Safarnama ~ 01 (Last Part)

INDORE ~ KANPUR ~ KATIHAR

कमरे में रखा फ़ोन घनघना उठा, नज़र गयी कलाई पे तो देखा दिन के 2 बज गये हैं, इसी सिलसिले में रिसेप्शन से भी फ़ोन आ रहा था। रेलवे एप्प पे चेक किया तो ट्रेन अभी भी उतनी ही लेट थी और 3 बजे ही स्टेशन पहुँचेगी। दुबारा मुँह हाथ धो कर बैग लेते हुए नीचे आया। बिल पेमेंट करते वक़्त नज़र टैक्स वाले कॉलम पे गयी, SGST और CGST देख आंखों में कौतूहल और आंखों में जिज्ञासा जाग उठी। बधाई हो जी.एस.टी लागू हो चुकी है। मैं इस संबंध में और भी पूछना चाहता था, पर वक़्त की पाबंदी की वजह से इस गंभीर विषय के महासागर में अभी डूबने उतराने की इच्छा सी नहीं हुई।

रिक्शा ले कर स्टेशन पहुंचा, यही कोई 20 मिनट लगे होंगे। धूप इतनी तेज थी की एक सेकंड भी बाहर खुले में खड़ा होना मुश्किल हो गया। वहीं थोड़े ही दूर पे माल गोदाम के पास ट्रक में बोरे लादते कई मजदूर दिखे। हाय रे गरीबी पेट पालने की इतनी जद्दोजहद। क्यूँ इतनी असमानता की कोई खा खा कर भी तरसे और कोई खाने को भी तरसे। यही सब सोचते हुए स्टेशन के अंदर आया। ट्रेन डिस्प्ले बोर्ड पे नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस का कहीं जिक्र ना देख कर, मजबूरन पूछताछ काउंटर के भीड़ का सामना करना पड़ा। बड़ी मुश्किल से नम्बर आया तो पूछने पे पता पड़ा ट्रेन 7 नंबर की प्लेटफॉर्म पे आएगी। कसम से उपरगामी पुल की सीढ़ियां चढ़ने में हालात फाख्ता हो गए, साँसें उखड़ने लगीं और दिल की धड़कनें दिमाग़ में धक धक करने लगीं। 10 मिनट तक तो वहीं पुल पे रेलिंग के पास खड़ा रहा तब जा कर जान में जान आयी।
एक एक कदम तौल कर नीचे उतरा, राहत मिली। पर प्लेटफॉर्म का खस्ताहाल देख कर मन फिर से खिन्न हो उठा। एक तो इतनी गर्मी, उमस उपर से पँखो की नाकाफ़ी व्यवस्था। ट्रेन आने की सूचना हुयी तो ध्यान इस बात पे टिक गया की बोगी कहाँ पे आकर रुकेगी। तभी ध्यान पिलर पे बैठे इस परिंदे पे पड़ी,

एक कबूतर टक टकी लगाए बैठा सबको बड़े जिज्ञासु भरी नजरों से देख रहा था। मानो कह रहा, मुसाफिर हो, आना जाना तो लगा रहेगा, ये मेरा शहर तुम तो ठहरे परदेशी। और अल्ताफ रज़ा का गाया ये गीत जो अपने वक़्त में काफी प्रचलित भी हुआ था बरबस ज़ुबाँ पे तैर आया। आज भी आप इन्हें गाँव गली मुहल्ले नुक्कड़ के पान की दुकानों पे बजते हुए सुन ही लेंगे।

तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे
सुबह पहली गाड़ी से, घर को लौट जाओगे

जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी
(खिंचे खिंचे हुए रहते हो, ध्यान किसका है
ज़रा बताओ तो ये इम्तेहान किसका है
हमें भुला दो मगर ये तो याद ही होगा
नई सड़क पे पुराना मकान किसका है)
जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी
आँसुओं की बारिश में तुम भी भीग जाओगे
तुम तो ठहरे परदेसी…

वाकई में मानना पड़ेगा दर्द की दहशत को, जो इस तरह के गानें दिलों में जगा कर तड़पा जाते हैं। आखिर आशिकी और जुदाई के दर्दों को शब्दों में पिरो कर एक नज़्म की शक्ल देना इतना आसान नहीं होता।

