से डॉक्टरों ने माँ से राहुल को अपना दूध पिलाने से भी मना कर दिया था, सो वात्सल्य का ये नाता भी माँ के प्रति जाता रहा। पहली बार जब राहुल की जुबां से माँ शब्द फूटे तो उस वक़्त भी वो श्रुती के ही गोद में खेल रहा था। अब जरूर है कि सबके टोकने की वजह से वो अपनी माँ को माँ कहने लगा था, पर श्रुती को तो वो सू-माँ ही कह कर बुलाता रहा।

एक अठारह साल की कन्या पर विधाता का ये कितना कठोर अन्याय था, उसे बेटी, बहन और यहाँ तक की माँ का भी फ़र्ज़ अदा करने को मजबूर होना पड़ा था। एक कन्वारी माँ ही तो थी वो अपने भाई के लिए, एक सखा और बहन भी तो थी वो अपनी बहन के लिए, और एक जिम्मेदार और सुशील बेटी भी तो थी अपने घर और समाज के लिए, इतना कुछ वो भी इत्ती सी उम्र में? पर उसने कभी उफ्फ तक न किया सब रिश्तों को बखूबी निभाती रही, पर बदले में उसे क्या मिला? अपनों से ही तिरस्कार!! भाग्य से तिरस्कार!!

राहुल खा कर के सो रहा, थोड़ी देर अपनी बहन को झूठा ढाढ़स बंधाते बंधाते प्रीति भी सो रही। पर श्रुती की आँखों से तो नींद का अब दूर दूर तक कोई वास्ता न था। कितने अनिश्चित निर्णयों को मन ही मन ला कर वो फिर तिरस्कृत किये जा रही थी, मन में भावनाओं का तूफ़ान ऐसा प्रचण्ड प्रतीत हो रहा था मानों प्रशांत महासागर में उठा कोई भयंकर चक्रवात हो। जब भी हल्की आंख लगने को आती तो बूंदो के तेज थपेडों से वो दूर भाग खड़ी होती। थपेड़े थे या फिर थप्पड़!! नहीं नहीं अब नही अब और करवट नहीं बदलूंगी। जब ऐसा लगने लगा कि वो भी इस भयंकर सुनामी में डूब जाएगी, तो घबराकर उठ आँगन में टहलने लगी। रात के एक बज गए थे, गांव के कुत्ते रत जगा करने में मशगूल थे,उनकी भौंकने की आवाज मानों कानों में गोली की तरह आकर लग रही हो।

अनायास ही श्रुती के कदम आँगन की किवाड़ को खोल दरवाजे की ओर बढ़ चले, शायद चारों और से बंद पड़े आँगन में घुटन महसूस हो रही थी। बाहर दरवाजे पे बँगले में बाबा सो रहे थे। अरे ये क्या बाबा आज मच्छरदानी लगाना ही भूल गए, जरा मेरी नींद क्या लग गयी आज तो किसी को ध्यान ही न रहा, वो मन ही मन बड़बड़ाने लगी। मच्छरदानी लेकर वो बाबा के पास पहुंची तो देखा वो जगे हुए ही थे, उसे थोड़ा विस्मय सा हुआ।

श्रुती : बाबा आप सोये नहीं अब तलक।

शिव बाबू: नहीं पता नहीं सारो आज नींद नहीं आ रही। पर तुम अब तलक क्यूँ जगी हो?

अपने बाबा के पैरों के पास बैठते हुए वो बोली : “बाबा आपसे कुछ बात करनी थी, बुरा तो नहीं मानोगे न”

शिव बाबू: नहीं

श्रुती : बाबा मुझे अभी पढ़ने की इच्छा है, शादी नहीं करनी,और राहुल भी तो मेरे बिना नहीं रह पाएगा,थोड़ा और बड़ा हो जाता तो फिर सब समझ लेता।

श्रुती को पता था कि अबकी बार बाबा भी कुछ नहीं कहेंगे पर हाँ इतना था कि अपने दिल की बात जो कह दी तो दिमाग में चल रहे विचारों के बवंडर रूपी सारे तूफ़ान शांत हो गए।श्रुती जब मच्छरदानी लगा कर वापस जाने लगी तो बाबा ने बस इतना सा कहा “सारो जो होगा अच्छा होगा, सब वक़्त पे छोड़ दे”

वो तब का दिन था और ये आज का..

मचान पे बैठे बैठे ही सारे घटनाक्रम एक चलचित्र की तरह आँखों के पर्दों पे दौड़ने लगे। आंखों में उतरा पानी भी अपने रास्ते से बहता हुआ सुख गया, हाँ गालों पे वो जरूर एक सफेद लकीर को छोड़ गया था। यथास्थिति का भान होते श्रुति ने फटाफट अपने चेहरे को पोछ लिया, की कहीं सड़क से आते जाते कोई देख न ले। सूर्य अब पश्चिमगामी हो चला, पर शिव बाबू का कोई आता पता न था अब तलक। तभी श्रुती को अपने बाबा की महीन पर गम्भीर आवाज़ पीछे से सुनाई पड़ी “अरे सारो कब आयी, कब से यहाँ बैठी है?

श्रुती : एक घंटे के आस पास हो गए होंगे बाबा।

शिव बाबू : मैं जरा जगत काका के खेत पे चला गया था, नयी ट्रैक्टर ली है न उन्होंने और पहली बार खेतों पे लेकर आये थे सो देखने गया था, गेहूँ काटने वाली मशीन भी साथ में ही खरीदी है। पता नही कब अपनी भी ट्रैक्टर की ख्वाइश पूरी होगी, एक ठंडी सी आह लेकर शिव बाबू ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली, मानों कुछ छुपा रहे हों ।

श्रुती: बाबा जल्दी हाथ मुँह धो लो, खाना ठंडा हो रहा और वैसे भी मुझे आज देर हो गयी थी आने में, आप भी न झूठ न बोलो, वो भी कम से कम मुझसे, बस समय काटने को पहुँच गये होगे जगत काका के खेत पे, कितनी बार कहा है ना अपनी सुरति खाने की लत छोड़ो, पर चोरी छिपे खाने का बहाना ढूंढते फिरते हो।

शिव बाबू ने बस हल्के से मुस्का भर दिया, झूठ जो पकड़ में आ गई थी। पर ऐसा न था कि शिव बाबू को अपने खुद के ट्रैक्टर की ख्वाइश न थी, कब से ये सपना मन मे पाले बैठे थे। मुँह हाथ धो कर जब तक शिव बाबू ने खाना खत्म किया, तब तलक श्रुती ने भी गाय के चारे पानी का इंतज़ाम कर दिया। टिफ़िन धो कर जाने को हुई तो बोली “बाबा आज शाम पड़ते ही जल्दी घर आ जाना, पूरी भाजी बनाऊँगी, कुछ दिनों से पारो ही खाना बना रही सो मुझे पता है किसी ने ढ़ंग से न खाया है” कितना कोमल मन होता है न स्त्री का भी, अपनों के लिए पिघलते जरा भी देर न लगती, प्रण ले लिया था की अब चूल्हे चौके को हाथ न लगायेगी, जब पराये घर को भेज ही रहे तो फिर अब उम्मीदें किस बात की। पर आज जब बाबा की टिफ़िन में रोटी और सब्जी को छूटा हुआ पाया तो अपने आप को पसीजने से रोक न पायी।

अभी श्रुति पीछे मुड़कर जाने ही वाली थी कि बाबा ने आवाज लगाई “सारो, सुनो जरा”

श्रुति : जी बाबा!

शिव बाबू: कल जरा खेतों में खाद डालना है, अब आजकल अकेले कहाँ हो पाता, कमर बड़ी दुखती है, तुम कल सुबह आ सकते हो क्या साथ देने।

श्रुती : पर बाबा कल तो मेहमान आ रहे मुझे देखने घर पे, फिर मैं कैसे आऊँ यहाँ और आपको भी तो वहीं घर पे ही रहना होगा।

शिव बाबू : तो ऐसा करेंगे न, हम सुबह चार बजे ही ये काम आकर कर लेंगे फिर पूरे दिन भर की छुट्टी रहेगी।

श्रुति थोड़ा अचंभित तो हुई पर हामी भी भर दी : ठीक है आ जाऊंगी।

आज तलक ऐसा न हुआ था कि शिव बाबू ने कभी अपने बच्चों से खेत पे कोई काम करवाया हो, कहते फिरते थे खेतों में काम करवा के अपनी राजकुमारी सी बेटियों का रंग काला करवाना है क्या? पर आज अचानक से ऐसा क्या हो गया, श्रुति यही गुणा भाग करते करते घर को लौट आयी, पर उसे कोई संतोषजनक उत्तर न मिला।

जैसे तैसे को रात बीती, शिव बाबू से पहले श्रुति ही उठ गयी और बाबा को दरवाजे पे आवाज़ लगाते हुए बोली “बाबा चलो जल्दी करो चार कब के बज गए” शिव बाबू फटाफट तैयार हो कर श्रुती से बोलते हैं, “मैं आगे आगे को बढ़ रहा तुम पीछे से जल्दी आना।” श्रुति देखती है कि बाबा अपनी संभाल के रखी हुई खादी के कुर्ते पायजामे को पहन बिल्कुल तैयार हो कर नजरें बचा कर चुप चाप निकल रहे होते हैं। उसकी आश्चर्य का ठिकाना न रहा, भला ऐसे भी कोई खेत पे काम करने जाता है क्या?

