युगपुरुष – अटल जी (श्रद्धांजलि)

हिंदुस्तान के उदयमान भविष्य के मुकुट पे,
वो एक नाम कोहिनूर बन हमेशा चमकेगा।
सियासतों का कारवाँ तो बदस्तूर है,
न कभी रुका है और न ही कभी थमेगा।
पर गुजरे इतिहास के हर कामयाब पन्ने पे,
अटल जी आपका योगदान अमिट रहेगा।

~ Gourav

(आप बहुत याद आओगे, जिस वक्त होंश संभाला और सही गलत का फैसला लेने की काबिलियत आयी, उस वक़्त आपको प्रधानमंत्री के रूप में देखा। आपका वो दैदीप्यमान चेहरा और वाणी से टपकता हुआ ओज आज भी मिश्री के समान कानों में घुलता है। एक ख्वाइश कसक बनकर हमेशा दिल में बांकी रही कि काश आपको एक बार और प्रधानमंत्री के रूप में देख पाता। खैर अब वो आश भी जाती रही। एक छोटी सी और भावभीनी श्रद्धांजलि)

Advertisements

बूढ़ा बैल!

“अरे मोतिया उठ जाई, ई बीचे दियारवा पे हिम्मत न तोड़ी, ऊ पहाड़ी वाले भोले बाबा की कसम, अब आगे से तू दुवारिये पे रहिये, तोहके नइखे जोतब अब हम टप्परगाड़ी में। हमरे मत्था पाप न ढारि, ऐ मोतिया बस अंतेमे बार उठ जाई” (A)

बेइंतहा गर्मी थी, रामदीन के दो बूढ़े बैलों में से, मोती गश खाकर गिर पड़ा, हीरा भी फ़क़त हाँफ रहा था। बचने की उम्मीद न के बराबर थी। भतीजी की शादी के विदागी के सामानों से बैलगाड़ी पूरी तरह लदा हुआ था, और आज रात का ही लग्न था। दियारा के वीराने में फंस और सांझ उतरता देख रामदीन की धड़कनें और तेज हो गयीं, मोती को हिचकियाँ आने लगी वो उसकी गर्दन पकड़ रोने लगा।

“मोतिया तोहरे बहिनिया के बिहा बा हो, जे ई सामान के साथ न पहुंचब सही घड़िया पे, ते बहुते ऊँच नीच हो जाई, उठ जाई आखिरी बेरिया हमनी के इज्जत रख ली। तू बस भार थम लेहि, धक्का हम लगा देब, मोतिया उठ जाईईईई…!” (B)

तभी कुछ अप्रत्याशित सा घटित हुआ, मोती के शरीर में हलचल हुयी, और वह उठ खड़ा हुआ। दोंनो बैलों के बीच खुद रामदीन गाड़ी को खींचता रहा, देर रात गाड़ी दरवाजे पे आकर खड़ी हो गयी। बारात दरवाजे लग चुकी थी, और कानाफूसीयों से माहौल गर्म था। बैलगाड़ी पे नज़र पड़ते ही ज्वार ठंडा पड़ गया। सिंदूरदान हुआ और शादी समपन्न हुयी।

सुबह सुबह विदागी के मर्मस्पर्शी माहौल में, दरवाजे पे दम तोड़ चुके मोती के पास विलाप करती हुयी दुल्हन को जिसने भी देखा उनके हृदय खंड खंड हो गिर पड़े।

मौलिक एवं अप्रकाशित
©गौरव आनंद
इंदौर, मध्यप्रदेश
——————————————————————————-
(आंचलिक वाक्यों का हिंदी में अनुवाद)
A – “ओ मोतिया उठ जा, इस बीच दियारे पे हिम्मत न तोड़ो, पहाड़ वाले शंकर भगवान की कसम, अब आगे से तुम केवल दरवाजे पे ही रहना, बैलगाड़ी में नहीं जोतेंगे तुम्हें। मेरे माथे पे यह पाप मत ढोल, ओ मोतीया बस आखिरी बार के लिए उठ जा”
B – “मोतिया तुम्हारे बहन की ही शादी है, सामान अगर सही समय पर नहीं पहुंचा, तो बहुत ऊँच नीच हो जाएगी। उठ जा आखिरी बार हमारी इज्जत रख ले। तुम सिर्फ भार थाम लेना, धक्का हम लगा देंगे, मोतिया उठ जा”

पारुल – एक लघुकथा!

