01 ~ सफ़र अभी बाँकी है

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कह दो की अब दुआओं का,
कोई असर नहीं आएगा।
मैं भी सब कुछ भूल जाने की,
कोई वाज़िब वजह ढूंढ लूँगा।
वरना जाहिर सी बात है,
यूँ बेख़ुदी में बरबाद हुये तो,
मोहब्बत की परिभाषा पे,
एक बदनुमा दाग तो लगेगा।

लंबे इस पूर्ण विराम से,
जो तुमने खुद को बांध लिया है,
मन में मेरे सवालों का,
भीषण बवण्डर सा उठ गया है।
किसी अनहोनी की आहट से
और तुम्हें खो देने के डर से,
रिश्तों का सारा आवलंब,
तार तार हो बिखर सा गया है।

पूर्वाग्रहों से ग्रषित हो तुमने,
स्वछंद विचारों पे अपने,
डाल रखी हैं पाबंदियाँ,
कुण्ठाओं का ये कैसा ग्रहण है?
परिणाम इसके घातक होंगे!!
बेरुखी के आवरण से,
सारी उम्मीदें हैं ढँकी पड़ी,
डगमगाते खयालों को अपने,
ठहर कर, जरा संभालने होंगे।

समाधान जरूरी है,
और निष्कर्ष भी,
सफ़र अभी बाँकी है।

~Gouri

Published. : 02 June 2017
Republished : 24 September 2017

© 2017: Shabd Ragini By Gouri

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Random Thoughts ~ 03, Ramdhari Singh Dinkar

“Sinhashan Khali karo ki Janta Aati hai” ~ Ramdhari Singh Dinkar.

Dear all irrespective of language barrier I would request all of you to pay your respect to great indian literary legend Ramdhari Singh Dinkar, its his birth anniversary today.

BORN : 23rd September 1908

DIED : 24th April 1974

वक़्त बीत जाया करता है और कभी कभी तो एक युग भी बीत जाता है, पर विरले ही कुछ ऐसे सख्शियत इस भारत भूमि पे पैदा लेते है जो चीर काल तक के लिए नमन के हक़दार बन कर ही इस दुनिया को अलविदा कहते है। इन्ही में से एक हैं हमारे “रामधारी सिंह दिनकर” ।

जी हाँ मै बात कर रहा हूँ अपने राष्ट्रकवि और जनकवि “दिनकर” जी की, आज उनकी जयंती है। नाम जाना पहचाना है, शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने अपने शिक्षण काल के दौरान दिनकर जी को नहीं पढ़ा होगा, वे वीर रस के महान कवियों में से एक थे। उनके शब्द आम जनमानस के दिमाग के साथ साथ साथ उनके दिलों में भी उतर आते थे। जहाँ उनकी रचनाएँ स्कॉलर्स के लिए रिसर्च का विषय रही है वहीँ भाषा इतनी ओजपूर्ण तथा सरल थी की खेतों में काम करने वाले आम मजदूर और किसानों को भी रोमांचित कर डालती थीं।

दिनकर जी का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले में हुआ था, उसी बिहार की धरती से जिसने भारत को उसके प्राचीन इतिहास से लेकर वर्तमान तक न जाने कितने ही अनमोल रत्न दिए। मैं बिहार वासी होने से इस बात पे कई दफा गर्व भी महसूस करता हूँ।

दिनकर जी मेरे सबसे प्रिय कवि हैं, भागलपुर विश्वविद्यालय से उनका नाता होने से मैं भी खुद को उनसे जुड़ा हुआ पाता हूँ क्योंकि मैंने भी अपनी शिक्षा का एक अंश वहीँ से ग्रहण किया है।

मैं ज्यादा कुछ और तो नहीं लिखूँगा पर आप सबों से अनुरोध करूँगा की अगर आप को हिंदी आती है तो उनकी कविताओं को एक बार जरूर पढ़ें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। मैं यहाँ पे उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं को भी लिख रहा हूँ, एक बार जरूर पढ़ें

1. कलम, आज उनकी जय बोल

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल.

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल.

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,

जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल.

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल.

2. हमारे कृषक

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है

मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है

बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं
बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं

पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना
चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना

विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती

कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती है
दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है

दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है
दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं

दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे
दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे

दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से
दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से

हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं
दूध-दूध हे वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं.

3. भारत का यह रेशमी नगर

भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में.
दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में.

रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखनेवालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्या घर भर पेट बांधकर सोये हो?

असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में, कया जल मे बह जाते देखा है?
क्या खाएंगे? यह सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है?

देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को, जिन की आभा पर धूल अभी तक छायी है?
रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पायी है.

पर तुम नगरों के लाल, अमीरों के पुतले, क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे?
जलता हो सारा देश, किन्तु, होकर अधीर तुम दौड़-दौड़कर क्यों यह आग बुझाओगे?

चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गांव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियां नहीं कम होती हैं
धुलता न अश्रु-बुंदों से आंखों से काजल, गालों पर की धूलियां नहीं नम होती हैं.

जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें, आराम नयी दिल्ली अपना कब छोड़ेगी?
या रक्खेगी मरघट में भी रेशमी महल, या आंधी की खाकर चपेट सब छोड़ेगी.

4. परशुराम की प्रतीक्षा

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?

यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।

चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।

है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है.

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में.
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है.

ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो.
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है.

जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है;
है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं.

वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है.

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है.
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है.

तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में.
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं.

पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा.

जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें.

कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें.

हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो.
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?

हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !

जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,

रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा.

5. समर शेष है

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान.

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है .

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार .

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध.

Rhythmic Words ~16

कभी अपनों के ही लिहाज़ से,
तो कभी ग़ैरों के भी हिसाब से,
बदलता रहा खुद को बारबार।
सबकी जरूरतों के अनुसार,
गढ़ डाले कितने ही मैंने किरदार।

परायी खुशियों की भी दुहाई देकर,
दुरुश्त करता रहा हर दफ़ा उनके,
जीवन पथ का हर एक जर्जर रास्ता।
दुनिया को फिक्र नहीं तो गम नहीं,
मुझे तो याद रहा समझौतों का वास्ता।

~ गौरी

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Story – 2. बाबा ~ पहली कड़ी

Dear All, Greetings!! Based on entangled threads of socioeconomic conditions of our country, I have come up with a new story, which I would put here in few parts. I would like all of you to feel the depth of emotional gravity of human thoughts which would finally conquer the demonic forces of poverty and illiteracy. A bud of hope and aspirations would see the new day light. Do share your views and thoughts hope to hear from all of you)

पांव उसके कुछ उखड़े उखड़े से थे। मन अनमना सा हो रहा था। सड़क वही जानी पहचानी, फिर भी एक संशय की स्तिथि में गुम हो धीरे धीरे उसके कदम आगे को बढ़ रहे थे। बैसाख महीने की तेज धूप में अपने सर को पल्लू से ढंक, एक हाथ में टिफ़िन का डब्बा लिए वो चली जा रही थी। कच्ची सड़क पर तेज गर्म हवाओं से जब धूल का एक गुबार उठता तो परेशान हो वो मुह फेर कर थोड़ी देर के लिए खड़ी हो जाती। और वेग कम होते ही फिर चलने लगती। दियारा पास में होने की वजह से गर्म दुपहरी में ऐसा होना एक आम बात थी।

पर आज कुछ था जिस वजह से श्रुति अंदर ही अंदर घुली जा रही थी। दोपहर के समय रोज इसी एक चीज़ में उसे सबसे ज्यादा तसल्ली मिलती, जब वो स्कूल से वापस आकर अपने बाबा के लिए खाना लेकर बासा पे जाया करती। घर से कोई एक कोस की दूरी पे बासा था, फिर भी कच्ची सड़कों को रोज नापने में उसे सबसे ज्यादा ख़ुशी मिलती। उसे आया देख उसके बाबा के झुर्रीदार चेहरे पे जो हल्की सी मुस्कान बिख़र आया करती थी वो उसके लिए किसी जेवर की चमक से कमतर न मालूम पड़ती थी।

एक निम्नवर्गीय किसान परिवार में जन्मी श्रुति तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, उससे छोटी उसकी बहन प्रीति और सबसे छोटा भाई राहुल था। श्रुति नाम उसके नाना जी ने रखा जो उसके बाबा के जुबान पे कभी न चढ़ पाया, वे उसे सारो और प्रीति को पारो ही कहकर बुलाते थे, शायद ई की मात्रा से उनका पुराने जन्म का कोई बैर रहा होगा, क्योंकि उन्होंने राहुल के नाम से कोई छेड़ छाड़ जो नहीं करी। सारो से तो कोई दिक्कत न हुई पर पारो नाम से बेचारी प्रीति कई मर्तबा व्यंग्य का शिकार हुई, इस बात को लेकर उसकी बाबा से एक अघोषित नाराजगी आज तलक जारी है।