थोड़ी देर में श्रुती जब सड़क पे आगे को बढ़ती है तो क्या देखती है कि, बाबा गाँव से चलने वाली एक मात्र बस जो सुबह पाँच बजे रवाना होती, को रोक कर खड़े थे और हाथ हिला के उसे तेजी से आने को कह रहे थे। श्रुति को माज़रा समझ में ही न आ रहा था, वो तो बस हाँफते हाँफते बस तक पहुँची और बोल पड़ी “बाबा क्या है ये सब कुछ बतलाओगे”

शिव बाबू बोले “अभी इतना वक़्त नहीं जल्दी बैठ बस में, गोरखपुर जल्दी पहुंचना है, नहीं तो सुबह सुबह इलाहाबाद वाली ट्रेन छूट जाएगी”

गोरखपुर.. इलाहाबाद… मेहमान घर पे..पर .. पर.. इस से पहले की वो कुछ समझ या बोल पाती शिव बाबू उसका हाथ पकड़ के खींचते हुए बस में चढ़ गए।

छठवीं कड़ी


“अरे बाबा बताओ तो सही कहाँ लिए जा रहे हो मुझे, बड़ा भय सा हो रहा, कुछ बोलते क्यूँ नहीं आप” श्रुती बड़ी मुश्किल से खचाखच भरी बस में जगह बनाते हुए, खाली दिखती एक सीट पे बैठते हुये बोली। इतने पेशोपेश में पड़े होने पे भी वो इस बात पे अपने आप को आश्चर्यचकित होने से न रोक पायी की भला ये दो सीटें खाली कैसे रह गयीं।

शिव बाबू: अभी चुप चाप बैठ, सब बताता हूँ। एक बार जरा साँस तो लेन दे। दस दिनों से बड़ा बेदम हो रखा हूँ तेरी वजह से।

श्रुती की बड़ी बड़ी गोल आंखें अपने बाबा के रहस्यमयी फीकी मुस्कान को देख पूरनमासी के चाँद की भांति और भी बड़ी हों गयी। तभी उसे बस की खिड़की से बाहर खड़े जगत काका दिखे जो बाबा की साइकिल पकड़े खड़े थे, और बाकायदा खाद का बोरा भी लदा था। श्रुती को लगा मानों कोई सपना देख रही हो, और मारे छटपटाहट के बाहर आना चाहती हो, पर निकल पाने में असमर्थ हो। उसे समझ आ गया कि बस में दो सीटें किसने रोक के रखी थी, तभी जगत काका खिड़की के पास आये, बाबा ने काका से कहा, “जगत मजदूर थोड़ी देर में खेत पे आते ही होंगे, उन्हें काम बेत देना, और बाँकी तुम घर पे सब संभाल लेना, सारो को देखने आने वाले मेहमान भी कुछ देर में दरवाजे पे पहुँचते ही होंगे।”

जगत बाबू : तुम फिक्र न करो शिव, मैं सब संभाल लूँगा, और शिवानी के इलाहाबाद का पता और फ़ोन नम्बर तुम्हें जो काग़ज पे लिख के दिया था वो संभाल के तो रखा है ना? पता चला वहाँ प्रयाग में बौराते फिरो।

शिव बाबू : “हाँ हाँ, संभाल के रख लिया है मैंने”

जगत बाबू : मैंने जमाता से कल रात में इस सिलसिले में बात की है, वो सब संभाल लेंगे तुम किसी बात की चिंता मत करो” तभी बस के कंडक्टर ने ड्राइवर को आगे बढ़ने का इशारा करते हुए वाहन के गेट पे जोर से हाथ मारा। बस हल्के हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ने लगी। श्रुती जगत काका को एकटक निहारती रही, जब तक की वो आँखों से ओझल नहीं हो गए।

जगतनारायण और शिवनारायण बचपन के पकिया यार थे साथ साथ पढ़े, खेले और बड़े हुए थे और हमेशा से एक दूसरे के सुख दुख में साथ खड़े रहते। शिवानी जगत बाबू की बड़ी बेटी ठहरी, दो साल पहले ही शादी हुई थी, और अभी इलाहाबाद में ही थी, शौहर वहीं सरकारी स्कूल में अध्यापक के पद पे आसीन थे। श्रुती से चार वर्ष बड़ी थी शिवानी, और उसकी बड़ी बहन होने का बाकायदा दर्ज़ा भी हाँसिल था उसे।

बाबा और काका की बातों ने श्रुती के लिए सारे घटनाक्रम को और भी अबूझ पहेली सा बना के रख दिया, हाँ पर उसे इतना भान था कि जो कुछ भी हो रहा है, उसकी तैयारी बाबा ने पहले से ही कर रखी थी। गाँव के बाहर वाली छोटी पुलिया पार करते ही बस पक्की सड़क पे आ गयी और हवा से बातें करने लगी। श्रुती अब सहज हो चली थी और वर्तमान में यथासंभव उतर भी आयी थी। इस बार थोड़ा गम्भीर होकर शिव बाबू को देखते हुए पूछी “बाबा हम कहाँ जा रहे” सवाल वही था और उसका जवाब भी उसे मालूम था पर भावों की गहराई ने शिव बाबू को जवाब देने के लिए मजबूर कर दिया।

शिव बाबू : “प्रयाग जा रहे”

श्रुती : “बाबा वो तो मुझे पता है, पर क्यूँ जा रहे ये तो बताओ”

शिव बाबू: “तुम्हारा दाखिला करवाने, डिग्री कॉलेज में”

श्रुती की धमनियों में बहता हुआ रक्त मानों अचानक से वहीं जम गया हो, एक पल को उसे अपने ही कानों पे भरोसा न हुआ। वो आवाक हो, बाबा के गंभीरता से लदे हुए उस चेहरे को निहारती भर रह गयी, जो अपने कुर्ते के ऊपरी जेब से पाँच सौ का नोट निकाल कर कंडक्टर से टिकट ले रहे थे।

टिकट की औपचारिकता पूरी करने के बाद शिव बाबू फिर बोलते हैं

“शिवानी के शौहर रवि से बात हुई थी मेरी भी, तुम्हारे रिजल्ट के बारे में बताया तो बोले इलाहाबाद ही सही रहेगा, पढ़ने लिखने के लिए माहौल अच्छा है, छात्रावास में अकेले ही रहोगी, सो शहर में कोई जान पहचान का भी तो होना चाहिए था न वरना हमेशा फिक्र बनी रहती। तुम्हारे हेडमास्टर साहेब ने भी इलाहाबाद का ही सुझाव दिया था। अच्छी पढ़ाई की बात थी वरना अपना गोरखपुर कौन सा बुरा था” एक प्रश्नवाचक चिन्ह अपनी आँखों में लिए शिव बाबू ने श्रुती को देखा, जो अभी भी अपलक उन्हें ही निहार रही थी।

सातवीं कड़ी


“बाबा..” पहली मर्तबा बस इतना ही बोल पायी, अभी भी उसे ये सारा वाक्या किसी स्वप्नलोक की परिकथा सा ही जान पड़ रहा था। बाबा ने तब से जो भी कुछ कहा था उसका उसे जरा भी होंश न रहा। उसने प्रश्नवाचक लहजे में सब कुछ दुबारा सुनने के लिए बस एक शब्द और जोड़ा “जी बाबा?” पर शिव बाबू ने उसे स्वीकृति में दिया हुआ जवाब समझा और फिर चुप हो गये। पिता पुत्री दोनों अब चुप चाप खामोशी के चादर को ओढ़ बैठ लिये, ऐसा विरले ही कभी हुआ था कि, शिव बाबू आस पास हों और श्रुति गुमसुम बैठी रह गयी हो।

गोरखपुर एक घंटे का सफ़र था बस से, अब तो शहर की सीमाएं भी शुरू हो चुकीं थी,

पूरब आसमान में अब भोर की लालिमा निखरने लगी थी, आकाश अपने नीले माँग में लाल सिंदूर धरे मानों बिल्कुल नयी नवेली दुल्हन की तरह सज गयी हो। एक बिंदी कम पड़ रही थी जिसे उगते हुए भास्कर ने पूरे किये दिया। चिड़ियों की चहचहाहट से वातावरण बिल्कुल संगीतमय हो चला था, सुबह सुबह की शीतलता लिए हवाएं जब बस की खिड़की से टकरा कर श्रुती के चेहरे और बिखरी लटों से अठखेलियाँ करने लगी, तो उसके शिथिल पड़ चुके मन मस्तिष्क में भी नवचेतना की लहरों का संचार होने लगा। जीवन को एक मधुर संगीत की तरह जीने वाली लड़की आखिर कब तलक मौन धारण किये चिंतनशील योगिनी बनी रहती। सो चुप्पी तोड़ चहक पड़ी और हड़बड़ा कर पूछी मानों जैसे अचानक से कुछ याद आ गया हो।