… तभी भारी भरकम धमक देती हुई लौह पथ गामिनी अपने प्लेटफॉर्म पे पधारने का समाचार सुना डाला। पूरे प्लेटफॉर्म पे भागम भाग मच गयी, मानो सब ऐसा सोच रहे कि जितनी जल्दी वो ट्रेन पे चढ़ जाएंगे, ट्रेन भी उतनी जल्दी ही चल देगी। मुझे कोई हड़बड़ी न थी, यहाँ पे पूरे 10 मिनट का स्टॉपेज था, सो इत्मीनान से अपनी सीट पे पहुंचा। लोअर बर्थ सीट थी विंडो के पास वाली, बिल्कुल मन माफ़िक, सो मन बाग बाग। बैग वगैरह सेटल करके बैठ गया, और सह मुसाफिरों का मुआयना करने लगा। 10 मिनट के अपने निर्धारित पड़ाव के बाद ट्रेन आगे के सफर के लिए इलाहाबाद की और बढ़ गयी।

नार्थ ईस्ट गौहाटी तक जाती और मुझे पता था की इस ट्रेन में अक्सर सेना के जवान जो कि आई.टी.बी.पी या बी.एस.फ से होते है वो सफर करते हैं। मेरे कंपार्टमेंट में भी दो जवान थे जो बी.एस.फ से थे और कूच बिहार जा रहे थे। चलो मन ही मन बहुत प्रस्सन हुआ कि सफ़र में ही सही पर सेना के जवानों से साक्षात्कार का मौका तो मिला। वैसे अपने एक चचेरे भाई साहब भी है जो भारतीय थल सेना में है, पर ये पहली बार था की जब किसी बी.एस.एफ के जवान से गुफ़्तगू करने का मौका मिला था। थोड़ी ही देर में उनसे बातों का सिलसिला सुरु हो गया।

पता चला उनमें से एक जवान ने कुल 9 वर्षों तक कश्मीर क्षेत्र में अपनी सेवाएं दी हैं, और उनकी पोस्टिंग भी अति संवेदनशील कठुआ, साम्बा, पूँछ और रजौरी सेक्टर में रह चुकी थी। फिर तो बातों ही बातों में कश्मीर के हालात पे कई ज्वलंत सवाल परत दर परत खुलती चली गयीं। आज पहली बार कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पे राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के अलावा सेना के दो जवानों का नजरिया सुन रहा था। बातें तो बहुत सारी हुई पर मैं उन सबको यहाँ नहीं लिखना चाहता क्योंकि हो सकता कुछ लोगों को ये बातें अपने देश विरोधी एजेंडे को और मुखर बनाने में थोड़ा ही सही पर योगदान कर दें। हाँ पर सारांश में उनकी कुछ टिपन्नियों को ज़रूर लिखना चाहूंगा,

“बहूत दिनों तक तो हाथ ही बँधे रहे वरना कब का समेट दिया होता इन सिरफिरे देशद्रोहियों को, अब जाकर थोड़ी छूट मिली है पर अब तो साँप भी काफी मोटा और जहरीला हो चुका है”

“रक्त पिशाचों के सामने अहिंसा और शांति पाठ से काम नहीं चलता, माँ दुर्गा और काली ही हमारे साथ रण क्षेत्र में विचरती हैं, और हनुमान चालीसा रक्त में उबाल लाता है।”

“माना सेना में भर्ती होने से पहले हमें भी नौकरी की चाहत होती, पर कुछ सोच के ही देश की सीमाओं को चुनते हैं, ये जो फौजी वर्दी है, है बड़ी अजीब चीज, इसे एक बार जो पहन लिया फिर कोई डर भय नहीं लगता।”

“क्या करें ऐसे भ्रस्ट सोच वाले लोग शायद ही किसी और देश में होंगें जो हमपर आरोप लगाने में तो तुरंत आगे आ जाते, पर देश के टुकड़े करने वाले नारे लगते तो उन्हें शर्म महसूस नहीं होती, और तो और उसी देश के टुकड़े के लिए हम तो शहिद भी हो जाते हैं

बातें तो और भी बहुत सारी हुईं पर उनका सार थोड़ा धार्मिक है, इसलिए मैं उन्हें यहाँ नहीं लिख रहा। मैं नहीं चाहता कि मुझ पर भी असहिष्णु होने का तमगा लटका दिया जाए।

बातों ही बातों में 4 घण्टे लगभग बीत गए और ट्रेन इलाहाबाद पहुँच गई। अब तक ट्रेन 3 घंटे लेट हो चुकी थी, और रात के 8 बजने को हो आया। मैं ज्यादातर सफ़र के दौरान रात के वक़्त भोजन नहीं करता इसी परंपरा को कायम रखते हुए एक आलू चिप्स के पैकेट और कोक से ही संतृप हो लिया।

