भोला ! एक पुनर्जन्म (कहानी)

परीक्षायें समाप्त हो चुकी थीं, एक हफ्ते पहले ही तृतीय वर्ष का समापन हो चुका था। छात्रावास का आखिरी दिन होने की वजह से चहल पहल भी काफी थी। अधिकांश छात्राओं ने अपना कमरा खाली कर दिया था पर कुछ एक अभी भी रुकी हुई थीं, जो थोड़ी ही देर में अपने अपने गन्तव्य के लिए प्रस्थान करने वाली थीं। माहौल भावुक था, बिछड़ने का गम तो था ही पर साथ ही साथ एक नए सुनहरे भविष्य की खुशियां भी थीं।

इन सब के बीच निहारिका बड़ी विचलित हुई इधर से उधर घूम रही थी, मानो बड़ी बैचनी से किसी को ढूंढ रही हो। भोला कहीं नज़र नहीं आ रहा था, कल के डले हुए बिस्किट पे चींटियों ने अपना हक़ जता दिया था और उसका दूध पीने वाला कटोरा भी कहीं नजर नहीं आ रहा था। आखिर कहाँ गया होगा, आज तीन सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि भोला आंखों से ओझल हुआ हो, ये सोचते सोचते वो अतीत के घटनाक्रम को याद करने लगीं।

तीन साल पहले की बात है, निहारिका के छात्रावास में आये हुए कुछ ही हफ्ते बीते थे और एक दिन सुबह पार्क से लौटते वक्त कुत्ते का एक नन्हा सा बच्चा उसके पीछे पीछे हॉस्टल तक आ पहुंचा। निहारिका द्वारा प्रेम पूर्वक दिए गए एक बिस्किट के टुकड़े के बंधन में वो ऐसा बंधा की फिर वहीं का होकर रह गया। अंदर छात्रावास में लाकर रखने की इजाज़त तो थी नहीं, सो सेक्युरिटी वाले नृपेंद्र चाचा ने निहारिका के आग्रह को स्वीकार करते हुए उसके उठने बैठने और सोने की व्यवस्था मेन गेट पे अपने ही केबिन में कर दी।

गहरे काले रंग और माथे पे चाँद जैसे सफेद निशान की वजह से सबने उसका नाम भोला रख दिया। वक़्त बीतने के साथ साथ भोला पूरे कॉलेज में सबका प्रिय हो गया, पर निहारिका के साथ उसका लगाव सबसे अलग और हटकर था। अहले सुबह जब तक वो खुद अपने हाथों से उसे दूध और बिस्किट न दे देती वो किसी और चीज़ पे मुंह तक भी न डालता। थोड़ा बहुत स्वभाव से जिद्दी जरूर था, पर समय और दैनिक दिनचर्या का भी उसे पूरा भान था। अगर कभी निहारिका को वापस आने में देर हो जाये तो खुद उसे ढूंढता हुआ क्लासरूम के दरवाजे तक आ पहुंचता और चुपचाप वहीं बैठा रहता जब तक कि प्रोफेसर क्लास समाप्ति की घोषणा नहीं कर देते थे।

इन सारे पुराने खयालातों में गुम निहारिका के चेहरे पे शिकन की लकीरें उभर आयी, परेशानी ऐसी जान पड़ी मानों कोई अपना गुमशुदा हो गया हो। गुस्सा थोड़ा बहुत उसे खुद पे भी आया, परसों से ही थोड़ा बदला बदला सा लग रहा था भोला, पर उसने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी इस बात को। सुबह से ही सुस्त और शांत था बस जहाँ जहाँ वो जाती चुपचाप वो भी पीछे पीछे हो लेता। उसे अब भान हुआ मानों वो कुछ कहना चाह रहा था, उसकी वो छोटी सी गोल गोल आंखें बहुत उदास थी उस दिन। क्या बात थी? क्या हुआ होगा..? कहीं भोला….!