“बाबा!! पर मेरी दसवीं और बारहवीं के प्रमाण पत्र कहाँ लिए, उसके बिना दाखिला कैसे होगा” थोड़ी चिंता की लकीरें चेहरे पे फैल गयीं।

शिव बाबू ने ताना देते हुए कहा : “माना तेरे बाबा ने ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं करी, पर इतनी तो अक्कल है, ये ले अपने जरूरी काग़ज इन्हें सम्भाल के रख, मैंने कल रात ही सारे कागज़ अलमिरे से निकाल कर अपने पास रख लिए थे। एक बार को देख ले सब सही सही तो रखा है ना” श्रुती ने बाबा की हाथ से झोला ले कर देखा उसमे उसके अब तलक का सारा बही खाता इकठ्ठा था, जिन कागजों की कोई जरूरत न थी वो भी बाबा ने रख लिए थे।

इस बार श्रुती ने तंज कसा “बाबा खुद तो बन ठन के निकल लिए हो घर से और मैं यहाँ भिखारन सी दिख रही सो उसका क्या, बाल तक नहीं बनाये है मैंने, पर्स तक नहीं लिया, और ये बताओ पहले की एक जोड़ी कपड़े तक नहीं है अभी मेरे पास सो उसका क्या! कम से कम आते वक्त मेरा नया वाला बैग ही उठा कर ले आते चोरी छुपे जो अलमिरे के ऊपर रखा था! ये तो बड़ी आफत हो गयी बाबा!! कितने फिजूल के पैसे खर्च हो जाएंगे नए कपड़ों के पीछे”

शिव बाबू को अब अपनी इस एक गलती पे जरूर पछतावा हुआ पर अब तो बस स्टैंड पे आकर खड़ी हो चुकी थी, कुछ किया नहीं जा सकता था। गोदान एक्सप्रेस सुबह सुबह 6.20 पे ही गोरखपुर से रवाना हो जाती और 6 बज गए थे, हालाँकि स्टेशन पास में ही था तो चिंता की बात न थी। जगत बाबू एक दिन पहले ही गोरखपुर किसी काम से आये थे, तो उनसे ही कह के ट्रेन की दो टिकटों का आरक्षण करवा लिया था शिव बाबू ने। स्टेशन पहुचते ही थे कि, ट्रेन भी प्लेटफार्म पे आकर खड़ी हो गयी। ट्रेन गोरखपुर से ही चलती थी सो ज्यादा भीड़ भी न थी, बोगी और सीट ढूंढने में खास परेशानी नहीं हुई। सीट पे बैठते ही शिव बाबू बोले, सारो अब जो पीछे छूट गया उसे रहने दो, थोड़े पैसे खर्च हो जाएंगे सो होंगे नयी शुरुआत है तो कपड़े भी इसी बहाने नए आ जाएंगे।

अपने बाबा के भोले भाले मन पे श्रुती मुस्कुरा पड़ी, गलती पे पर्दा डालने का ये तरीका भी बहुत खूब था। पर पैसों की बात सुनकर वो पैसा शब्द रह रह कर श्रुती को कचोटने लगा। इतना बड़ा शहर, रहने और पढ़ने का खर्चा भी बहुत आएगा और वो भी तीन सालों तक, बाबा कैसे कर पायेंगे इतना कुछ, घर पे माँ की बीमारी और साथ साथ प्रीति और राहुल की पढ़ाई भी, इतना कुछ कैसे होगा? कहीं उसने बाबा से उस दिन आग्रह कर के कोई गलती तो नही कर दी। इतना खयाल आते ही मन में बोल पड़ी “बाबा सुनो, चलो वापस चलो, मुझे नहीं जाना इलाहाबाद, मेरी वजह से आप सब लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ेगी, कहाँ से आप इतने सारे खर्चों का बोझ उठाओगे, घर पे तो वैसे भी कितनी तंगी है। इतना सब कुछ देखते और जानते हुए भी भला मैं कैसे बाहर चली चलूँ पढ़ाई के लिए। नहीं होगा बाबा मुझसे, चलो वापस अभी, गाड़ी रवाना नहीं हुयी है”

शिव बाबू श्रुती को आहत मन देख कर बोले: देख सारो इतना तो तय है कि अगर तू घर को गयी तो ज्यादा से ज्यादा एक या दो साल की मेहमान बनकर रहेगी, फिर क्यूँ रिश्तों के भंवरजाल में उलझी है, इन से बाहर निकल। सब कहते घर की पहली बेटी लक्ष्मी होती, क्या पता तेरे ही हाथों इस परिवार का उद्धार लिखा हो, वरना तेरी हथेली में स्वयं माँ सरस्वती आकर यूँ ही नहीं विराजती। रही बात पैसों की तो उसकी चिंता मत कर मैं कैसे भी कर के तुम्हें हर महीने भेज दूंगा। तेरे और प्रीति के नाम आज से बारह साल पहले बैंक में कुछ रकम जमा कराई थी मैंने वो भी बिना तेरी दादी और माँ को बताए, ताकि शादी में मदद मिल सके, जरूरत पड़ी तो तेरा खाता तुड़वा दूँगा। अब अभी खुशी खुशी चल।

फिर एक लंबे विस्सल की आवाज़ हुई, कुछ लोग अभी भी खिड़की के साथ साथ चल रहे थे, जब तक चल सकते थे चले। ट्रेन ने पूरी रफ्तार को आत्मसात करने में ज्यादा वक्त नहीं गंवाए। एक इतिहास पीछे रह गया था सिर्फ, नए भविष्य के सुनहरे पन्नो पे उसके चक्के दौड़ पड़े थे, गतिमान भी और अविरल भी!!शाम पांच बजे ट्रेन इलाहाबाद पहुँच गयी, रवि खुद आ गए थे स्टेशन पे उन दोनों को लेने के लिए।

इधर गाँव मे तो तूफ़ान ही उठ खड़ा हुआ। जगत काका ने घर पे आये मेहमानों को तो किसी तरह समझा बुझा दिया की लड़की की तबियत अचानक से बहुत बिगड़ गयी सो बाहर लेकर जाना पड़ा। पर बांकी सभी से सच सच कह सुनाया, यही शिव और जगत बाबू के बीच तय भी हुआ था। जिसने भी इस वाकये को सुना अपने दाँतो तले उँगली दबा ली, आज तलक यहाँ इस गाँव क्या आस पास के दसियों पंचायत में ऐसी घटना कभी घटित न हुई थी कि, मेहमान घर पे आये हो और लड़की घर छोड़ कर फरार हो गयी हो। तड़का तो इस बात का लग रहा था कि लड़की तो लड़की, उसका बाप भी बौरा गया साथ में। पर किसी ने भी इस बात की परवाह नहीं करी की इन सबके पीछे की वजह कितनी खूबसूरत थी। घर पे तो कोहराम ही मच गया, दादी दहाड़ें मार के चिल्ला रहीं थी, और माँ की लताडों की शिकार प्रीती बन रही थी, इल्ज़ाम ये था कि इस पूरे प्रकरण में वो भी शामिल रही होगी बहन और बाप के साथ।

इधर अगले दिन सुबह सुबह ही शिव बाबू इलाहाबाद से वापस लौटने के लिए तैयार होने लगे। शिवानी और रवि ने यथासंभव प्रयास किया उन्हें रोकने के लिए की कम से कम तीन चार दिन तो और रुक जाते, पर वो नहीं माने। बोले “बेटा घर पे जाकर भी सब कुछ संभालना है, वहाँ भी बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा हो गया होगा, अभी कितनी बातें सुन ने को मिलेंगी, सो जाने दो” इधर श्रुती अंदर के कमरे में बैठ बैठे कुपस रही थी, इस बात के लिए हिम्मत ही नहीं बांध पा रही थी कि बाबा को वापस जाते कैसे देखेगी। शिव बाबू ने आवाज दी “सारो, फिर निकलूँ मैं, बाबा को इज़ाज़त दे जाने की” कुछ न कह पायी वो सिर्फ पर्दे का ओट ले आकर खड़ी हो गयी। शिव बाबू समझ गये उसकी मनोदशा “अच्छा चल स्टेशन तक चलेगी, जीजा जी साथ जा रहे उनके साथ वापस आ जाना” चंद घंटों की ही बात थी पर इतना सा आश्वासन भी श्रुति के बुझे हुए चेहरे पे राहत दे गए, जी तो कर रहा था कि साथ साथ ही वो भी घर को वापस लौट चले। रात भर राहुल को याद कर कर के रोती रही, पता नही क्या खाया होगा, सोया भी होगा या नहीं।