अगला पड़ाव मुग़लसराय था जो इलाहाबाद से 3 से 4 घंटे का सफ़र है। ट्रेन के चलते ही सब सोने को तत्पर होने लगे। मेरे उपर वाली बर्थ के लगते ही मैं भी लेट गया इतने में घर से माँ का फ़ोन आया। माँ ने कहा परसों घर पे सत्यनारायण भगवान की पूजा रखी है सो पहले यहाँ आ जाओ। मैं हर बार जब भी घर के लिए निकलता तो पहले अपने ननिहाल चले जाता हूँ क्योंकि वो और भी आगे की और फॉर्बेसगंज में है जो नेपाल के बॉर्डर से लगा हुआ है। इस से सफ़र के दिन कम हो जाते और बार बार परेशानी भी नहीं उठानी पड़ती। यही सब सोच कर कटिहार तक का टिकट लिया था, वहां से फॉर्बेसगंज 3 घंटे का सफ़र है।

पर अचानक से आये इस खबर से मुझे अपने यात्रा में थोड़े बदलाव करने पड़े। अब मुझे अपने गाँव जाने के लिए सबसे पास वाले स्टेशन नौगछिया उतरना था जो कटिहार से 4 या 5 स्टेशन पहले ही आ जाता। यहां पे गाड़ी का स्टॉपेज भी है तो उतरने में तो कोई दिक्कत नहीं आनी थी। पर हाँ एक चीज परेशानी का सबब बन सकती थी, नौगछिया में गाडी पहुँचने का समय सुबह सुबह ही 4 बजे के आस पास है, और इतनी सुबह आँख लगी रह जाती तो दिक्कत आ सकती थी। पर इस समस्या का समाधान स्वयं रेलवे ने खुद ही कर डाला। मुग़लसराय पहुंचते पहुंचते ट्रेन 4 घण्टे लेट हो चुकी थी, रात के 12 बजने को आये थे, पटना अभी तो आना बाँकी ही था। इस हिसाब से ट्रेन, नौगछिया सुबह कम से कम नौ से पहले नहीं पहुंचने वाली थी, सो बेफिक्र होकर सो गया।

सुबह छः बजे नींद खुली तो पाया कि गाड़ी दानापुर (पटना से पहले) में ही खड़ी है। मन मस्तिष्क के सारे तार बिफ़र पड़े ट्रेन छः घण्टे लेट हो चुकी थी, हद होती किसी भी चीज़ की। पाटलिपुत्र जंक्शन होते हुए गँगा नदी पे बने हुए नए पुल को पार करते करते एक घण्टे का विलंब और हो गया। अब इस विषय पे अपना और सिर पीटने से कोई मतलब नहीं रह गया था। थोड़ी देर में बाँकी पैसेंजर्स को भी जब वस्तुस्थिति का आभास हुआ तो उनकी सुबह भी बदरंग हो गयी। हम सब ने फिर मिलकर अपने अपने हिसाब से केंद्र सरकार के खिलाफ भड़ास निकाली। वाकई में बातें जितनी भी की गई हों पर रेलवे के ढर्रे में कोई बदलाव आया हो, जमीनी स्तर पे तो ऐसा कतई प्रतीत नहीं होता। अजी प्लेन में जितने घण्टों में आप अपना सफ़र तय करते हैं, उस से कहीं ज्यादा ट्रेनें यहां तो लेट हो जाया करती हैं।

बरौनी जंक्शन पार करते ही जान में जान आयी, यहाँ से दो घण्टे का सफ़र बाँकी रह गया था। बरौनी आते ही ऐसा महसूस होता है कि चलो जी अब अपने इलाके में पहुँच गए हैं। खेतों में मक्के और केले की खेती की झलक दिखाई पड़ने लगती है। खगड़िया और भागलपुर का ये इलाका अपने मक्के और केले की खेती के लिए पूरे देश भर में प्रसीद्ध है।

खरीक स्टेशन के गुजरते ही मैंने अपना सामान वगैरह दुरुस्त किया, अगला स्टेशन नौगछिया ही था वहाँ ट्रेन मात्र दो मिनट के लिए ही रूकती सो पहले ही गेट के पास आकर खड़ा हो लिया। ठीक 11 बजे ट्रेन नौगछिया स्टेशन पे आकर रुकी। अपने निर्धारित समय से 7 घण्टे के विलंब से।

