My Sketch Book ~ 02

A random face from magazine: 😊😊

And one different look.. courtesy instagram filters

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एक शहर ढूंढते हैं!

(Those empty roads says a lot, Just listen to it)

हर सोच है ठहर सी जाती,
उलझनों के गली मोहल्लों में।
उम्मीदें साथ लिए दौड़ती,
गुम ये शहर तो हो-हल्लों में।

एक कारवाँ कभी यहाँ उठा,
तो दूजा हो तैयार वहां बैठा।
ख्वाब खोखला एक देखा,
दिलों में रखकर मुमताज़,
बुनते सबको ताजमहल देखा।

घुल गए वो वास्ते चाहतों में,
कटे शाम जो मय के आहतों में।
टूटी उन बुलंदियों को समेटे,
लौटते हैं वो अपने चमन को,
पूछते पता रात के फैले सन्नाट्टों में।

न जाने क्यूँ मर मर के भी,
सब ख़ुश रहने को हैं बेताब।
डाल ग़मों पे नकली पर्दा,
और खुद से ही हो बेपर्दा,
निकल लेते हैं ओढ़े हिज़ाब।

शहर का लहू काला है,
गाढ़ा हो चला है उसका सैलाब।
रगों में क्या बहेगा,
जिस्म में क्या उतरेगा,
मिला दे गौरी,
थोड़ी सी इसमें खौलती हुई तेज़ाब।

~Gouri

My Sketch Book ~01

What happens when you pick up the sketch pencils after 20 years, yes that exactly happened with me yesterday. I really forgot that how much I had loved those drawing classes as a toddler and school going kid. Credit for this revival of interest goes to Ravish Raj. He is available on WordPress and his art work really inspired me to draw some curved lines again. Thanks Ravish.

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Disturbed Thoughts ~ 01, निर्लज्जता

(My mental equilibrium got so much disturbed because of Bhopal gangrape incident that I had to create a new section on my blog, because I couldn’t justify what I wrote in category of a poem)

ऐ मर्दों की शिखंडी जात,
करनी है तुमसे कुछ बात!
शर्म नहीं आती जो तुम्हें,
कुछ तो वजह होती होंगी?
करो मुकम्मल वो तारीख़,
जबसे शहर में फिर कभी,
बहन बेटियों की हमारी,
अस्मत नहीं लुटा करेंगी।

वो बन भूखे नरपिशाच,
लिए हवस की गंदी प्यास!
मिलकर नोच डालते हैं,
कोमल अबला जिश्मों को।
और सारी दोगली जमात,
दुबकी रह जाती है घरों में,
रख बेशर्मी के हाशिये पे,
अपने पुरुसार्थ के रश्मों को।

वाह रे झूठी इंसानियत!
कैसी ठहरी ये तेरी नियत।
टुकड़े अपने जीगर के हों,
तो दर्द तुम्हें भी होता है।
पर चीखती वो गुड़िया,
जो परायी देहलीज की हो,
तो फिर फ़र्क नहीं तुम्हारे
दिले – दीवारों पे पड़ता है।

देख सको तो देखना!
खोखली उन आंखों में,
गुम हुयी खुशियाँ जिसकी
अब कभी न मुस्कुरायेगी।
आंक सको तो आंकना!
सो चुके अपने अंतर्मन में,
मानसिक नपुंसकता की,
ये वहशीयाना नुमायन्दगी!

कटी जो उंगली कभी,
अपनी बच्ची सलोनी की,
तो बहता लाल रक्त देख !
कैसे तुम भी रो पड़े थे।
कभी सोचा उसके लिए!
अंतः बदन से जिसके,
दोनों पांवों से लिपटकर,
सुर्ख लहू रीस पड़े थे?

~ ग़ौरी

Image courtesy : Google.

Rhythmic Words ~ 22

बदनाम हुए हैं हम सारे शहर में जिनके नाम से,
उन्हें हमने कभी जी भर के देखा तक नहीं।
लापता हुए वो जिस अफवाहे-इश्क़ को हवा दे,
उस किस्से में हमारा कोई किरदार तक नहीं।

~ Gouri

Random Thoughts ~ 05. My Small Library.