सात बजते बजते तीनों स्टेशन पहुंच गए, रास्ते भर शिव बाबू जीवन के बहुमूल्य उपदेश दे श्रुति को ढाढ़स बंधाते रहे, सुबह से उसने एक शब्द भी नहीं बोला था, शिव बाबू को पता था की बच्ची की आंखों का घड़ा कब का भर चुका है और कभी भी फट पडेगा। थोड़ी देर में ट्रेन के प्लेटफार्म पे आने की सूचना हो गयी, शिव बाबू रवि की तरफ मुखातिब हो कर बोले “बेटा, सारो का हाल चाल लेते रहने इसके मुताबिक का कॉलेज और होस्टल में दाखिला दिलवा देना” ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पे आकर धीमे होने लगी शिव बाबू ने श्रुति के सर पे हाथ फेरते हुआ कहा, जो कि अभी भी चेहरा नीचे करके खड़ी थी ताकि आंखों का सागर न छलक पड़े “सारो, बताना भूल गया तेरे कागजों वाले झोले में एक लिफाफे में पच्चीस हजार रुपये रखे होंगे, सोच समझ के खर्च करना, और ये ले अलग से पाँच हजार रुपये, शिवानी दीदी के साथ जाकर आज ही नए कपड़े खरीद कर ले आना” ये कहते हुए उन्होंने पैसे श्रुती के हाथों में दे दिए। “ठीक है चलूँ फिर” ये सुनकर जो श्रुती ने अबकी बार सर उठाया तो डबडबाई आंखों से उसे कुछ नज़र न आया। “रो मत बीच बीच में आता रहूँगा मिलने, पर जो तू अब फिर कुछ बनकर गाँव वापस आयेगी तो तेरे बाबा का सर गर्व से ऊंचा हो जाएगा, मुझे तेरे पे भरोसा है” इतना कह के शिव बाबू आगे बढ़ चले “बाबा ख्याल रखना अपना, समय पे खा लिया करना, मच्छरदानी लगाना मत भूलना, और राहुल को देखना कोई डाँट डपट न करे, श्रुती बस इतना ही कह सकी, और फिर उसके तलवे बैठ गये जीभ अकड़ गयी, सोचा था बहुत कुछ बोलेगी पर बोल नहीं पायी।

ट्रेन रवाना हो गयी, शिव बाबू तब तलक गेट पे खड़े रहे जब तक प्लेटफ़ॉर्म पे श्रुती नज़र आती रही, मन तो उनका भी कल्पित हो उठा, मानों अपनी बेटी को ससुराल विदा कर रहे हों। तभी विपरीत दिशा से आ रही तेज रफ़्तार माल गाड़ी स्टेशन से होकर धड़धड़ाते हुए गुजर गयी, पहले के सभी स्वर मानों अनंत ब्रह्मांड के निर्वात के अधीन आकर शांत हो गये हों और जो रह गया वो था भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ एक गहरा रहस्य।

द्वितीय अध्याय


आठवीं कड़ी


व्यस्त सड़कों की चिल्लम पों भी एक खतरनाक जहर ही है, आम तौर पे शांत स्वभाव वाला अहमदाबाद शहर भी आज कल न जाने क्यूँ इतना उतावला सा हुए जा रहा है, शायद राजस्थान की गर्मी इधर को भी उड़ने लगी है, कुछ यही बड़बड़ाते हुए शंकर पटेल अपनी साईकल थामे पैदल पैदल ही चले जा रहे थे, किसी मनचले बाइक वाले कि आवारागर्दी का शिकार उनकी द्विचक्रवाहिनी हो चुकी थी। इस बात का उन्हें फ़क़त मलाल हो रहा था की जिस सायकिल को वो अपना हमसफ़र मान कर चलाया करते थे उसे आज वो बचा न पाये।

साठ की दहलीज पे पहुँच चुके शंकर बाबू के लिए ये वाकया बड़ा कष्टप्रद साबित हुआ, उन्हें तो कहीं चोट न पहुंची पर सायकिल को घिसटाते हुए अपने सरकारी बैंक के दफ्तर तक लेकर जाना बड़ा दुश्वार साबित हुआ। तीस सालों से बैंक के मुख्य शाखा में बतौर पैंट्री कर्मी काम कर रहे थे। बैंक के अंदर भी बुदबुदाते हुए ही दाखिल हुए।

“अरे शंकर चाचा आ गये, मैं कब से आप की ही राह तक रही थी, दफ्तर की पहली चाय जो हर रोज़ मेरे ही नाम पे बनती उसका कब से इंतेज़ार था मुझे” नयी मेम साहब ने शंकर बाबू को देखते ही कहा।

“मेम साहब माफ़ी चाहूँगा, आज जरा एक छोटी सी दुर्घटना का शिकार हो गया मैं, इसलिए देरी हो गयी आने में” और शंकर बाबू ने सारा वृतांत कह सुनाया। मैडम को भी बड़ा दुख पहुंचा उनके सायकल को हुए नुकसान के बारे में जानकर। बोली “चाचा आप चिन्ता न करो, अभी दिवाकर आता ही होगा उसके हाथों भेज के आपकी साईकल सही करवा दूँगी, आप तो पहले अच्छी सी चाय पिलाओ”

मेम साहब की इसी दरियादिली के कायल वहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारी थे, अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे बतौर प्रोबेशनरी अधिकारी यहाँ पे पदस्थापित हुए और ओहदे में उनसे भी कुछ बड़े लोग थे शाखा में, पर जो इज़्ज़त और सम्मान उन्हें हाँसिल था वो किसी और को नहीं। आज एक साल हो गए थे उन्हें यहाँ काम करते करते पर सबकी ज़ुबान पे जो संबोधन के लिए “नई मेम साहेब” का जुमला चढ़ा तो वह फिर कभी नहीं उतरा।

शंकर बाबू के हाथ से चाय लेती हुई मेम साहब बोलती है “चाचा अगले हफ्ते अपने घर को जा रही हूँ, लंबी छुट्टियों पे”

शंकर बाबू: अरे वाह मेम साहब, हम सब इस बात की ही चर्चा करते रहते थे कि आज एक साल से ऊपर हो गए पर अब तलक आपने कभी छुट्टी नहीं ली”

“तभी तो पूरे महीने भर की छुट्टी पे जा रही हूँ” मेम साहब बोलीं।

“अच्छा चाचा सुनों, मुझे आपकी थोड़ी मदद की जरूरत पड़ेगी, कल रविवार को मैं नए घर में शिफ़्ट हो रही, सो बहुत सारा सामान है अकेले न हो पायेगा, आप थोड़ा हाथ बंटाने आ जाओगे” मेम साहब ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।

शंकर बाबू: अरे मेम साहब ये भी कोई कहने वाली बात हुयी, मैं कल सुबह हाज़िर हो जाऊंगा आप बेफिक्र रहो, सारी जिम्मेदारी मेरी, पर नया घर क्यूँ? पहले वाला भी तो कितना अच्छा था”

मेम साहब : “नहीं चाचा इस बार थोडा बड़ा घर लिया है, तीन कमरों वाला, किराये में ज्यादा अंतर नहीं है, हाँ ये है कि अब दफ़्तर आने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लग जायेगा, नया घर थोड़ा दूर है”

शंकर बाबू: “पर इतना बड़ा घर वो भी आप अकेले के लिए कुछ समझा नहीं, कहीं शादी करने तो नहीं जा रहे”

मेम साहब : “अरे धत चाचा, अभी इतनी जल्दी शादी कहाँ, हो सकता अबकी बार घर के कुछ लोगों को भी साथ लेते आऊँ, इसलिए बड़ा घर लिया है”

अगले दिन ही मेम साहब नये घर में शिफ्ट हों गयी, उन्होंने चाचा को बतौर ख़ुशभक्ति कुछ देना भी चाहा पर शंकर बाबू ने नहीं लिए। एक हफ्ते बाद, जाने वाले दिन भी मेम साहब दफ़्तर आयीं हुई थी जिन्हें देखते ही शंकर बाबू ने कहा “अरे मेम साहब, आज तो आपकी ट्रेन है ना, फिर आफिस कैसे आना हुआ, मुझे तो लगा आप आज से ही छुट्टी पे होंगी”

मेम साहब : “चाचा ट्रेन रात के एक बजे है, सो दिन भर तो वैसे भी नया घर काटने को दौड़ता इसलिए चली आयी, और कुछ लोगों के लोन की अर्ज़ियों के बाबत भी तो कुछ अधूरे काम निपटाने थे वरना फिर दीपावली की छुटियाँ आ जाएंगी बीच में। अच्छा है न अपनी टेबल पे कोई भी काम लंबित न रहेगा पीछे से”

शंकर बाबू : मेम साहब आपने बताया था कि ट्रेन रात में एक बजे है, आप घर से अकेले ही जाएंगी क्या स्टेशन तक इतनी रात में”

मेम साहब :”हाँ चाचा, अब जाना तो पड़ेगा ही और देखो न इतना सारा सामान भी तो हो गया है, सबके लिए थोड़ा थोड़ा सा ही कुछ न कुछ लेते हुए। जा भी तो इतने दिनों बाद रही न, तो जायज है की सब की उम्मीदें तो होंगी ही सही”