आपको बता दूँ नौगछिया अनुमंडल, भागलपुर जिले के अंदर आता है। भागलपुर गँगा के दक्षिणी तट पे और नौगछिया उत्तर में स्तिथ है। दोनों को गँगा पे बनी विक्रमशिला सेतू आपस में जोड़ती है। दोनों तरफ़ रेलवे की अलग अलग लाइनें गुजरती हैं, सो लोग अपनी सुविधा अनुसार दोनो रुट्स का उपयोग कर लेते हैं। भागलपुर के बड़े शहर होने को ध्यान रखते हुए नौगछिया को थोडा अच्छे तरिके से विकसित किया गया है, जंक्शन न होने के बावजूद भी यहाँ राजधानी समेत लगभग सभी ट्रेनों का पड़ाव सुनिश्चित किया गया है।

स्टेशन पे उतर कर थोड़ा फ्रेश हो लिया, घर से मुझे लेने बाइक से मेरा एक चचेरा भाई आया हुआ था। यहाँ से यही कोई 12 किलोमीटर पे मेरा गांव भगवानपुर (ढोलबज़्ज़ा) है, जो कोसी नदी के उत्तर में स्तिथ है। ये 12 किलोमीटर का सफ़र आज मात्र 20 मिनट का है, पर एक वक्त था जब इस दूरी को तय करने में तीन घंटे लग जाया करते थे। इसलिए इस छोटी सी दूरी के सफरनामे की दास्तां फिर कभी पुरानी यादों के साथ लिखने बैठूंगा।

12 बजे दिन के आसपास मैं अपने घर के आँगन में था, इंदौर से चले 44 घंटे बीत चुके थे। मेरे इस सफरनामे में आप सबों के भी शामिल होने का तहे दिल से आभार। फिर कभी आप सबों को ऐसे ही किसी सफ़र पे अपने साथ लिए चलूँगा, तब तक के लिए, अलविदा!! ध्यान रखिएगा!!

~ गौरव आनन्द

Advertisements

Safarnama ~ 01 (Second Part)

INDORE ~ KANPUR ~ KATIHAR

सुबह सुबह कानपुर का आसमां बादलों से ढका हुआ कुछ ऐसा जान पड़ रहा था, की मेघा अब बरसे तब बरसे। बस से उतरने पे जी हल्का सा भारी था, आखिर था तो बस का ही सफ़र। बस के आस पास ऑटो वाले तो ऐसे टूट पड़े मानों बिना बैठाए मानेंगे नहीं, पर मेरा जी थोड़ा पैदल चलने को हो रहा था। वाकई में इन ट्रॉली बैग्स ने सफ़र को काफी हद तक आरामदायक बनाने में अपनी अति विशिष्ट भूमिका अदा करी है। पूछा तो पता चला कि रेलवे स्टेशन कोई 4.5 किलोमीटर दूर है। दूरी बताने के साथ साथ सबने यह सलाह भी जरूर टपका दी कि भाई साहब थोड़ा दूर है आटो ले लीजिये।

इन सलाहों पे मन ही मन एक मुस्कान सी फुट पड़ी, मैं भी पुराने दौर के कुछ बातों को याद करते हुए एक हाथ से बैग को खींचते हुए आगे बढ़ने लगा। यही कोई 15 साल पहले की तो बात थी मैं उन दिनों हाई स्कूल का छात्र हुआ करता था। बिहार की तस्वीर उन दिनों कुछ और ही हुआ करती थी, उस समय यहाँ विकासवाद का नारा बुलंद न था। सड़कें तो थीं पर उनकी पहचान गढ्डों से ज्यादा हुआ करती थी। आज भी एक कहावत यहाँ बड़ी प्रचलित है की बिहार में दूरियाँ किलोमीटर में नहीं घंटों और कितने लीटर पेट्रोल जले इनमे मापी जाती थी। हम 90 के दशक में पैदा हुए लोग जो बिहार से रिश्ता रखते हैं, उन्होंने सही मायनों में एक युग परिवर्तन होते हुए देखा है। बहुत सारी चीजें अब एक इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं जो शायद अब हम अपने बच्चों को बड़े इत्मीनान से कहानियों के रूप में सुनाया करेंगे। आज भी याद है, हमारे गांव के सबसे पास का रेलवे स्टेशन नौगछिया हुआ करता था, और वहां से हमारे गांव की दूरी 12 किलोमीटर थी पर बीच में बिहार का शोक कही जानी वाली कोशी नदी बहा करती थी, इस तरफ स्टेशन से लेकर घाट तक तो रोड बनी हुई थी पर बाढ़ के दिनों में वो भी किसी काम की नहीं हुआ करती थी। नदी को नाँव से पर करना होता था जो अपने आप में कलेजा मुँह को लाने के लिए काफी था, और फिर दूसरी तरफ बियावान दियारा सिर्फ बालू और बालू। इस रास्ते पे सिर्फ साईकल, मोटर बाइक या फिर पैदल दो पैर ही चल सकते थे। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि कम से काम 10 से 15 किलो तक के बैग को कांधे पे लटकाए पैदल पैदल पूरे 12 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ा हो। अब तो ये बातें बेतुकी सी लगती हैं, कोई जल्दी विश्वास भी न करें।