It’s a hectic life and when everyone seems to be busy with there own complicated issues, where and with whom do we introverts would find solace. Yes !! guessed it right.. books.

Sorry my small library.. I am little late to confess that you are my world, my love and all source of happiness. Sorry that now a days I have got too busy with my job life and rarely get any quality time to spend with you. Sorry that few days back, when every where deepawali cleaning mode was on full swing, I didn’t bothered to remove those extra heavy layer of fine dusts, which had got settled on your shelves.

But today I couldn’t withhold those painful looks you were throwing at me.. my dear true love believe me I am not cheating on you and neither I have got any girlfriend.. still you are my hunny bunny. It’s just that I am stucked.. but wait today we are going on a date.. yes!! Yes!! And Yesss.. Muahhhhhhh..

Let me get you ready first my beautiful lady…

Ohh my god you have got so many colours.. how come I never saw that.. and you are multilingual too.. Hindi, English, Urdu, French, Sanskrit and even German too..

Some damp duster.. Some dry duster… That’s all you needed as makeup kit.. whoaaah you are so cost effective in my small budget.. Hi hi… 😂😂 Just joking my darling, see I am giving you my million dollar smile and best part my heart is all yours.

Here now you are ready my lady love… Now it’s time to have some dance and romance.. 😊😊

Be with me always.. my small library.

Novella – 2. ~ बाबा (एक दीर्घ कथा, पांचवी कड़ी)

Dear all, glad to present here the fifth episode of this story, I should better adress it as a novella, because as per the length it doesn’t fit into criteria of story and neither that of a novel. I hope that you all would have gone through the previous parts of the story. Those who haven’t, can find them in my WordPress reader time line or by clicking on the links which I am mentioning here. I would request all of you to go through it and do give your honest opinion.

Be a part of Shruti (Saro) story.

First Episode :

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/बाबा-पहली-कड़ी/?preview=true

Second Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/story-2-बाबा-दूसरी-कड़ी/?preview=true

Third Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/21/story-2-बाबा-तीसरी-कड़ी/?preview=true

Fourth Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/23/story-2-बाबा-चौथी-कड़ी/?preview=true

प्रीति रसोई के सारे काम निपटा कर श्रुती को उठाने की कोशिश करने लगी। “दिदिया ओ दिदिया, खाना खा ले, सबने खा के बिस्तर की राह भी पकड़ ली, उठ कब तक यूँ मुँह फूला के पड़ी रहेगी”

श्रुती ने पहले तो एक दो बार अनसुना कर दिया पर फिर थोड़े झुंझलाहट में आकर बोल पड़ी “नहीं खाना मुझे, एक दिन नहीं खाऊँगी तो कोई मर थोड़े न जाऊंगी।”

पर प्रीति भी कहाँ हार मानने वालों में से थी, इस बार भावनात्मक पहलू का सहारा लेकर बोली “अच्छा चल तू न को भी खा कन्वारी माँ, पर तेरा ये लाड़ला कौन सा तेरे बिना खाने वाला है उसे तो भूखा मत रख।”

इस बार श्रुती एक लंबा निःश्वास छोड़ते हुए उठ बैठी, और पूछा “कहाँ है वो”।

प्रीति ईशारा करते हुए बोली “ये तो रहा तेरे पीछे बैठा है, कब से तो जगा रहा था तुझे पर एक तू है कि उठ ही नहीं रही।”

उनींदी आँखे की वजह से वह राहुल को देख नहीं पायी थी, उसने अपने दोनों हाथ राहुल के काँधे पे रखा और थोड़ा सख्ती से हिलाते हुए गंभीर आवाज़ में बोली “क्यूँ रे क्यों नहीं खाता तू मेरे बिना, अब चली जाऊंगी थोड़े दिनों में फिर क्या करेगा, मर गई तेरी …” इतना बोलते बोलते उसका गला भर आया,आगे को कुछ बोलती तो लफ्ज़ रुंध जाते।