शंकर बाबू : “मेम साहब आप फिक्र ना को करो, में रात को ऑटो लेकर, घर तक आ जाऊँगा, आप बस सारा सामान तैयार रखना”

मेम साहब: “अरे चाचा नहीं नही, इतनी रात में आप क्यूँ परेशान होवोगे, मैं कुछ न कुछ इंतेज़ाम कर लूँगी”

शंकर बाबू: “नहीं मेम आप नहीं समझती, आज कल दिन दुनिया के तेवर बहुत बिगड़ चुके है, इतनी रात को आपका यूँ अकेले निकलना सही नहीं होगा, मैं आ जाऊँगा आप फिक्र न करो”

इतनी आत्मीयता देख कर मेम साहब का दिल पसीज गया, आज एक साल हो गये इस शहर में आये हुये, पर ये एक शंकर चाचा ही थे जिन्होंने कभी भी छोटी छोटी बातों की कोई कमी महसूस न होने दी, पैसों से जरूर ग़रीब थे पर दिल के ठहरे बहुत ही अमीर।

गहरे रात के सन्नाटे में, स्टेशन पे भीड़ भी न के ही बराबर थी, बीच बीच में होने वाले ट्रैन के आने जाने की सूचना उद्घोष से वातावरण में थोडी बहुत चहलकदमी हो जाया करती थी। दो बैग पूरे भर भर के हो रखे थे, शंकर बाबू उन्हें अगल बगल जमा कर के बेंच पे बैठ रहे। थोड़ी ही देर में ट्रेन के आने की सूचना हो गयी, बैठे बैठे मेम साहब की पलकें लग गईं।

शंकर बाबू ने जगाया ” मेम साहब उठो, ट्रेन आने ही वाली है थोड़ी देर में, ये तो अच्छा हुआ कि मैं आ गया, वरना आज तो ट्रेन छूटने ही वाली थी समझो”

मेम साहब उठते हुए बोली : “चाचा तुम थे साथ में तो इसी भरोसे पे नींद आ गयी”

ट्रैन आकर स्टेशन पे खड़ी हो गयी, शंकर बाबू ने सारा समान सीट के नीचे जमाया, उन्होंने कौतूहलवश मेम साहब से बोला :”मेम मैं सब दिन सोचता था कि आखिर इन बंद काँच वाले ट्रेन के डब्बों के अंदर क्या खास होता होगा, चलो आज ये उत्सकुता भी पूरी हुई, सब कुछ तो वैसा ही है, सिर्फ ठंड ज्यादा लग रही”

मेम साहब खुद को मुस्कुराने से नहीं रोक पायी, और बोली “शंकर चाचा मेरा एक कहा मानोगे”

शंकर बाबू : “जी बिल्कुल”

मेम साहब : “तो अबकी बार जब मैं घर से वापस आऊँ न तो मुझे ये मेम साहब कह के मत बुलाना, श्रुती ही कहना, और चाहो तो “सारो” भी कह सकते हो”

शंकर बाबू सिर्फ हामी में सिर ही हिला पाये, जी मेम साहब तो अब बोल नहीं सकते थे। श्रुति गेट पे तब तलक खड़ी रही जब तलक शंकर बाबू दिखते रहे। एक पल को इतिहास ने अपने आप को फिर से फिल्माया था, वो इलाहाबाद था ये अहमदाबाद”


दादी माँ तो उस वाकये के कुछेक महिनों के बाद ही शांत हो गयी, और माँ भी अब अपनी अंतिम सांसे गिन रहीं है, बस कुछ दिनों की और मेहमान हैं। वो शायद इसलिए भी जिंदा है ताकि रुख़सती से पहले अपनी उस एक बेटी से अंतिम बार माँफी तो मांग ले जिसको उस से सदा तिरस्कार के सिवाय और कुछ न मिला। बाबा अब वाकई में गांव क्या पूरे पंचायत में सीना तान के चलते है, आखिर उस की सारो ने वो कर दिखाया था जो आज भी कितनों के लिए सिर्फ एक स्वप्न मात्र ही है। प्रीती को भी आगे पढ़ने का जुनून हो चला है, राहुल तो अपना बैग पहले से ही समेट के बैठा है, की अबकी बार जो सु-माँ आयी तो यूँही उसे बिना उसको साथ लिए जाने न देगा। गाँव के छोर की तरफ जो बची हुई कच्ची सड़क थी, अब उसपे गिट्टी और अलकतरे की नई परत ढल गयी है।

ट्रेन अहले सुबह गोरखपुर पहुंच गयी, अभी भोर होने में काफी वक्त था। फ़लक पे भोर का तारा टिमटिमा रहा और पूरा गोल हुआ पूर्णिमा का चांद मानों श्रुती को देख मुस्कुराता हुआ उसे कुछ याद दिला रहा हो, और मानों पूछ रहा हो कब आओगे मुझसे मिलने।

छोटी सी वो जब एक बार अपने बाबा के गोद में बैठे आसमान को निहारते हुए पूछ बैठे थी

बाबा बाबा, चंदा मामा क्यूँ नहीं आये आज मुझसे मिलने,”

“बेटा वो थक गए, आराम कर रहे, अब कुछ दिनों बाद आएंगे”

“फिर मैं ही चली जाऊँ चंदा मामा से मिलने”

“पर वो तो बहुत दूर रहते, उड़ कर जाना होगा वहाँ और फिर आपके पास तो पंख भी नहीं है”

“बाबा फिर आप मुझे पंख लाकर दो न, मैं उड़ उनसे मिल आउंगी”

“ठीक है ला दूँगा, पर अभी नहीं जब और बड़ी हो जाओगी”

“सच्ची, बाबा”

“मुच्ची”

वो पंख आज उसे हाँसिल हो चुके थे, श्रुति के मन में बैठे एक शायर मन ने लगभग एक दशक पुराने उस लम्हे को शब्दों में कुछ यूँ कैद कर लिया,

चँदा मामा से है मिलना मुझे,
पंख नये मेरे भी, ला दो न बाबा!
तारे तो हैं सारे, पर वो जा छुपे,
ढूंढ कर उन्हें भी, ला दो न बाबा!

Novella – 2. ~ बाबा (एक दीर्घ कथा, पांचवी कड़ी)

Dear all, glad to present here the fifth episode of this story, I should better adress it as a novella, because as per the length it doesn’t fit into criteria of story and neither that of a novel. I hope that you all would have gone through the previous parts of the story. Those who haven’t, can find them in my WordPress reader time line or by clicking on the links which I am mentioning here. I would request all of you to go through it and do give your honest opinion.

Be a part of Shruti (Saro) story.

First Episode :

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/बाबा-पहली-कड़ी/?preview=true

Second Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/story-2-बाबा-दूसरी-कड़ी/?preview=true

Third Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/21/story-2-बाबा-तीसरी-कड़ी/?preview=true

Fourth Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/23/story-2-बाबा-चौथी-कड़ी/?preview=true

प्रीति रसोई के सारे काम निपटा कर श्रुती को उठाने की कोशिश करने लगी। “दिदिया ओ दिदिया, खाना खा ले, सबने खा के बिस्तर की राह भी पकड़ ली, उठ कब तक यूँ मुँह फूला के पड़ी रहेगी”

श्रुती ने पहले तो एक दो बार अनसुना कर दिया पर फिर थोड़े झुंझलाहट में आकर बोल पड़ी “नहीं खाना मुझे, एक दिन नहीं खाऊँगी तो कोई मर थोड़े न जाऊंगी।”

पर प्रीति भी कहाँ हार मानने वालों में से थी, इस बार भावनात्मक पहलू का सहारा लेकर बोली “अच्छा चल तू न को भी खा कन्वारी माँ, पर तेरा ये लाड़ला कौन सा तेरे बिना खाने वाला है उसे तो भूखा मत रख।”

इस बार श्रुती एक लंबा निःश्वास छोड़ते हुए उठ बैठी, और पूछा “कहाँ है वो”।

प्रीति ईशारा करते हुए बोली “ये तो रहा तेरे पीछे बैठा है, कब से तो जगा रहा था तुझे पर एक तू है कि उठ ही नहीं रही।”

उनींदी आँखे की वजह से वह राहुल को देख नहीं पायी थी, उसने अपने दोनों हाथ राहुल के काँधे पे रखा और थोड़ा सख्ती से हिलाते हुए गंभीर आवाज़ में बोली “क्यूँ रे क्यों नहीं खाता तू मेरे बिना, अब चली जाऊंगी थोड़े दिनों में फिर क्या करेगा, मर गई तेरी …” इतना बोलते बोलते उसका गला भर आया,आगे को कुछ बोलती तो लफ्ज़ रुंध जाते।