नीचे एक तस्वीर डाल रहा हूँ जो बीते उन दिनों की याद दिला देती है, जब हमें भी कोशी नदी को नाव से ही पार करना होता था।

ये सब सोचते सोचते आधा किलोमीटर का सफ़र तय हो गया। नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस जिससे मुझे कटिहार तक जाना था उसका समय कानपुर में दिन के एक बजे है और पिछले अनुभवों से मुझे ज्ञात था की ट्रेन 1 से 2 घंटे लेट ही आती हमेशा। काफी समय बच रहा था अभी भी, सो मैंने भी घुमक्कड़ मनोभावों के आवेश में आकर ये शेष बचे 4 किलोमीटर की दूरी भी पैदल ही चलने की ठान ली। मैं यदा कदा अपने व्यस्त काम काजी लाइफ में भी लंबी दूरियाँ पैदल चलता रहता हूँ। हालाँकि कानपुर में लीये गए मेरे इस निर्णय पर मुझे बहुत पछतावा भी हुआ। कारण मैं अभी आपको आगे बताता हूँ।
बड़ा विचित्र ही संयोग कहेंगे इसे की जहाँ इंदौर का स्थान भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में पहले स्थान पे है वहीं कानपुर सबसे प्रदूषित महानगरों की सूची में हर बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराता आ रहा है, और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण थोड़ी ही देर में मेरे सामने नज़र भी आने लगा। जैसे जैसे मैं आगे बढ़ता गया गंदगी का स्तर भी समानुपातिक रूप से और भी विकराल होता चला गया। जहाँ तहाँ कूड़ों का अंबार सड़क किनारे पसरा हुआ था पूरे रास्ते भर, उपर से उन अवांछित चीजों के लिए सुवरों का आपस में लड़ना, और तो और इस संग्राम के बीच कुत्ते और गायें मानो सेनापति और महामंत्री की भूमिका अदा कर रहे हों। हर एक वो दृश्य मेरी नज़रों में कैद होता चला गया और मैं हर बार अपने इष्ट को इस बात के लिए धन्यवाद देता रहा कि पिछले जन्म जरूर कुछ अच्छे कर्म किए होंगे जो मुझे इंदौर में रहने और बसने का मौका मिला। बरसात का मौसम तो था ही ऊपर से इंद्र देव भी प्रसन्न हो उठे, हो गयी झमा झम बारिश सुरु। मैंने भाग कर तुरंत सड़क किनारे बने एक गोडाउन के छज्जे के नीचे शरण ले ली। बारिश तो दस मिनट में ही जाती रही, पर इसने तो सड़कों पे ही गंगा यमुना का संगम करा डाला, नालों में बहता पानी जो उफन कर बाहर आ रहा था वो अपेक्षाकृत काला था और सड़क पे बह रहे बरसात का पानी मटमैला। मुझे तो ऐसा मालुम हुआ मानों जिस घड़ी मैंने पैदल ही गंतव्य तक जाने का फैसला लिया था जरूर उस वक़्त माँ सरस्वती मुझसे किसी बात को लेकर रुष्ट हो गयी होंगी, और मुझे तो अब अचानक से हुई बारिश में भी उनकी ही इच्छा नज़र आ रही थी। पर मैं भी हूँ अपनी बात का अड़ियल, अब बस एक किलोमीटर का सफ़र और बाँकी था तो उसे भी मैंने पैदल ही पूरा किया। सजा मुकम्मल तरीके से पूरी की थी मैंने, मैं खुद को अपनी ही नज़रों में अपराधी मान रहा था।

मैं यहाँ ये शपष्ट कर दूँ की मेरा विचार यहाँ किसी शहर की नकारात्मक तस्वीर पेश करने की नहीं है, इसलिये गन्दगी की उन तस्वीरों को यहाँ पे डालना मैं उचित नहीं समझता हूँ। हर शहर की अपनी कुछ न कुछ मजबूरियाँ रहती है, हाँ पर जहाँ चाह वहाँ राह। शहर और राज्य प्रशासन को चाहिए कि वो अन्य शहरों से कुछ सीखें और सफ़ल प्रयोगों को यहाँ भी लागू करने की कोशिश करें।