निहारिका का दिल बैठ गया, और आँखों में पानी उतर आया। नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा.. पास के मोहल्ले में जरा रम गया होगा अपनी बोरियत मिटाने, उसने अपने मन को झूठी दिलासा देने की भर्शक कोशिश की।

तभी सहपाठी रंजना की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई जो अपना बैग लेकर जाने के लिए तैयार खड़ी थी, ” निहा फिर चल रहीं हूँ, कब से तुम्हें ही ढूंढ रही थी, तुम्हारा भाई भोला भी नज़र नहीं आ रहा, जाने से पहले तुम दोनों से ही विदा लेनी थी”

“हाँ रंजना दो दिन से नहीं दिख रहा, मैं भी उसे ही ढूंढ रही हूँ, आज मुझे भी जाना है, समझ नहीं आ रहा उसे हमेशा के लिए यहीं अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ, बहुत दिनों से यही सोच सोच कर परेशान थी, अब तो पता नहीं कहाँ चला गया” निहारिका ने व्यथित होते हुए जवाब दिया।

दोनों सहेलियों ने गले लग एक दूसरे को भावविह्वल विदाई दी, जाते जाते रंजना कह गयी, “भोला का समाचार कह सुनाना, वरना मुझे भी चिन्ता बनी रहेगी”। उसके जाते ही निहारिका फिर से अपनी छटपटाहट के कैदखाने में कैद हो गयी। तभी उसे नृपेंद्र चाचा आते हुए दिखे, मन में उम्मीद की दबी लौ फिर से जल उठी, शायद उन्हें जरूर कुछ पता होगा। तेज कदमों से चलकर उनके पास पहुँची और एक ही साँस में आतुर हो भोला के बारे में विस्तार से सब कुछ कह सुनाया।

भोला के गुमशुदा हो जाने की खबर से नृपेंद्र चाचा भी थोड़े परेशान से हो उठे और दो दिन पहले के घटनाक्रम को याद करते हुए बोल पड़े “निहारिका बेटे, उस दिन जब शाम के वक़्त मैं घर के लिए निकल रहा था तो भोला मुझे सामने के खेतों से आते हुआ दिखा, पास आया तो देखा उसने मुंह में रुद्राक्ष की एक माला दबा कर रखी थी, वो माला उसने अपने दूध पीने वाले कटोरे में रखा और उल्टे पाँव वापस खेतों की ओर चला गया, मैंने कितनी ही आवाज़ दी पर सिर्फ एक बार पलट कर देखा और जाता रहा। मैंने वो माला सहित उसकी कटोरी यहीं अलमिरे में रख दी थी। ये देखो” इतना कहते ही नृपेंद्र चाचा ने वो कटोरी निकाल के निहारिका के हाथों में दे दी।

रुद्राक्ष की वो माला देख, निहारिका वहीं चक्कर खा फर्श पे बैठ रही। वक़्त के साथ धुंधले पड़ चुके यादों के चित्रफलक पे, पुरानी तस्वीरें खुद बखुद उभरने लगीं। तस्वीरें वो भी ऐसी जो नासूर बन कर हृदय के किसी कोने में छुप कर बैठे हुए थे और मौका मिलते ही आँखों से ऊबकाई बन बाहर आने को बेचैन।


शिवम, बाल्यकाल से ही बुद्धि विवेक से सम्पन्न और पठन पाठन में उतना ही मेधावी । बचपन में ही उसकी योग्यता का संज्ञान लेते हुए प्रधानाध्यापक महोदय ने उसे दो कक्षा की उन्नति दी थी। हर बार कक्षा में प्रथम स्थान मानों उसके लिए पहले से ही आरक्षित हो। पारिवारिक रिश्ते से इतर दोनों सुख दुख में एक दूसरे के पक्के साझेदार थे। खुशियाँ हो दामन में तो वक़्त को भी पंख लग जाते। पर नियति के एक कठोर निर्णय ने इन खुशियों पे ग्रहण लगा दिया।