पारुल आ रही थी कुछ दिनों के लिए। यूँ तो दूरस्थ शिक्षा के अंतर्गत सारी पढ़ाई गाँव में ही रहकर करती थी, पर साल में एक बार आना होता ही था, परीक्षाएँ देने के लिए। इस बार स्नातकोत्तर का अंतिम वर्ष था। पारुल मुझसे तो यूँ चार वर्ष छोटी थी, पर हक मुझ पे बिलकुल बराबरी का रखती थी।

“क्या भैया क्या हाल कर रखा है कमरों का, रेगिस्तान की माफ़िक सिर्फ धूल ही धूल है”
“पर्दे कब धोए थे आखिरी बार, चादर कब से नहीं बदली”
“ढंग के कपड़े तो पहना करो, क्या कहते होंगे मोहल्ले वाले भी” बीते वर्षों की वो सारी नोक झोंक और बातें याद आने लगी, यूँ तो हर बार माँ भी आ ही जाती थी साथ में और बीच बचाव का काम उनके हिस्से था, पर इस बार अस्वस्थता के कारण वो नहीं आ पायीं।

पारुल को अहले सुबह स्टेशन से ला, दफ्तर के लिए रवाना हो गया, महीने के अंतिम दिनों की व्यस्तता की वजह से अवकाश मिलने में मुश्किल आ गयी। मुझे लगा था इस बात पे भी पारुल झगड़ेगी मुझसे, पर आश्चर्य हुआ जब उसने कहा “कोई बात नहीं भैया”। पारुल वाकई में समझदार हो गयी थी या फिर अब वो पहले जैसी बात नहीं रह गयी। रास्ते भर यही सब मंथन चलता रहा और निर्णय लिया चाहे जो हो इस बार लड़ाई नहीं होगी बस थोड़े ही दिनों की तो मेहमान है, इतना सोचते ही आँखें सजल हो उठीं।

शाम को घर आया तो वहाँ का नज़ारा देख बस ठगा का ठगा सा ही रह गया, टेबल, अलमिरे और किताबों के ऊपर जमी हुई धूल की मोटी परत गायब थी। हर समान व्यवस्थित हो अपनी जगह पर रखा हुआ मानों अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध कर रहा हो। बुझी हुई रसोई में एक नई चमक बिखरी गयी थी। भीनी भीनी सी खुश्बू का इल्म हो रहा था हवाओं में। माता रानी के दरबार में ज्योत न जाने आज कितने दिनों के बाद प्रज्वलित हुई होगी।

“भैया चाय पी लो, शहर के दूध की चाय में तो कोई जायका ही नहीं और माँ ने कुछ नमकीन भिजवाया है आपके लिए, लो चखो तो जरा” पारुल की आवाज से तंद्रा भंग हुई। उसने तपाक से यह भी पूछ लिया, “रात के खाने में क्या खाओगे भैया, आलू के पराँठे बना दूँ, तुम्हें तो बहुत पसंद है ना”

रात भर मन मस्तिष्क में अजीब सी उथल पुथल मचती रही, नींद का आँखों से कोई सरोकार न रह गया। सुबह पौ फटते ही पारुल को जगाया “छोटी उठ तो, चाय बना दे जरा, सुबह वाली पहली पैसेंजर से गाँव को जा रहा हूँ,”

पारुल हड़बड़ा कर उठ बैठी, क्या हुआ भैया “माँ तो ठीक है ना, मुझे नहीं आना था उन्हें अकेला छोड़कर, तबियत ठीक नहीं थी उनकी” और जोर जोर से रोने लगी।

“अरे पगली शांत हो जा, देर रात तक वापस आ जाऊँगा आज ही।”