रेलवे स्टेशन जाने से पहले एक होटेल में वाश एंड चेंज के लिए कमरा ले लिया, मेरी स्थिति इतना कुछ झेलने के बाद बिल्कुल मरणासन्न सी हो गयी थी। फ्रेश होने के बाद ही जान में जान आयी, भूख भी बहुत जोरों से लगी थी सो होटल के रेस्टोरेंट में ही बैठ कर प्रेम से अपनी पसंदीदा राजमा चपाती और वेज पुलाव का जमकर लुफ्त उठाया। अभी भी 11 ही बजे थे और रेलवे के एप पे चेक किया तो पता चला ट्रेन अभी 2 घण्टे लेट हो चुकी है और शाम के 3 बजे से पहले नहीं आयेगी। इतना थक चुका था की इस वक़्त मुझे ये लेट लतीफी भी अच्छी ही लगी। अपने फ़ोन में 2 बजे का अलार्म लगा कर और होटेल के रिसेप्शन पे भी वेक-अप काल का बोल वापस अपने कमरे में जाकर लेट गया।

(इस पोस्ट के अधिकांश अंश मैंने इसी कमरे में लेटे लेटे लिखी है, सोने का तो कोई सवाल ही नहीं था)

रिसेप्शन पे आर्डर कर कमरे में ही कॉफ़ी मंगवा ली, बस 2 बजने का इंतेज़ार था, ताकि स्टेशन के लिए प्रस्थान कर सकूँ।

(सफरनामा अभी जारी है, साथ बने रहिएगा..)

~ Gourav Anand

Safarnama~ 01 (First Part)

INDORE ~ KANPUR ~ KATIHAR

ये शहर है अमन का, यहाँ की फ़िजा है निराली.. यहाँ पे सब शांति शांति है..

सचमुच जब जब इंदौर शहर को शब्दों में एक गीत की माफ़िक महसूस करना चाहता हूँ तो, जेहन में ये गीत गूंज उठता है। वाकई में होलकरों द्वारा बसाई गयी ये नगरी काफी मायने में खास है। अब तो स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर के पूरे देश में पहले स्थान पे आने के बाद इसके नाम पे एक सितारा और जुड़ गया है। आज 6 वर्ष हो गए दिल्ली छोड़ कर यहाँ आये हुये, दिल इस कदर यहाँ रच बस गया कि ये शहर अब हर पल अपने पन का एहसास करवाता है।
खैर जब कभी इंदौर शहर के बारे में लिखने को बैठूंगा तो फिर काफी कुछ साझा करूँगा। आज तो मैं सिर्फ आपको अपने एक सफ़र के खट्टे मीठे अनुभवों का साझेकार बनाने आया हूँ।

इंदौर शहर का संपर्क देश के अन्य हिस्सों से हवाई यातायात और सड़क के माध्यम से काफी उम्दा है, पर रेलवे के मामले में ये काफी फिसड्डी रहा है। इसके पीछे कारण है इस शहर का मुख्य रेलवे लाइन पे स्तिथ न होना, जैसा कि भोपाल इस मामले में बहुत भाग्यशाली है। इस शहर से लगभग हर गिने चुने शहर के लिए ट्रेनें दी तो गयी हैं पर हर किसी के समय और दिन के हिसाब से ट्रेनें मिल जाएँ, इतने बहुतेरे विकल्प मौजूद नहीं है।

कुछ इन्ही समस्याओं से दो चार मुझे भी होना पड़ता है जब कभी घर जाना होता। इंदौर से पटना के लिए ट्रैन तो है पर मुझे पटना से भी आगे कटिहार तक का सफर तय करना होता जो की बंगाल से लगता हुआ बिहार का सीमावर्ती जिला है और लगभग पटना से 300 किलोमीटर। इसलिए दो बार ट्रैन चेंज करने की नौबत आ जाती है। सबसे मजेदार बात ये है कि पहली ट्रैन आपको सही समय पे पहुँच दे और आपकी दूसरी आगे की ट्रैन न छूट जाए इसकी संभावना लगभग ना के बराबर ही मान कर चलें। अभी कुछ दिनों पहले ही माँ बाबूजी को इंदौर – पटना एक्सप्रेस के भरोसे भेज दिया था और उनकी आगे की ट्रैन छूटते छूटते बची, जबकि दोनों ट्रेनों के समय में 5 घंटे का अंतर था। धन्य हो भारतीय रेलवे।