इस बार कक्षा में निहारिका को प्रथम स्थान मिला था, सभी ने बधाइयां दी पर वो खुश नहीं थी। स्मृति में कैद रह गए थे उसके लिए वो पल जब शिवम के सिराहने बैठ कर उसने कहा था “शिवा तेरे भी अच्छे नंबर आये है” और शिवम ने अपने रूग्ण शरीर की बची हुई सारी शक्ति को समेटकर मुस्कुराने की हर संभव कोशिश की थी। कर्क रोग की वीभत्सता की गवाही जर्जर होता जा रहा उसका शरीर था। पर अभी भी चेहरा सौम्यता और विश्वास से लबरेज, बोल पड़ा “आप देखना बारहवीं में मेरे अंक आपसे ज्यादा होंगे”। उसके इन शब्दों को सुन कर वो नकली हंसी हंस, फिर बाद में फूट फुटकर रोयी थी। कर्क रोग अंतिम चरण में था और अब वापसी की कोई गुंजाइश न थी। शिवम को भी इल्म था अपने सीमित जीवनकाल का, वो तो बस निहारिका और माँ बाबूजी के आँखों से अश्रुओं को बहते हुए नहीं देखना चाहता था।

बारहवीं के रिजल्ट आ गए थे, शिवम का वादा टूट गया था और साथ ही उसके संघर्ष और कष्ट के पूर्ण विराम की घड़ियां भी आ चुकी थीं। अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में बीप बीप करती मशीनों के सहारे अपने अंतिम क्षणों को जी रहा था शिवम। मध्यरात्रि के बाद का वो पसरा सन्नाटा जीवन के ही एक दुखद सच को बयां कर रहा था जिसे जानकर भी सब अनजान बने रहने की कोशिश करते हैं। सिराहने के एक तरफ माँ बाबूजी और एक तरफ निहारिका बस इतने में ही सीमित होकर रह गए थे उसके आखिरी क्षण। चीर निंद्रा के आगोश में समा जाने से पहले एक बार उसने आंखें खोली, एक झलक माँ बाबूजी को देखा और फिर निहारिका की और देखते हुए बोल पड़ा,

“माँ बाबूजी को मेरी कमी न महसूस होने देना”

वो फट पड़ी “तू क्यूँ जा रहा है रे शिवा, तेरे ही आराध्य भोलेनाथ से तो दिन रात तुम्हारी सलामती की दुआ मांगती रही मैं और माँ, वो तो बड़े निष्ठुर निकले! तेरे गैरमौजूदगी में क्लास रूम की दीवारें तो अब काटने को दौड़ेंगी। कॉलेज तक तो साथ निभा देता! बोल मेरी इतनी सी ख्वाईश भी पूरी नहीं करेगा!” कहते कहते निहारिका के स्वर रुंध गए और फिर कुछ न बोल सकी, माँ बाबूजी को भी संभालना था, जिम्मेदारी का वादा शिवम ने ले लिया था।

आज तलक शिवम ने उसे निहा ही कह कर पुकारा था, पर जाते जाते बोल गया

“दीदी, वादा रहा आऊंगा आपसे मिलने” और बस इतना कहते ही उसकी पलकें हमेशा के लिए खामोश हो गयी साँसे जरूर कुछ घंटे और चलती रहीं।

अनाथ पैदा हुआ था शिवम इस दुनिया में। पिताजी के दफ्तर के पास की झाड़ियों में फेंका मिला था। वात्सल्य भाव से घर ले आये थे उसे बाबूजी। पर जाते जाते उसने सबको ही अनाथ कर दिया।


पानी के छींटे पड़े तो होश आया, नृपेंद्र चाचा के जान में जान आयी। निहारिका ने एकटक कटोरी को देखा और रुद्राक्ष की माला लेकर अपने गले में डाल ली। भोलेनाथ का परम भक्त था शिवम, रुद्राक्ष की माला हमेशा उसके गले में ही रहा करती थी।

कहते है प्रेम भाव के बंधन में बंधा इंसान जीवन मरण के चक्र में उलझ कर बार बार जन्म लेने को मजबूर होता है। पर यह पुनर्जन्म अलौकिक था, अपने वादे को पूरा करने के लिये शायद वो भोलेनाथ की अनुमति से फिर इस धरती पे आया था, पर इस बार हमेशा के लिए बंधन मुक्त होकर चला गया था शिवम।

निहारिका के चेहरे पे तृप्ति के भाव थे जाते जाते नृपेंद्र चाचा से कह गयी।

“चाचा भोला अब कभी नहीं आएगा वापस”

-समाप्त-

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा,चौथी कड़ी)

Dear readers, I am glad to present here the fourth episode of this story. I hope that you all would have gone through the previous parts of the story. Those who haven’t, can find them in WordPress reader time line or by clicking on the links which i am mentioning here. I would request all of you to go through it and do give your honest opinion. would also love to hear that what you think, as how this story will or shall move ahead.