“मतलब” पारुल अवाक हो मुझे घूर रही थी।

“माँ को लाने के लिए जा रहा, जैसे यहाँ शहर के दूध का कोई जायका नहीं, उसी तरह तुम दोनों के बिना, मेरी ज़िंदगी का भी कोई जायका नहीं”

पारुल जो आजतलक सिर्फ नोंक झोंक ही करती रही थी, आज गले से लिपट रो पड़ी।

मेरे बढ़ते कदमों के साथ साथ, नयी सुबह के क्षितिज में भास्कर का भी उदय हो चुका था।

दोहरा मानदंड

देश के नामचीन अखबार के दफ्तर में काफी गहमा गहमी थी। राजधानी में एक नाबालिक के साथ हुए बलात्कार और फिर निर्मम हत्या ने वतन की फिजाओं में आक्रोश घोल दिया था। सभी अखबार चैनलों में टी.आर.पी. की होड़ लगी थी और नमक मिर्च लगा के खबर को खूब परोसा जा रहा था।

परंतु प्रिंट मीडिया में, वो भी संपादकीय पृष्ठ में लेख छापने के लिए काफी संतुलन और संयम की आवश्यकता थी। नेहा जिसने अभी अभी ही पदोन्नति पाकर सहायक संपादक का पदभार संभाला था, आजकल काफी बुलंद हौंसलों में थी और नारीवादी मुद्दों को लेकर काफी प्रखर भी रहा करती थी।

ऑफिस में मुख्य संपादक, नेहा से मुखातिब होते हुए पूछते हैं,
“कल रविवार के संपादकीय पृष्ठ के लिए कोई लेख अब तक चयनित हो पाया है या नहीं, नेहा?”
“जी सर, महिला अधिकारों और सशक्तिकरण को लेकर लंबे अरसे से लड़ाई लड़ने वाली एक नामी गिरामी एन. जी. ओ. की संचालिका के लेख को चुना है मैंने”
“हर बार उनके लेखों में मिला जुला कर वही बात रहती है, इस बार कुछ खास है क्या”
“हाँ सर, इस बार उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज और पुरुषवादी सोच पे जमकर प्रहार किया है, या यूँ कहें समस्त पुरुष समाज को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है और पुरुषत्व के मानदंडो और आदर्शों पर एक प्रकार का प्रश्नचिन्ह सा ही लगा दिया है”
“पर क्या इस लेख को छापना, पुरुष समाज के प्रति एक प्रकार का पक्षपात पूर्ण रवैया नहीं होगा”
“सर पर अभी जिस प्रकार की सरगर्मी है उसके हिसाब से तो यह लेख बिल्कुल सही रहेगा”
“ठीक है लेख को अनुमोदित कर दो”

मुख्य संपादक जो लेखों को पढ़े बिना कभी स्वीकृति नहीं देते थे, आज उन्होंने बिना देखे ही अनुमोदन दे दिया था।”

कुछ ही हफ्तों बाद, भीषण आतंकवादी हमले में कई निर्दोष लोगों की जानें जा चुकी थी, दहशतगर्द पड़ोसी मुल्क के थे इस बात की भी पुष्टि हो चुकी थी। ठीक वही माहौल समाचार पत्र के दफ्तर में फिर से था, संपादकीय पृष्ठ के लेख के लिए माथापच्ची हो रही थी।

मुख संपादक, नेहा से मुखातिब होते हुए, “नेहा, फिर क्या चयन किया है कल के लिए”
“सर, जाने माने विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित शिक्षाविद का एक लेख आया है, और बड़े बखूबी से उन्होंने दर्शाया है कि कैसे आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। मेरे हिसाब से अभी के तनाव पूर्ण माहौल में यही सही रहेगा”
“अच्छा तो ऐसी बात है”
“जी सर पता नहीं क्यों लोग धर्म को कसूरवार ठहराने लगते ऐसी घटनाओं के होने के बाद”
“नेहा, धर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए निर्दोश लोगों का खून बहा देने के बाद भी अगर, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, तो फिर समाज मे होने वाली नारी उत्पीड़न की घटनाओं के लिए पूरा का पूरा पुरुष समाज ही कैसे कसूरवार बन जाता?”
नेहा “जी वो वो…….!”
केबिन में एक सन्नाटा पसर गया।