पर इन सब समस्याओं का मैंने एक तगड़ा सा तोड़ निकाला है, मानो आप यूँ भी कह सकते की अपनी काबिले गौर सुझावों के लिए, मैं रेलवे से संबंधित समस्याओं के लिए अपने कार्य स्थल पे उनका एक अनाधिकृत सलाहकार सा बन गया हूँ। इंदौर शहर माना रेल के मामले में पीछे रह गया हो परन्तु सड़क यातायात में ग़जब की तरक्की दिखायी है। रेल संपर्क के खस्ताहाल होने की वजह से निजी ट्रेवल और ट्रांसपोर्ट कंपनियों ने अपना साम्राज्य सा स्थापित कर लिया है यहाँ पर। आज की तारीख में आपको इंदौर से 800 से 900 किलोमीटर की दूरी पे भी स्थित शहरों के लिए स्लीपर बसें मिल जाएंगी। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, जयपुर, आगरा, मुम्बई, यहाँ तक कि हैदराबाद और गोआ तक के लिए भी ए.सी और नॉन ए.सी बसें चलती है। सबसे अच्छी बात ये है कि रेलवे की तरह ये लेट लतीफ नहीं होतीं, और मध्यप्रदेश की सपाट चिकनी बहुतेरे लेन वाली राज्य मार्गे सफ़र को बिल्कुल भी तकलीफदेह नहीं बनने देतीं।

चूंकि सारी बसें शाम के वक़्त प्रस्थान करती हैं, इसलिए दिन भर ड्यूटी करने के बाद आराम से आप बस ले सकते हैं। और फिर पूरे एक दिन की छुट्टी की बचत भी। यही सब नफा नुकसान तौलने के बाद मुझे बस द्वारा इंदौर से कानपुर और फिर वहाँ से गुवाहाटी जाने वाली किसी ट्रैन से कटिहार तक का सफ़र तय करना ज्यादा तर्कसंगत जान पड़ता है।

सब प्लानिंग कर ट्रैन का टिकट तो मैंने तीन महीने पहले ही ले लिया था। वरना बिहार – उत्तर प्रदेश से होकर जाने वाली ट्रेनों में ऐन मौके पे टिकट मिलना तो दूर की कौड़ी तक भी संभव नहीं। मेरे साथ एक और भी बड़ी विचित्र समस्या है, इतने साल बीतने के बाद भी ट्रेवल सिकनेस की दिक्कत रहती है। कुछ वर्ष पूर्व तक तो रेलगाड़ी के अलावा किसी भी बंद गाड़ी चाहे वो बस हो या कार मैं उसके अंदर सफ़र तो क्या बैठ भी नहीं सकता था दस मिनट से ज्यादा। वैसे अब तो बहुत राहत मिली है, खुली बसों में सफ़र कर लेता हूँ। पर वातानूकुलित बन्द गाड़ियों से तो मेरी हाय तौबा है, घुटन होते ही उबकाई आने लगती। भगवान बचाये, ईसलिये मजबूरी में नॉन ए.सी विकल्पों का ही सहारा लेना पड़ता। वैसे मानिए या ना मानिए जो मज़ा खिड़कियां खोल कर सफ़र करने में है वो बंद शीशों के पीछे से कहाँ।

जिस बस में मेरा टिकट था वो एक नामी ट्रेवल कंपनी की थी, लगभग हर एक रूट पर उसकी बसें डली हैं जहां जहां को इंदौर से बसें जाती है। शाम के 5.45 पे बस के आने का समय निर्धारित था, और सही समय पे बस आ भी गयी। सारी औपचारिकताएं पूरी कर और लगेज बैग को पीछे वाले कंपार्टमेंट में ठिकाने लगा कर अपनी सीट पे आकर जम गया। मन बड़ा प्रसन्न हुआ जा रहा था आखिर लगभग एक साल बाद जो अपने गांव को जा रहा था। थोड़ी ही देर में गाड़ी हवा से बातें करने लगीं।

और देखते ही देखते शाम का धुंधलका भी आसमान पे पसरने लगा। अस्ताचल होता सूर्य मानों अपनी सारी किरणों को समेट लेने को वयाकुल हो उठा हो।

इस मनोरम दृश्य को देखकर मन मस्तिष्क को भी बड़ा सुकून सा महसूस हुआ। थोड़ी देर में रंग और भी गहरा गया।