Links for the previous posts are:

First Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/बाबा-पहली-कड़ी/?preview=true

Second Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/20/story-2-बाबा-दूसरी-कड़ी/?preview=true

Third Episode:

https://shabdragini.wordpress.com/2017/10/21/story-2-बाबा-तीसरी-कड़ी/?preview=true

रक्त कैसा रक्त? वो जो आँखों से बहने को बेताब हो उठा था! शरीर के जख्म तो फिर भी ढँक जाते, पर दिल के? वो कहाँ छुपाये छुपते। आँखों मे घुल रहा वो नमकीन पानी भी तो लहू के माफ़िक ही था, जो श्रुती के गालों पर से ढुलकता हुआ, उसी के कदमों पे जा गिरा। क्या सिर्फ अश्रुओं को बहा देने मात्र से मनुष्य अपनी सभी घुटी हुई कुण्ठाओं से मुक्त हो जाता है? शायद नहीं, ये तो बस वो उस क्षणिक राहत के सामान है जो मृत्यु शैया पे लेटे व्यक्ति को अपनों के पास बैठे होने के एहसास मात्र से मिलता।

परीक्षाफल घोषित हुए ज्यादा दिन नहीं बीते थे। श्रुती के मन मस्तिष्क का वो प्रकाशित कोना, जो कि उम्मीद की किरणों के आखिरी डोर के साथ भी आशाओं की उड़ान को गति देने की इच्छा रखता था, वो हिस्सा बहुत सारे स्वप्नो को जी भर के जी लेने के लिए उद्यत हो रहा था। परंतु कहीं न कहीं उसे भी इस बात का भान था कि ये सब सिर्फ एक कोरी कल्पना मात्र बन कर न रह जाये। नियति को भी शायद छुपन छुपायी खेलने का शौक था, हुआ भी वही जिसका उसे डर था।

दस दिनों पहले की बात है, हर दिन की तरह शिव बाबू थके हारे शाम को बासे से घर को लौटे। पारो को आवाज़ लगाई पानी लाने को और आँगन के ओसारे पे बैठ रहे। श्रुती जो हर रोज बाबा को वापस आया देख, चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ जाते हुए बातों की गठरी का पुलिंदा खोल बैठती थी, आज नहीं उठी। उठती भी कैसे आँगन में बैठी गेहूँ के दानों से कंकड़ बीनती, वो भी तुलनात्मक भावनाओं के सागर में गोते जो लगा रही थी। क्या मैं भी इन पत्थर के कणों की तरह एक अवांछनीय पदार्थ भर तो नहीं ? क्या मेरा अस्तित्व समाज के लिये सिर्फ एक पूरक वस्तु मात्र तो नहीं? सवाल बड़े थे पर उत्तर कहाँ हाँसिल था।

सुबह सुबह बड़े मामा का एक जरूरी संदेश घर के एक मात्र फ़ोन जो पारो के पास रहता, पे आया था। माँ और दादी दोनों से बात हुई थी, कह रहे थे विष्णुपुर गांव में कोई लड़का है अभी अभी ही नई बहाली हुई है, पुलिस महकमे में, बतौर कॉन्स्टेबल, सारो के साथ जोड़ी अच्छी जमेगी। घर परिवार भी तंदरुस्ती में है, बाप सरकारी स्कूल में मास्टर , जमीन जगह भी काफी और संतानों में सिर्फ दो लड़के ही हैं। पिछले साल श्रावण मास के मेले में लड़के ने सारो को देखा है और पता चला है की वो पूरा ही लट्टू हो गया है उसपर, सो दान दहेज और लेने देने की तो चिंता ही छोड़ दो। जीजा जी से सहमति मिले तो अगले पूर्णिमा मेहमानों के साथ दरवाजे पे रिश्ते के लिए आ जाएं।