इतना सुनते ही राहुल जो शाम से सदमें में था, उसकी शक्ल अब रोया तब रोया जैसी हो गयी। वो रो पड़ता की इस से पहले श्रुति ने उसे भिंच के सीने से लगा लिया और शान्त करने लगी “चुप ,चुप.. कहीं नहीं जा रही मैं, भला मैं अपने बेटू को छोड़ कहाँ जाऊँगी, चल आ जा खाना खा ले, देख तो सही आज तेरी पारो दीदी ने क्या क्या बनाया है।”

छह वर्ष का ही तो था राहुल, जमाने से बेख़बर उसकी दुनिया तो बस श्रुती में ही सिमटी थी। माँ ने जन्म जरूर दिया था, पर माँ किसे कहते है इसके लिए उसकी परिभाषा हमेशा बड़ी बहन श्रुती पे ही जाकर थम जाया करती थी। बचपन से लेकर अब तलक उसकी तरफ की सारी जिम्मेदारी भी तो उसी ने ही पुरी करी, कहते हैं बहन में मां की ही प्रतिछाया होती इसे श्रुति ने बखूबी निभाया। बीमारी की वजह से डॉक्टर ने माँ से राहुल को अपना दूध पिलाने से भी मना कर दिया था, सो वात्सल्य का ये नाता भी माँ के प्रति जाता रहा। पहली बार जब उसकी जुबां से माँ शब्द फूटे तो उस वक़्त भी वो श्रुती के ही गोद में खेल रहा था। अब जरूर है कि सबके टोकने की वजह से वो अपनी माँ को माँ कहने लगा था, पर श्रुती को तो वो सू-माँ ही कह कर बुलाता रहा।

एक अठारह साल की कन्या पर विधाता का ये कितना कठोर अन्याय प्रतीत होता, उसे बेटी, बहन और यहाँ तक की माँ का भी फ़र्ज़ अदा करने को मजबूर होना पड़ा था। एक कन्वारी माँ ही तो थी वो अपने भाई के लिए, एक सखा और बहन भी तो थी वो अपनी बहन के लिए, और एक जिम्मेदार और सुशील बेटी भी तो थी अपने घर और समाज के लिए, इतना कुछ वो भी इत्ती सी उम्र में? पर उसने कभी उफ्फ तक न किया सब रिश्तों को बखूबी निभाती रही, पर बदले में उसे क्या मिला? अपनों से ही तिरस्कार!! भाग्य से तिरस्कार!!

राहुल खा कर के सो रहा, थोड़ी देर अपनी बहिन को झूठा ढाढ़स बंधाते बंधाते प्रीति भी सो रही। पर श्रुती की आँखों से तो नींद का अब दूर दूर तक कोई वास्ता न था। कितने अनिश्चित निर्णयों को मन ही मन ला कर वो फिर तिरस्कृत किये जा रही थी, मन में भावनाओं का तूफ़ान ऐसा प्रचण्ड प्रतीत हो रहा था मानों प्रशांत महासागर में उठा कोई भयंकर चक्रवात हो। जब भी हल्की आंख लगने को आती तो बूंदो के तेज थपेडों से वो दूर भाग खड़ी होती। थपेड़े थे या फिर थप्पड़!! नहीं नहीं अब नही अब और करवट नहीं बदलूंगी। जब ऐसा लगने लगा कि वो भी इस भयंकर सुनामी में डूब जाएगी, तो घबराकर उठ आँगन में टहलने लगी। रात के एक बज गए थे, गांव के कुत्ते रत जगा करने में मशगूल थे,उनकी भौंकने की आवाज मानों कानों में गोली की तरह आकर लग रही हो।

अनायास ही श्रुती के कदम आँगन की किवाड़ को खोल दरवाजे की ओर बढ़ चले, शायद चारों और से बंद पड़े आँगन में घुटन महसूस हो रही थी। बाहर दरवाजे पे बँगले में बाबा सो रहे थे। अरे ये क्या बाबा आज मच्छरदानी लगाना ही भूल गए, जरा मेरी नींद क्या लग गयी आज तो किसी को ध्यान ही न रहा, वो मन ही मन बड़बड़ाने लगी। मच्छरदानी लेकर वो बाबा के पास पहुंची तो देखा वो जगे हुए ही थे, उसे थोड़ा विस्मय सा हुआ।

श्रुती : बाबा आप सोये नहीं अब तलक।

शिव बाबू: नहीं पता नहीं आज नींद नहीं आ रही। तूम अब तलक क्यूँ जगी हो?

अपने बाबा के पैरों के पास बैठते हुए वो बोली : “बाबा आपसे कुछ बात करनी थी, बुरा तो नहीं मानोगे न”

शिव बाबू: नहीं

श्रुती : बाबा मुझे अभी पढ़ना है, शादी नहीं करनी। और राहुल भी तो मेरे बिना नहीं रह पाएगा,थोड़ा और बड़ा होता तो फिर सब समझ लेता।

श्रुती को पता था कि अबकी बार बाबा भी कुछ नहीं कहेंगे पर हाँ इतना था कि अपने दिल की बात कह दी तो दिमाग में चल रहे विचारों के बवंडर रूपी सारे तूफ़ान शांत हो गए।श्रुती जब मच्छरदानी लगा कर वापस जाने लगी तो बाबा ने बस इतना सा कहा “सारो जो होगा अच्छा होगा, सब वक़्त पे छोड़ दे”

वो तब का दिन था और ये आज का..

मचान पे बैठे बैठे ही सारे घटनाक्रम एक चलचित्र की तरह आँखों के पर्दों पे दौड़ने लगे।आंखों में उतरा पानी भी अपने रास्ते से बहता हुआ सुख गया, हाँ गालों पे वो जरूर एक सफेद लकीर को छोड़ गया था। वर्तमान में आते ही फटाफट श्रुति ने चेहरे को पोछा की कहीं सड़क से आते जाते कोई देख न ले। सूर्य अब पश्चिमगामी हो चला था, पर शिव बाबू का कोई आता पता न था अब तलक। तभी श्रुती को अपने बाबा की महीन पर गम्भीर आवाज़ पीछे से सुनाई पड़ी “अरे सारो कब आयी, कब से यहाँ बैठी है?

श्रुती : एक घंटे के आस पास हो गए होंगे बाबा।

शिव बाबू : मैं जरा जगत काका के खेत पे चला गया था, नयी ट्रैक्टर ली है न उन्होंने और पहली बार खेतों पे लेकर आये थे सो देखने गया था, गेहूँ काटने वाली मशीन भी साथ में ही खरीदी है। पता नही कब अपनी भी ट्रैक्टर की ख्वाइश पूरी होगी, एक ठंडी सी आह लेकर शिव बाबू ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली, मानों कुछ छुपा रहे हों ।

श्रुती: बाबा जल्दी हाथ मुँह धो लो, खाना ठंडा हो रहा और वैसे भी मुझे आज देर हो गयी थी आने में, आप भी न झूठ न बोलो वो भी कम से कम मुझसे, बस समय काटने को पहुँच गये होगे जगत काका के खेत पे, कितनी बार कहा है ना अपनी सुरति खाने की लत छोड़ो, पर चोरी छिपे खाने का बहाना ढूंढते फिरते हो।

शिव बाबू ने बस हल्के से मुस्का भर दिया, झूठ जो पकड़ में आ गई थी। पर ऐसा न था कि शिव बाबू को अपने खुद के ट्रैक्टर की ख्वाइश न थी, कब से ये सपना मन मे पाले बैठे थे। मुँह हाथ धो कर जब तक शिव बाबू ने खाना खत्म किया, तब तलक श्रुती ने भी गाय का चारा पानी का इंतज़ाम कर दिया। टिफ़िन धो कर जाने को हुई तो बोली “बाबा शाम पड़ते ही जल्दी घर आ जाना आज पूरी भाजी बनाऊँगी, दस दिनों से प्रीती खाना बना रही सो मुझे पता है किसी ने ढ़ंग से न खाया है” कितना कोमल मन होता है न स्त्री का भी, अपनों के लिए पिघलते जरा भी देर न लगती, प्रण ले लिया था अब चूल्हे चौके को हाथ न लगायेगी, जब पराये घर को भेज ही रहे तो फिर अब मुझसे उम्मीद किस बात की। पर आज जब बाबा की टिफ़िन में रोटी और सब्जी को छूटा हुआ पाया तो अपने आप को पसीजने से रोक न पायी।

अभी श्रुति पीछे मुड़कर जाने ही वाली थी कि बाबा ने आवाज लगाई “सारो सुनो जरा”

श्रुति : जी बाबा

शिव बाबू: कल जरा खेतों में खाद डालना है, अब आजकल अकेले कहाँ हो पाता कमर दुखती है, तूम कल सुबह आ सकते हो साथ में।

श्रुती : पर बाबा कल तो मेहमान आ रहे मुझे देखने, घर पे फिर मैं कैसे आऊँ यहाँ और आपको भी तो वहीं घर पे ही रहना होगा।

शिव बाबू : तो ऐसा करेंगे न, हम सुबह चार बजे ही ये काम आकर कर लेंगे फिर पूरे दिन भर की छुट्टी रहेगी।