उमस से भरे वातावरण में रफ़्तार पकड़ती हुई बस की खिड़कियों से आती हुई ठंडी हवाओं ने अपना जादू दिखलाना शुरू कर दिया। मुझे पता भी नहीं चला कि मैं कब गहरी नींद के आगोश में ढुलक गया।
रात दस बजे के आस पास जब बस ब्यावरा पहुंची तो कंडक्टर साहब की आवाज से नींद खुली। बस एक रोड साइड मोटेल पे खड़ी थी और उन्होंने सबको अपनी इच्छानुसार खा पी लेने का समन सुना दिया, बस आधे घंटे रुकेगी। उमस जस की तस थी, खाने पीने को कुछ जी हो नहीं रहा था सो बस ठंडी हवा खाने को ही नीचे उतर आये। अध कच्चे नींद की वजह से सर भारी था तो चाय की तलब सी हुई। एक बोतल ठंडा पानी गटक कर चाय को भी ठिकाने लगा दिया, और कर दी रात के भोजन की इतिश्री।

थोड़ी ही देर में हम फिर से अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गए। चार्जिंग पॉइंट की फैसिलिटी ने दिल बाग बाग सा कर दिया, कम से कम जी भर के गाने सुनने का इंतेज़ाम हो गया था। गाने सुनते सुनते कब दुबारे आँख लग गयी पता ही नही चला।

सुबह सुबह जब नींद खुली तो माँ नर्मदा को अर्पित इंडियन ओसियन एल्बम का ये गीत बस के म्यूजिक सिस्टम पे प्ले हो रहा था..

मां रेवा थारो पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!

अमरकंठ से निकली है रेवा,
जन-जन कर गयो भाड़ी सेवा..
सेवा से सब पावे मेवा,
ये वेद पुराण बतायो रे !!

मां रेवा थारो पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!

कहने की बात नहीं मन इतना प्रफुल्लित हो उठा कि रात भर के सफर की सारी थकान जाती रही। कहाँ बस झांसी को पार करते हुए, गँगा के मैदानी इलाकों में दौड़ रही थी पर इस गीत ने अंतरात्मा को माँ नर्मदा के सुरम्य वादियों में पहुँचा दिया जिस होकर वो बहती हैं। मैंने भी माँ नर्मदा को काफी करीब से महसूस किया है। जब जब इंदौर से ओंकारेश्वर गया हूँ तो इसके जल से अभिषेक करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हल्के हरे और नीला रंग लिये माँ रेवा मानो ऎसी मालूम पड़ती है जैसे कितने ही गहरे रहस्यों को इसने अपने अंक में समेट कर रखा हो। पवित्र नदियों में माँ नर्मदा को बहुत ऊंचा ओहदा प्राप्त है।

हररररर… हररररर… नर्मदे!!!

इन्हीं बातों में गुम था की बस फिर से सुबह के चाय नास्ते के लिए रुकी। सच कहूं तो वैसे पूरे चेहरे पे धूल की एक परत सी जम गयी थी। इच्छा तो हुई की स्नान ही कर लूँ, पर अफ़सोस ये ख्वाइस यहाँ पूरी होना सम्भव सा न था। मुंह हाथ धो कर थोड़ा तरो ताज़ा भर हो लिए। अब वैसे भी सुबह की चाय तो सांसों की माफ़िक जरूरत की चीज़ बन चुकी है उसके बिना कैसे रहा जाए, और गरम गरम तले जा रहे प्याज के पकौड़ों को देखकर मुँह में लार उतर आया। चाय के साथ पकौडे खा कर भूखे उदर और निस्तेज मन में नये ऊर्जा का संचार हुआ।

अब कानपुर के लिए अंतिम चरण का सफ़र शुरु हुआ, बस 3 घंटे का सफर और बाँकी रह गया था। देखते देखते ये भी कैसे बीत गए पता भी नहीं चला। कानपुर के औद्योगिक छेत्र रनिया की शुरुआत हो चुकी थी, कई छोटे बड़े कल कारखाने नज़र आने लगे। ऎसे भी कानपुर भारत के मानचित्र पे अपने औद्योगिक उद्यम की वज़ह से ही प्रख्यात है। कोई शक नहीं कि इसी वजह से कभी कानपुर तो कभी लखनऊ उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े शहर होने का तमगा आपस में हस्तांतरित करते रहते है।

बस अब कानपुर शहर में घुसने ही वाली थी, आर्म्स एंड ऑर्डिनेंस फैक्ट्री भी नज़र आ गयी। शायद इसी ने कानपुर को ब्रिटिश काल से ही भारत मे विख्यात कर दिया था। कोलाहल और ट्रकों को क्रॉस करते हुए बस अपने निर्धारित स्टॉप फ़ाज़लगंज पहुँच चुकी थी, घड़ी में सुबह के 9 बज चुके थे। गाड़ी सही समय पे आ गयी थी, बधाई।

(आगे का सफ़रनामा अभी बाँकी है.. साथ बने रहियेगा।)

~ Gourav Anand.