कुछ दिन पहले ही श्रुति के बारहवीं के नतीजे घोषित हुए थे, अपने स्कूल में विज्ञान सर्ग में सबसे अच्छे दर्ज़े में पास हुयी थी। पर पूरे घर मे मानों सिर्फ वो और उसके बाबा ही थे जो इस बात पे फुले न समा रहे हों। माँ और दादी तो जैसे कोई बूत हो, कोई प्रतिक्रिया ही न हुई उनकी तरफ से, बहुत बड़ा भेद था ये, जिसे सिर्फ श्रुति ही जानती थी। अपने दिल पे एक भारी सा पत्थर रख कर उसने भी अपनी नियति से समझौता करने की तैयारी कर ली थी। पर कहीं न कहीं इस बोझ के तले उसका मन और हृदय गहरे गर्त में फिसलता जा रहा था। घर में कोई भी पढ़ा लिखा न था न माँ न बाबा, दादी अभी भी पुरातन ख़यालों की पूजक थी। ऐसा न था कि उसके अशिक्षित बाबा अपनी पढ़ी लिखी बच्ची के मनोभावों से अवगत न थे, पर वो भी मज़बूरी की जंजीरों में जकड़े हुये थे..

आगे अगले अंक में जारी /To be continued in next episode.

Image source google.

~ गौरी

Rhythmic Words ~ 15

(हिंदी के प्रति एक बाल मन की अभिव्यक्ति)

हिन्दी तू है तो तुझमें रो लेते है।
हिन्दी तू है तो तुझमें गा लेते है।
हिलती है जब मन की दीवारें,
तो हिन्दी,
तेरे शब्दों की शीतल छांव में,
जिंदगानी के किस्से लिख लेते है।

~ गौरी

18 ~ विश्वासघात

(Note : Dear all before you go through this poem there is one clarification which I want to put here. My this poem is totally on a different note which I don’t write often. But I think as a writer different thoughts and situations roam into your mind and if you don’t justify them it would be an injustice to your art of writing. Personally I believe that any relationship works when both parties are bonded into a mutual bond of trust and respect, if anyone betrays and that too just for sake of pleasures, it’s a kind of a sin. Here I have portrayed the strong and regretful emotions of a man who have been cheated by his better half. I agree that some of the words are too harsh which I not use in normal circumstances but they are in lieu with the essence of this poem. I hope you all would also agree with that, and please do give your honest opinion about this. And also sorry in case any of my words may have hurted to any sort of civilised sentiments)

बेच दी तूने सारी शर्मों हया,
जिस्मानी ख्वाहिशों से सजे बाज़ार में।
ओढ़ कर नग्नता की चादर,
चुनवा दी अपनी लज़्ज़ा भी, दीवार में।

वासना की आग से उद्वेलित,
ओ स्वार्थ में डूबी, पाखंडी पुजारिन।
हा! तू कोई और नहीं, पतित,
है हवस की भूखी, अंधी भिखारिन।

हाँ ये अपशब्द हैं, पर मैं कहूंगा।
लाज जब तुझे न आयी, प्रिये,
तो में भी क्यूँ तेरा मान रखूंगा।
तू कोई देवी नहीं, बस इंसान है!
तेरे पाप को मैं, पाप ही कहूंगा।

वो प्यारा सा बंधन,
मेरा था तुझको अर्पण।
विश्वास से लबरेज,
सजाया था अपना आँगन।
रात वो थी कितनी काली,
दी थी जब तुमने भरोसे को
एक भद्दी सी गाली।

वो मंजर है नज़रों में कैद,
कसक कर जो रहता जिंदा,
गैरों की बाहों में तेरा बदन,
इश्क़ मेरा, मेरी ही पलकों पे,
होता है रोज़ रोज़ शर्मिंदा।

अब..

मुझसे लिपट माफ़ी न माँग,
पांव जकड़ अलाप न कर।
जाकर बस अपने कर्मों के,
पश्चाताप का कोई हवन कर।
मैं भी तेरा कोई खुदा नहीं,
मुझसे कोई फरियाद न कर।
मुझसे कोई फरियाद न कर।

~ Gourav Anand

© 2017: Shabd Ragini By Gouri

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Rhythmic Words ~ 14

सब्त है उसकी पलकों पे मेरी चाहत के निशां,
लरज़ते हुए लबों पे, पसरे हैं सारे अनकहे बोल।
हया की लकीर खड़ी इज़हारे-इश्क़ के दरम्यां,
तोड़ शर्म-ए-जंजीर, कैसे कहेगी वो पहले बोल।

~गौरी