श्रुति थोड़ा अचंभित तो हुई पर हामी भी भर दी : ठीक है आ जाऊंगी।

आज तलक ऐसा न हुआ था कि शिव बाबू ने कभी अपने बच्चों से खेत पे कोई काम करवाया हो, कहते फिरते थे खेतों में काम करवा के अपनी राजकुमारी सी बेटियों का रंग काला करवाना है क्या? पर आज अचानक से ऐसा क्या हो गया, श्रुति यही गुणा भाग करते करते घर को लौट आयी, पर उसे कोई संतोषजनक उत्तर न मिला।

जैसे तैसे को रात बीती, शिव बाबू से पहले श्रुति ही उठ गयी और बाबा को दरवाजे पे आवाज़ लगाते हुए बोली “बाबा चलो जल्दी करो चार कब के बज गए” शिव बाबू फटाफट तैयार हो कर श्रुती से बोलते हैं, “मैं आगे आगे को खाद लेकर बढ़ रहा तुम पीछे से जल्दी आना” श्रुति देखती है कि बाबा अपनी संभाल के रखी हुई खादी के कुर्ते पायजामे को पहन बिल्कुल तैयार हो कर नजरें बचा कर चुप चाप निकल रहे होते हैं। उसकी आश्चर्य का ठिकाना न रहा, भला ऐसे भी कोई खेत पे काम करने जाता है क्या?

थोड़ी देर में श्रुती जब सड़क पे आगे को बढ़ती है तो क्या देखती है कि बाबा गाँव से चलने वाली एक मात्र बस जो सुबह पाँच बजे रवाना होती को रोक कर खड़े थे और हाथ हिला के उसे तेजी से आने को कह रहे थे। श्रुति को माज़रा समझ में ही न आ रहा था, वो तो बस हाँफते हाँफते बस तक पहुँची और बोल पड़ी “बाबा क्या है ये सब कुछ बतलाओगे”

शिव बाबू बोले “अभी इतना वक़्त नहीं जल्दी बैठ बस में, गोरखपुर जल्दी पहुंचना है, नहीं तो सुबह सुबह इलाहाबाद वाली पैसेंजर छूट जाएगी”

गोरखपुर.. इलाहाबाद… मेहमान घर पे..पर .. पर.. इस से पहले की वो कुछ समझ या बोल पाती शिव बाबू उसका हाथ पकड़ के खींचते हुए बस में चढ़ गए।

(आगे जारी है… सारो की इस कहानी का हिस्सा बने रहिएगा)

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा,चौथी कड़ी)

Dear readers, I am glad to present here the fourth episode of this story. I hope that you all would have gone through the previous parts of the story. Those who haven’t, can find them in WordPress reader time line or by clicking on the links which i am mentioning here. I would request all of you to go through it and do give your honest opinion. would also love to hear that what you think, as how this story will or shall move ahead.

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First Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/बाबा-पहली-कड़ी/?preview=true

Second Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/story-2-बाबा-दूसरी-कड़ी/?preview=true

Third Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/21/story-2-बाबा-तीसरी-कड़ी/?preview=true

रक्त कैसा रक्त? वो जो आँखों से बहने को बेताब हो उठा था! शरीर के जख्म तो फिर भी ढँक जाते, पर दिल के? वो कहाँ छुपाये छुपते। आँखों मे घुल रहा वो नमकीन पानी भी तो लहू के माफ़िक ही था, जो श्रुती के गालों पर से ढुलकता हुआ, उसी के कदमों पे जा गिरा। क्या सिर्फ अश्रुओं को बहा देने मात्र से मनुष्य अपनी सभी घुटी हुई कुण्ठाओं से मुक्त हो जाता है? शायद नहीं, ये तो बस वो उस क्षणिक राहत के सामान है जो मृत्यु शैया पे लेटे व्यक्ति को अपनों के पास बैठे होने के एहसास मात्र से मिलता।

परीक्षाफल घोषित हुए ज्यादा दिन नहीं बीते थे। श्रुती के मन मस्तिष्क का वो प्रकाशित कोना, जो कि उम्मीद की किरणों के आखिरी डोर के साथ भी आशाओं की उड़ान को गति देने की इच्छा रखता था, वो हिस्सा बहुत सारे स्वप्नो को जी भर के जी लेने के लिए उद्यत हो रहा था। परंतु कहीं न कहीं उसे भी इस बात का भान था कि ये सब सिर्फ एक कोरी कल्पना मात्र बन कर न रह जाये। नियति को भी शायद छुपन छुपायी खेलने का शौक था, हुआ भी वही जिसका उसे डर था।

दस दिनों पहले की बात है, हर दिन की तरह शिव बाबू थके हारे शाम को बासे से घर को लौटे। पारो को आवाज़ लगाई पानी लाने को और आँगन के ओसारे पे बैठ रहे। श्रुती जो हर रोज बाबा को वापस आया देख, चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ जाते हुए बातों की गठरी का पुलिंदा खोल बैठती थी, आज नहीं उठी। उठती भी कैसे आँगन में बैठी गेहूँ के दानों से कंकड़ बीनती, वो भी तुलनात्मक भावनाओं के सागर में गोते जो लगा रही थी। क्या मैं भी इन पत्थर के कणों की तरह एक अवांछनीय पदार्थ भर तो नहीं ? क्या मेरा अस्तित्व समाज के लिये सिर्फ एक पूरक वस्तु मात्र तो नहीं? सवाल बड़े थे पर उत्तर कहाँ हाँसिल था।

सुबह सुबह बड़े मामा का एक जरूरी संदेश घर के एक मात्र फ़ोन जो पारो के पास रहता, पे आया था। माँ और दादी दोनों से बात हुई थी, कह रहे थे विष्णुपुर गांव में कोई लड़का है अभी अभी ही नई बहाली हुई है, पुलिस महकमे में, बतौर कॉन्स्टेबल, सारो के साथ जोड़ी अच्छी जमेगी। घर परिवार भी तंदरुस्ती में है, बाप सरकारी स्कूल में मास्टर , जमीन जगह भी काफी और संतानों में सिर्फ दो लड़के ही हैं। पिछले साल श्रावण मास के मेले में लड़के ने सारो को देखा है और पता चला है की वो पूरा ही लट्टू हो गया है उसपर, सो दान दहेज और लेने देने की तो चिंता ही छोड़ दो। जीजा जी से सहमति मिले तो अगले पूर्णिमा मेहमानों के साथ दरवाजे पे रिश्ते के लिए आ जाएं।

दादी ने कह दिया “शिव की तरफ से तो हाँ ही समझो, पढ़ाई को लेकर बतंगड़ बनाता था सो अब तो पढ़ाई भी हो गयी पूरी। अब क्या है लड़की सयानी हो गयी है नया घर संभालेगी, उम्र भी तो देखनी है। सारो के बाद अभी एक और भी तो है, पहली शादी निपटे तो उसके बारे में भी सोचें। फिर कुछ समय भी तो लगता दूसरी शादी के लिए बंदोबस्त करने में, तुम तो बात आगे बढ़ाओ मैं शिव को राजी कर लूँगी। मामा ने फिर दोहराया “लड़के को जब लड़की ही पसंद आ गयी है तो बात तो फिर तय ही समझो “

एक कहावत आज भी गांव देहात में खूब प्रचलित है, जो सुंदरता गरीबी में निखर कर दिख जाए तो फिर दिखावेपन पे ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं रह जाती। ईश्वर ने श्रुति को जितना ही गुणों से लबरेज रखा था, रूप में भी कोई कसर बांकी नहीं छोड़ी। चेहरे की हर बनावट उभर कर सामने आ जाती थी मानों किसी शिल्पकार ने बड़े शिद्द्त से नक्काशी की हो। जहां चेहरे की रेखाएँ अपने माँ से मेल खाती थी, तो कद काठी और लंबाई अपने बाबा से। घर में बस बाबा और श्रुति ही थे जिन्हें ऊंचाई के लिए सीढ़ी या सहारे की जरूरत शायद ही कभी पड़ी हो। यही वजह थी दसवीं पास करते करते ही घर पे रिश्तों का तांता सा लगना शुरू हो गया, माँ दादी की चलती तो कब की ये शादी तय हो जाती, पर ये तो बाबा ही थे जो कभी टस से मस न हुये। हर रिश्ते की बात के साथ कोहराम मचना तो तय था पर श्रुती को कभी इन बातों से फर्क नहीं पड़ा। पर क्या था ऐसा जो आज आये हुए इस रिश्ते की बात से वो अंदर तक से बिफर पड़ी थी। शायद इसलिए कि उड़ान की सीमायें पहले से ही तय हो चुकी थीं। जब भी इस बात को लेकर विवाद हुआ तो शिव बाबू हर बार ब्रह्मास्त्र चला देते की बारहवीं तक जब गाँव में ही स्कूल है, तो फिर पढ़ने देने में दिक्कत क्या है? वैसे भी कौन सी महँगी पढ़ाई है, सरकारी तो स्कूल ठहरा! पर बाबा के इस ब्रह्मास्त्र की मियाद भी अब पूरी हो चली थी।