इतना सुनते ही राहुल जो शाम से सदमें में था, उसकी शक्ल अब रोया तब रोया जैसी हो गयी। वो रो पड़ता की इस से पहले श्रुति ने उसे भिंच के सीने से लगा लिया और शान्त करने लगी “चुप ,चुप.. कहीं नहीं जा रही मैं, भला मैं अपने बेटू को छोड़ कहाँ जाऊँगी, चल आ जा खाना खा ले, देख तो सही आज तेरी पारो दीदी ने क्या क्या बनाया है।”

छह वर्ष का ही तो था राहुल, जमाने से बेख़बर उसकी दुनिया तो बस श्रुती में ही सिमटी थी। माँ ने जन्म जरूर दिया था, पर माँ किसे कहते है इसके लिए उसकी परिभाषा हमेशा बड़ी बहन श्रुती पे ही जाकर थम जाया करती थी। बचपन से लेकर अब तलक उसकी तरफ की सारी जिम्मेदारी भी तो उसी ने ही पुरी करी, कहते हैं बहन में मां की ही प्रतिछाया होती इसे श्रुति ने बखूबी निभाया। बीमारी की वजह से डॉक्टर ने माँ से राहुल को अपना दूध पिलाने से भी मना कर दिया था, सो वात्सल्य का ये नाता भी माँ के प्रति जाता रहा। पहली बार जब उसकी जुबां से माँ शब्द फूटे तो उस वक़्त भी वो श्रुती के ही गोद में खेल रहा था। अब जरूर है कि सबके टोकने की वजह से वो अपनी माँ को माँ कहने लगा था, पर श्रुती को तो वो सू-माँ ही कह कर बुलाता रहा।

एक अठारह साल की कन्या पर विधाता का ये कितना कठोर अन्याय प्रतीत होता, उसे बेटी, बहन और यहाँ तक की माँ का भी फ़र्ज़ अदा करने को मजबूर होना पड़ा था। एक कन्वारी माँ ही तो थी वो अपने भाई के लिए, एक सखा और बहन भी तो थी वो अपनी बहन के लिए, और एक जिम्मेदार और सुशील बेटी भी तो थी अपने घर और समाज के लिए, इतना कुछ वो भी इत्ती सी उम्र में? पर उसने कभी उफ्फ तक न किया सब रिश्तों को बखूबी निभाती रही, पर बदले में उसे क्या मिला? अपनों से ही तिरस्कार!! भाग्य से तिरस्कार!!

राहुल खा कर के सो रहा, थोड़ी देर अपनी बहिन को झूठा ढाढ़स बंधाते बंधाते प्रीति भी सो रही। पर श्रुती की आँखों से तो नींद का अब दूर दूर तक कोई वास्ता न था। कितने अनिश्चित निर्णयों को मन ही मन ला कर वो फिर तिरस्कृत किये जा रही थी, मन में भावनाओं का तूफ़ान ऐसा प्रचण्ड प्रतीत हो रहा था मानों प्रशांत महासागर में उठा कोई भयंकर चक्रवात हो। जब भी हल्की आंख लगने को आती तो बूंदो के तेज थपेडों से वो दूर भाग खड़ी होती। थपेड़े थे या फिर थप्पड़!! नहीं नहीं अब नही अब और करवट नहीं बदलूंगी। जब ऐसा लगने लगा कि वो भी इस भयंकर सुनामी में डूब जाएगी, तो घबराकर उठ आँगन में टहलने लगी। रात के एक बज गए थे, गांव के कुत्ते रत जगा करने में मशगूल थे,उनकी भौंकने की आवाज मानों कानों में गोली की तरह आकर लग रही हो।

