Rhythmic Word ~ 26

दिल ये मेरा ठहरा पाषाण पत्थर!
आसाँ नहीं इश्क़ का यूँ मुझमें घुल जाना साक़ी।
बेशक उड़ेल दे अपनी निगाहों से तेज़ाब,
आखिरी प्याला तेरे नाम का, है अभी भी बांकी।

Dil ye mera thehra pashan pathhar,
Asaan nahin isq ka yuun mujhme ghul jana saki.
Beshak udhel de apni nigahon se tezab,
Aakhiri pyala tere naam ka, hai abhi bhi banki.

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Rhythmic Words ~ 25

जय बोलो, सियावर रामचन्द्र की,
मंदिर बनाएंगे वहीं,
है कसम आपकी श्री राम जानकी!

#promiseday
#bhagwavalentineofsingles

Rhythmic Words ~ 24

ओ रे ख़ुदा! बेदर्द क्यूँ हैं मेरे लिए तेरे सारे फैसले,
बिखरी क्यूँ पड़ी है, सिलवटों में सारी उम्मीदें मेरी।
इंद्रधनुषी रंगों से जो सजायी सबकी दुनिया तूने,
फिर सफेद चादर की माफ़िक क्यूँ ये जिंदगी मेरी?

फीकी चाय

आहिस्ता आहिस्ता ही सही,
हो गया हूँ मैं भी शायद,
उस फीकी कड़वी चाय का नियाज़मंद।
हुआ करती थी जो कभी,
ढलती हुयी शाम की तुम्हारी पहली पसंद।

पत्तियों से रिसते रंगों को भर,
उबलता है शायद वो भी,
जाने किस विरह वेदना में हो फिक्रमंद।
नम सफेद उड़ती भाप में,
लिए पुरानी यादों की भीनी भीनी सी सुगंध।

खाली हैं आलिन्द की कुर्शियां,
याद है वो तेरा इन झरोखों के पास बैठना,
न चाह कर भी जिन्हें अब मैं रखता हूँ बन्द।
रसोई में अब भी दुबके पड़े रहते,
तेरे मीठे खौफ से डब्बे के सारे रसीले गुड़कन्द।

नज़रों में उतर आता है बरबस,
सफेद प्यालों का वो तेरे लबों से टकराना,
और उन पे रेशमी लटों का धीरे से सरक आना।
अच्छा लगता था, तेरा वो यूँ परेशां होना,
और फिर देख मुझे, बस धीमे से मुस्कुरा भर देना।

ढहती मोहब्बत की मीनारों के,
अब कुछ भी तो नहीं रह गए अवशेष।
सांझ की थी वो एक बेवजह तकरार,
नाराज़ हो जब, उठ कर चल दिए थे तुम,
और रह गयी थी प्याली में, थोड़ी सी चाय शेष।

एक शहर ढूंढते हैं!

हर सोच है, ठहर सी जाती,
उलझनों के गली मोहल्लों में।
उम्मीदें साथ लिए दौड़ती,
गुम ये शहर तो हो-हल्लों में।

एक कारवाँ कभी यहाँ उठा,
तो दूजा हो तैयार वहां बैठा।
ख्वाब खोखला एक देखा,
दिलों में रखकर मुमताज़,
बुनते सबको ताजमहल देखा।

घुल गए वो वास्ते चाहतों में,
कटे शाम जो मय के आहतों में।
टूटी उन बुलंदियों को समेटे,
लौटते हैं वो अपने चमन को,
पूछते पता रात के फैले सन्नाट्टों में।

न जाने क्यूँ मर मर के भी,
सब ख़ुश रहने को हैं बेताब।
डाल ग़मों पे नकली पर्दा,
और खुद से ही हो बेपर्दा,
निकल लेते हैं ओढ़े हिज़ाब।

शहर का लहू काला है,
गाढ़ा हो चला है उसका सैलाब।
रगों में क्या बहेगा,
जिस्म में क्या उतरेगा,
मिला दे गौरी,
थोड़ी सी इसमें खौलती हुई तेज़ाब।

~Gouri

वो एक पागल!

(My new experiment with poetry. Promises are never meant to be broken, either live for it or die for it but never ever, leave)
She ~ Italics, He ~ Straight

भूला दूँ! किसे? तुम्हें,
ये संभव नहीं।
मिटा दूँ! किसे? खुदको,
ये भी संभव नही।

क्या तुम साथ हो?
उत्तर दो मुझे?
शायद नहीं!
है कोई दूजा रास्ता?
होगा, पर, मुझे ,
वो दिखता नहीं!