शिव बाबू : सारो !! आज बाबा ने चाय नहीं पिलानी के, किस चिंता में डूबी है, और बालों ने भी ऐसे बना रखे हैं जैसे द्रौपदी के खुले केश। के हुआ तुझे, मुँह क्यों उतरा उतरा सा है।

श्रुति : अकचका कर अपने विचारों के मंथन से बाहर निकलते हुए बोली “बाबा आप आ गए, मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कुछ तो नही, बस तबियत थोड़ी सही नहीं । बहाना बनाते हुए श्रुति रसोई को चली गयी

शिव बाबू: थोड़ी देर से छाई चुप्पी को तोड़ते हुए बोले “सारो पता है, आज तुम्हारे स्कूल के हेडमास्टर साहब मिले थे रास्ते में आते वक्त, बड़ी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी। बोल रहे थे श्रुति को परसों स्कूल भेज देना, जिले से कोई शिक्षा अधिकारी आ रहे, सो वो तुमसे भी मिलेंगे।

श्रुति: जी बाबा चली जाऊंगी, वैसे भी अब तो फिर कभी स्कूल जाना नहीं है, सो आखिरी बार हो आउंगी।

श्रुति की माँ: पलंग पर से लेटे लेटे हुए ही, “हां हां, जाएगी क्यूँ नहीं, इसी स्कूल ने और तेरे बाबा ने ही तो तेरा दिमाग खराब किया है, बड़ी होती जा रही और बोल रही अभी शादी नही करनी।

रसोईघर से श्रुति के धीमे से सिसकने की आवाज सुनाई पड़ी। पारो और राहुल वक़्त की नजाकत को भाँपते हुए दरवाज़े को खिसक लिए। शिव बाबू को भी मामला पकड़ते देर न लगी, जरूर फिर से कोई रिश्ते की बात उठी होगी।

तभी दादी माँ कहीं बाहर से टहलते हुए आयी, श्रुति ने सबको चाय थमाई और अन्दर के कमरे में जाकर लेट गयी। लाल आंखों को छुपाने का कोई और तरीका भी तो न था। दादी ने मामा द्वारा भेजे हुए संदेश को और बढ़ चढ़ कर कह सुनाया, हर बार की तरह इस बार बाबा ने कोई जिरह न करी। इस बात पे तेजी से धड़कता हुआ श्रुति का दिल पूरी तरह धौंकनी देने लगा, उम्मीद अब पूरी तरह से जो टूट चुकी थी, आँखों से उसके अलकनंदा और मंदाकिनी की धार फूट पड़ी, पर कोई गर्जना न हुई। आज फिर से एक निरीह कन्या ने अपनी नियति को आत्मसात जो कर लिया था।

प्रीती ने किसी तरह रात्रि का भोजन अकेले ही तैयार किया, दादी का कोई मतलब था नहीं, माँ उठ नहीं सकती थी, और श्रुती उठी नहीं, न जाने कब की उसकी आँखें लग चुकी थी। धमाचौकड़ी मचाने वाला राहुल भी आज बहन को उठाने का भरसक प्रयास करता हुआ थक कर उस से लिपट कर सो रहा। बाल मन कहाँ जाने की उसकी सबसे बड़ी बहन आज उस से क्यूँ रूठ गयी है।

~ आगे जारी है..

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा, तीसरी कड़ी)

बाबा के वो शब्द ज्यों ही श्रुति के अवचेतन मन में गूंजे वो अपनी चेतना में वापस लौट आयी। उसे सुध बुध ही न थी कि वो कितनी देर तलक यूँ ही पेड़ के नीचे बैठी रही। ध्यान जब टिफ़िन पे गया तो हड़बड़ा कर उठी, फिक्र हो आया कि भोजन कहीं ठंडा न हो गया हो। सूरज थोड़ा और नीचे को उतर आया, धूप अब सीधे चेहरे पे आकर गिर रही थी मानो आँखों में ही उतरने को बेताब हो। पलकों के ऊपर हथेलियों का छांव करते हुए वह कुछ और तेज कदमों से चलने लगी। सुबह दो रोटी खाकर ही तो खेतों पे चले गए थे बाबा, पता नहीं कब से भूख लगी हो, खामखाँ सुस्ताने को बैठ गयी, उसे अब अपने ऊपर थोड़ी खीझ सी मची।

पचास की उम्र पार कर चुके शिवनारायण सिंह(बाबा), की कदकाठी यूँ थी मानों अभी भी अपने उम्र को हर रोज मात दे रहे हों, उनके साथ के कई लोगों ने तो बिस्तर की राह पकड़ ली, पर एक वो थे मानों सीने में अश्व का बल लिए घूम रहे हों। शिव बाबू अभी भी जोश और जुनून से भरे, मिट्टी में इस कदर गुथे थे जैसे बरगद की पुरानी जड़ें दूर तलक फैली हों। जिंदगी की झंझावातों ने कई दफा उनके हौंसलों पर आघात डालने की कोशिश करी पर वो अपने कर्तव्यों की कसौटी पे हमेशा अव्वल रहे। शायद उनके लिए तीनों बच्चे उस किले की प्राचीर की भांति थे, जिसे वो किसी कीमत पे टूटते हुए नहीं देख सकते थे, ये तो राजा के रूप में उनकी हार समान होती।

आज भले ही शिव बाबू एक निम्नवर्गीय किसान की हैसियत में आ गए हों, पर उनकी रगों में बहता खून अभी भी जमींदारी ही था। अतीत के पन्नों को टटोला जाए तो वे उन पूर्वजों के वंशज थे जो कभी हजारों एकड़ जमीन के मालिक हुआ करते थे। पर पूर्वजों के मानसिक दिवालियापन और विलासिता के दीमक ने सबकुछ तबाह कर डाला। पुरानी हवेली को खंडहर में तब्दील हुए तो अब सौ वर्ष बीत गए होंगे। गांव से कोई दो कोस दूर उसके अवशेष अपने इतिहास को रोते हुए दिख पड़ते हैं। अब गिनी चुनी पीढियां ही उस वंश की आखिरी हकदार के रूप में इस गांव में बची थी सो इस परिवार का मान अभी भी कम न हुआ था। कर्मठ मिजाज वाले शिव बाबू ने और भी इज़्ज़त अपने लिए सबके दिलों में कमाई। तीन भाइयों और चार बहनों में वो सबसे छोटे थे, घर की हालत इतनी तंग, कि पढ़ना लिखना तो बहुत दूर की बात थी। खेतों में दिन रात की मेहनत और कितनी ही जमीनों के बिकने के बाद चारों बहनों की शादी हो पाई, जो बचा उसी में से ढाई एकड़ उनके हिस्से आया। उन्होंने भी कमर कस ली और उसी जमीन के सहारे परिवार की आजीविका चलाने लगे। दो बेटियों ने भी इस आँगन में जब जन्म लिया तो भी उन दोनों को लक्ष्मी सा ही मान मिला। खेतों ने भी झूम के खुशियाँ बरसाई, फिर भी घर पे दरिद्रता ने अपने पंजों को गड़ाए ही रखा। बेशक सारी आमदनी का हिसाब किताब दादी माँ के पास हो, पर उनकी जेब हमेशा सारो और पारो की खुशियों के लिए भरा ही रहा करता था। हर साल दीपावली में जब नए कपड़ों की खरीदारी होती तो कुछ की कीमतों और उनके चमक में बड़ा भारी अंतर देख सब यही सोचते कि शिव बाबू ने बड़े सस्ते दामों में कितने अच्छे कपड़े खरीदे हैं, पर अंदर का भेद तो वही जानते थे।

श्रुती लगभग हाँफते हुये बासे पे पहुंची, पर वहाँ बाबा को न देख उसका दिल धक्क से रह गया। पता नही इन्तेजार करते करते वो कहाँ को चले गए होंगे वो सोच सोच कर के परेशान होने लगी। चौंकी का बिस्तर, वगेरह सबकुछ व्यवस्थित दिखा, गाय के चारे के दानों में भी भगोने पे बाकायदा उबाल आ रहा था और चूल्हे में आंच भी बराबर लगी हुई थी। हर दिन ये काम वो ही आकर किया करती थी, जो कि शिव बाबू पिछले कुछ दिनों से खुद ही करने लगे थे। वो सोचने को मजबूर हुई की कहीं बाबा मेरे चले जाने के बाद कि आदत तो नहीं डाल रहे, इतना सोचते ही एक कंपन की लहर सर से पांव तक दौड़ गयी।

वो टिफ़िन ले वहीं धम्म से मचान के ऊपर बैठ, बेमन हो झूलते अपने नंगे पाँवों को निहारने लगी। गीली पुतलियों से उंगलियों में अंतर कर पाना बड़ा मुश्किल था, और लाल नेलपॉलिश की लकीर ऐसी जान पड़ रही थी मानों नए घाव से बहता हुआ रक्त ही हो..

आगे जारी है..