अनायास ही श्रुती के कदम आँगन की किवाड़ को खोल दरवाजे की ओर बढ़ चले, शायद चारों और से बंद पड़े आँगन में घुटन महसूस हो रही थी। बाहर दरवाजे पे बँगले में बाबा सो रहे थे। अरे ये क्या बाबा आज मच्छरदानी लगाना ही भूल गए, जरा मेरी नींद क्या लग गयी आज तो किसी को ध्यान ही न रहा, वो मन ही मन बड़बड़ाने लगी। मच्छरदानी लेकर वो बाबा के पास पहुंची तो देखा वो जगे हुए ही थे, उसे थोड़ा विस्मय सा हुआ।

श्रुती : बाबा आप सोये नहीं अब तलक।

शिव बाबू: नहीं पता नहीं आज नींद नहीं आ रही। तूम अब तलक क्यूँ जगी हो?

अपने बाबा के पैरों के पास बैठते हुए वो बोली : “बाबा आपसे कुछ बात करनी थी, बुरा तो नहीं मानोगे न”

शिव बाबू: नहीं

श्रुती : बाबा मुझे अभी पढ़ना है, शादी नहीं करनी। और राहुल भी तो मेरे बिना नहीं रह पाएगा,थोड़ा और बड़ा होता तो फिर सब समझ लेता।

श्रुती को पता था कि अबकी बार बाबा भी कुछ नहीं कहेंगे पर हाँ इतना था कि अपने दिल की बात कह दी तो दिमाग में चल रहे विचारों के बवंडर रूपी सारे तूफ़ान शांत हो गए।श्रुती जब मच्छरदानी लगा कर वापस जाने लगी तो बाबा ने बस इतना सा कहा “सारो जो होगा अच्छा होगा, सब वक़्त पे छोड़ दे”

वो तब का दिन था और ये आज का..

मचान पे बैठे बैठे ही सारे घटनाक्रम एक चलचित्र की तरह आँखों के पर्दों पे दौड़ने लगे।आंखों में उतरा पानी भी अपने रास्ते से बहता हुआ सुख गया, हाँ गालों पे वो जरूर एक सफेद लकीर को छोड़ गया था। वर्तमान में आते ही फटाफट श्रुति ने चेहरे को पोछा की कहीं सड़क से आते जाते कोई देख न ले। सूर्य अब पश्चिमगामी हो चला था, पर शिव बाबू का कोई आता पता न था अब तलक। तभी श्रुती को अपने बाबा की महीन पर गम्भीर आवाज़ पीछे से सुनाई पड़ी “अरे सारो कब आयी, कब से यहाँ बैठी है?

श्रुती : एक घंटे के आस पास हो गए होंगे बाबा।

शिव बाबू : मैं जरा जगत काका के खेत पे चला गया था, नयी ट्रैक्टर ली है न उन्होंने और पहली बार खेतों पे लेकर आये थे सो देखने गया था, गेहूँ काटने वाली मशीन भी साथ में ही खरीदी है। पता नही कब अपनी भी ट्रैक्टर की ख्वाइश पूरी होगी, एक ठंडी सी आह लेकर शिव बाबू ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली, मानों कुछ छुपा रहे हों ।

श्रुती: बाबा जल्दी हाथ मुँह धो लो, खाना ठंडा हो रहा और वैसे भी मुझे आज देर हो गयी थी आने में, आप भी न झूठ न बोलो वो भी कम से कम मुझसे, बस समय काटने को पहुँच गये होगे जगत काका के खेत पे, कितनी बार कहा है ना अपनी सुरति खाने की लत छोड़ो, पर चोरी छिपे खाने का बहाना ढूंढते फिरते हो।