संभाल लो, किसे?
अपने आप को,
ये आसान नहीं!
पोछ लो अब आँसू ,
तुम पर ये,
जरा भी जँचते नहीं।

चलती हूँ अब,
अपना ख्याल रखना।
हो सके तो,
मुझे माफ़ करना।
याद बहुत आओगे तुम,
बस इतना याद रखना।


(पच्चीस वर्षों बाद)

कोई एक सख्श,
किसी पागलखाने में,
कैद होकर वर्षों तलक,
उसकी दर-ओ-दीवारों में,
ढूंढता है एक चेहरे को,
खिंची हुयी चंद,
टेढ़ी मेढ़ी सी लकीरों में।

हर वक़्त सिर्फ,
सफेद सतह के ही,
तलाश में है वो भटकता।
हाथ आ जाए कुछ तो,
स्मृतियों को टटोलकर,
बार बार उसी एक,
चेहरे को है वो उकेरता।

डॉक्टरनी साहिबा!
ओ, नयी डॉक्टरनी साहिबा!
देखो तो जरा ये चित्रकारी,
उस बूढ़े मरीज़ ने है बनायी।
न जाने क्यूँ अरसे से,
आपसे मिलती जुलती ही,
हर पन्ने पे, यही उसने है उतारी।


राज़ के सारे बादल,
फ़लक से गिर,
जमीं पे उतर आये।
पलभर में ही,
अनुत्तरित सारे प्रश्नो के,
सुलझे जवाब,
उसे, हासिल हो गये।

माँ से मिल,
कुछ देर तलक,
निहारती उसे वो रही।
थमा कर फिर,
लिफाफे में वो तस्वीर।
मनोभावों को उसके,
गौर से पढ़ती वो रही।

पूछा फिर माँ से,
क्या ये,
तस्वीर तुम्हारी है?
देख कर बोली वो,
हाँ मेरी ही तो है,
पर उम्र लगती,
ज्यादा ही पुरानी है!
ढूंढा कहाँ से इसे?
क्या अपने ही,
हाथों से बनायी है!
नहीं माँ, मैंने नहीं,
पागल हो चुके,
मेरे अब्बू ने बनायी है!!

~ Gouri

Image courtesy : Google

ख्वाब अधूरे हैं

अपलक निहारता रहता हूँ,
स्याह अमावस सी रात में,
विस्तृत अनंत निहारिकाओं को।
तलाश रहा हो जैसे अंतर्मन मेरा,
विहंगम व्यापक ब्रह्माण्ड में,
खोये हुए अपने सूक्ष्म अस्तित्व को।

हो न जाऊँ कहीं भस्मात,
प्रज्वलित किसी उल्का पिंड सा,
डरता हूँ इसलिये,
और शायद समझता भी,
फैले उस अनंत शून्य के,
गुरुत्वीय गहरे रहस्यमयी गर्त को।

साधे सटीक तरंगदैर्ध्य को,
उम्मीद की किरणों पे हो सवार,
समेटे हृदय में थोड़े विश्वास को,
दैदीप्यमान सूर्य की परिधि टटोल,
चल पड़ा हूँ भावशून्य निर्वात में,
ढूंढने अपने ज्वलंत जीवन सत्य को।

तोड़ लूँ मैं एक सितारा,
चुरा लूँ बादलों से मखमली चुनर,
सजा लूँ दुल्हन सी अपनी पीड़ा को।
उतार लूँ ख्वाइशों को हृदय-मंडल में,
जब्त इस ज्वाले को सीने में दहकने दो,
फैसले अधूरे हैं, पर पहले,
वो बेपर्दा नज़रिया तो हासिल हो जाने दो।

आकांक्षाओं और बलिदानों के समर में,
विजयघोष के विश्वास से हो लयबद्ध,
रणभूमि के अटल अश्व अब दौड़ पड़े हैं।
वीरगति तो निश्चित है, अवश्यम्भावी भी,
हे विधाता! पर परवाह नहीं मुझे मृत्यु की,
बस सतरंगी से, कुछ पुराने ख्वाब अधूरे है।

~ Gouri