चाँद

बहुत दिनों से आप सबों से काफी दूर हो चुका हूँ, कुछ व्यक्तिगत कारण है। खैर, काफी दिनों बाद छोटी सी दो पंक्तियां लिखी है-

वो चाँद अगर मेरा होता,
पूनम पे मेरा ही पहरा होता।
पूर्णिमा मुस्कुराती मुंडेर से
चाँदनी संग मेरा ही बसेरा होता।

शीतल बहती बयार संग,
रोशन मेरा हर एक सांझ होता।
प्रियतम की बाहों में सिमट
फिर अमावस का इंतज़ार होता।

दर्पण

उत्तुंग हूँ, छूता अम्बर मैं, होता गौरवान्वित हूँ,
हिमाद्रि बन, हिंदुस्तान का दर्पण कहलाता हूँ।

कालजयी हूँ, शाश्वत बन सदियों से गूँजता हूँ,
महाभारत हूँ, कलयुग का दर्पण कहलाता हूँ।

पलता गर्भ हूँ, वक्ष से सिंचित हो चहकता हूँ,
मातृत्व मर्म हूँ, स्त्रीत्व का दर्पण कहलाता हूँ।

धर्म का रूप हूँ, तात के कर्तव्यों का ज्ञाता हूँ,
पुरुषत्व हूँ, मर्यादाओं का दर्पण कहलाता हूँ।

कालखंड हूँ, मानवीय उद्यमों का उद्गाता हूँ,
इतिहास हूँ, भविष्य का दर्पण कहलाता हूँ।

जो जैसा, वैसा ही उसका भेष दिखलाता हूँ,
काँच पे पुते जो पारा, तो दर्पण कहलाता हूँ।

अनेक भावों में, कई शब्दों से बयाँ होता हूँ,
प्रतिबिम्बों को परोसकर दर्पण कहलाता हूँ।

रूठे रिश्ते!

Third Collaboration by Me and Nandita! This time it was process reversal, Idea and content were of Nandita and I simply played with few words. I hope you all would love it and dont forget to give your valuable feedbacks.

था गुमां मुझे जिन बुलंदियों पे,
झूठे उस ग़ुरूर के सन्मुख,
प्यार भरे रिश्ते, सूली चढ़ गए।
निकल आयी थी मिलों दूर,
बंधन भी सारे, पीछे छूट गए।
मैं चलती रही, अपनी धुन में
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए

अनजान अंधकारमय डगर पे,
मेरी नन्ही उंगलियों को थामे,
वो संभलकर चलना सीखा गए।
नादानियों पे आंखें तरेरकर,
वो सबल बन जीना सीखा गए।
मैं डूब गयी जरा चकाचौंध में,
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए।

दुखों के जलधि को समेटकर,
मेरी खुशियों को सहेजकर,
त्याग पे त्याग वो करते गए।
मात पिता के आश्रय बल तले,
मेरे मैं को थे झूठे पर लग गए।
मैं उड़ती रही, खयाली नभ में,
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रुठ गए।

वो अनकहा प्रेम बाबुल का,
वो सौगात भरा दामन मां का
राहों को मेरे रोशन करते गए।
हठ करती रही मैं तो हमेशा,
पर वो नज़रअंदाज़ करते गए।
भटकी मैं मायावी दुनिया में,
और जीवन के इस सफ़र में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए।

अर्थ अनर्थ के समझ से परे,
जिस उन्माद के बंधन तले,
छोड़ आयी थी अपने घरौंदे को।
वो जुनून भी ठुकरा गया मुझे,
एक नई मंजिल तलाशने को।
अब पश्चाताप के गर्त में डूब,
ढूंढूं कहाँ पुराने जज्बातों को?
मनाऊं कैसे मैं अपने रूठों को?

By Nandita and Gouri