शिव बाबू ने बस हल्के से मुस्का भर दिया, झूठ जो पकड़ में आ गई थी। पर ऐसा न था कि शिव बाबू को अपने खुद के ट्रैक्टर की ख्वाइश न थी, कब से ये सपना मन मे पाले बैठे थे। मुँह हाथ धो कर जब तक शिव बाबू ने खाना खत्म किया, तब तलक श्रुती ने भी गाय का चारा पानी का इंतज़ाम कर दिया। टिफ़िन धो कर जाने को हुई तो बोली “बाबा शाम पड़ते ही जल्दी घर आ जाना आज पूरी भाजी बनाऊँगी, दस दिनों से प्रीती खाना बना रही सो मुझे पता है किसी ने ढ़ंग से न खाया है” कितना कोमल मन होता है न स्त्री का भी, अपनों के लिए पिघलते जरा भी देर न लगती, प्रण ले लिया था अब चूल्हे चौके को हाथ न लगायेगी, जब पराये घर को भेज ही रहे तो फिर अब मुझसे उम्मीद किस बात की। पर आज जब बाबा की टिफ़िन में रोटी और सब्जी को छूटा हुआ पाया तो अपने आप को पसीजने से रोक न पायी।

अभी श्रुति पीछे मुड़कर जाने ही वाली थी कि बाबा ने आवाज लगाई “सारो सुनो जरा”

श्रुति : जी बाबा

शिव बाबू: कल जरा खेतों में खाद डालना है, अब आजकल अकेले कहाँ हो पाता कमर दुखती है, तूम कल सुबह आ सकते हो साथ में।

श्रुती : पर बाबा कल तो मेहमान आ रहे मुझे देखने, घर पे फिर मैं कैसे आऊँ यहाँ और आपको भी तो वहीं घर पे ही रहना होगा।

शिव बाबू : तो ऐसा करेंगे न, हम सुबह चार बजे ही ये काम आकर कर लेंगे फिर पूरे दिन भर की छुट्टी रहेगी।

श्रुति थोड़ा अचंभित तो हुई पर हामी भी भर दी : ठीक है आ जाऊंगी।

आज तलक ऐसा न हुआ था कि शिव बाबू ने कभी अपने बच्चों से खेत पे कोई काम करवाया हो, कहते फिरते थे खेतों में काम करवा के अपनी राजकुमारी सी बेटियों का रंग काला करवाना है क्या? पर आज अचानक से ऐसा क्या हो गया, श्रुति यही गुणा भाग करते करते घर को लौट आयी, पर उसे कोई संतोषजनक उत्तर न मिला।

जैसे तैसे को रात बीती, शिव बाबू से पहले श्रुति ही उठ गयी और बाबा को दरवाजे पे आवाज़ लगाते हुए बोली “बाबा चलो जल्दी करो चार कब के बज गए” शिव बाबू फटाफट तैयार हो कर श्रुती से बोलते हैं, “मैं आगे आगे को खाद लेकर बढ़ रहा तुम पीछे से जल्दी आना” श्रुति देखती है कि बाबा अपनी संभाल के रखी हुई खादी के कुर्ते पायजामे को पहन बिल्कुल तैयार हो कर नजरें बचा कर चुप चाप निकल रहे होते हैं। उसकी आश्चर्य का ठिकाना न रहा, भला ऐसे भी कोई खेत पे काम करने जाता है क्या?

थोड़ी देर में श्रुती जब सड़क पे आगे को बढ़ती है तो क्या देखती है कि बाबा गाँव से चलने वाली एक मात्र बस जो सुबह पाँच बजे रवाना होती को रोक कर खड़े थे और हाथ हिला के उसे तेजी से आने को कह रहे थे। श्रुति को माज़रा समझ में ही न आ रहा था, वो तो बस हाँफते हाँफते बस तक पहुँची और बोल पड़ी “बाबा क्या है ये सब कुछ बतलाओगे”

शिव बाबू बोले “अभी इतना वक़्त नहीं जल्दी बैठ बस में, गोरखपुर जल्दी पहुंचना है, नहीं तो सुबह सुबह इलाहाबाद वाली पैसेंजर छूट जाएगी”

गोरखपुर.. इलाहाबाद… मेहमान घर पे..पर .. पर.. इस से पहले की वो कुछ समझ या बोल पाती शिव बाबू उसका हाथ पकड़ के खींचते हुए बस में चढ़ गए।

(आगे जारी है… सारो की इस कहानी का हिस्सा बने रहिएगा)