दादी ने कह दिया “शिव की तरफ से तो हाँ ही समझो, पढ़ाई को लेकर बतंगड़ बनाता था सो अब तो पढ़ाई भी हो गयी पूरी। अब क्या है लड़की सयानी हो गयी है नया घर संभालेगी, उम्र भी तो देखनी है। सारो के बाद अभी एक और भी तो है, पहली शादी निपटे तो उसके बारे में भी सोचें। फिर कुछ समय भी तो लगता दूसरी शादी के लिए बंदोबस्त करने में, तुम तो बात आगे बढ़ाओ मैं शिव को राजी कर लूँगी। मामा ने फिर दोहराया “लड़के को जब लड़की ही पसंद आ गयी है तो बात तो फिर तय ही समझो “

एक कहावत आज भी गांव देहात में खूब प्रचलित है, जो सुंदरता गरीबी में निखर कर दिख जाए तो फिर दिखावेपन पे ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं रह जाती। ईश्वर ने श्रुति को जितना ही गुणों से लबरेज रखा था, रूप में भी कोई कसर बांकी नहीं छोड़ी। चेहरे की हर बनावट उभर कर सामने आ जाती थी मानों किसी शिल्पकार ने बड़े शिद्द्त से नक्काशी की हो। जहां चेहरे की रेखाएँ अपने माँ से मेल खाती थी, तो कद काठी और लंबाई अपने बाबा से। घर में बस बाबा और श्रुति ही थे जिन्हें ऊंचाई के लिए सीढ़ी या सहारे की जरूरत शायद ही कभी पड़ी हो। यही वजह थी दसवीं पास करते करते ही घर पे रिश्तों का तांता सा लगना शुरू हो गया, माँ दादी की चलती तो कब की ये शादी तय हो जाती, पर ये तो बाबा ही थे जो कभी टस से मस न हुये। हर रिश्ते की बात के साथ कोहराम मचना तो तय था पर श्रुती को कभी इन बातों से फर्क नहीं पड़ा। पर क्या था ऐसा जो आज आये हुए इस रिश्ते की बात से वो अंदर तक से बिफर पड़ी थी। शायद इसलिए कि उड़ान की सीमायें पहले से ही तय हो चुकी थीं। जब भी इस बात को लेकर विवाद हुआ तो शिव बाबू हर बार ब्रह्मास्त्र चला देते की बारहवीं तक जब गाँव में ही स्कूल है, तो फिर पढ़ने देने में दिक्कत क्या है? वैसे भी कौन सी महँगी पढ़ाई है, सरकारी तो स्कूल ठहरा! पर बाबा के इस ब्रह्मास्त्र की मियाद भी अब पूरी हो चली थी।

शिव बाबू : सारो !! आज बाबा ने चाय नहीं पिलानी के, किस चिंता में डूबी है, और बालों ने भी ऐसे बना रखे हैं जैसे द्रौपदी के खुले केश। के हुआ तुझे, मुँह क्यों उतरा उतरा सा है।

श्रुति : अकचका कर अपने विचारों के मंथन से बाहर निकलते हुए बोली “बाबा आप आ गए, मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कुछ तो नही, बस तबियत थोड़ी सही नहीं । बहाना बनाते हुए श्रुति रसोई को चली गयी

शिव बाबू: थोड़ी देर से छाई चुप्पी को तोड़ते हुए बोले “सारो पता है, आज तुम्हारे स्कूल के हेडमास्टर साहब मिले थे रास्ते में आते वक्त, बड़ी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी। बोल रहे थे श्रुति को परसों स्कूल भेज देना, जिले से कोई शिक्षा अधिकारी आ रहे, सो वो तुमसे भी मिलेंगे।

श्रुति: जी बाबा चली जाऊंगी, वैसे भी अब तो फिर कभी स्कूल जाना नहीं है, सो आखिरी बार हो आउंगी।

श्रुति की माँ: पलंग पर से लेटे लेटे हुए ही, “हां हां, जाएगी क्यूँ नहीं, इसी स्कूल ने और तेरे बाबा ने ही तो तेरा दिमाग खराब किया है, बड़ी होती जा रही और बोल रही अभी शादी नही करनी।

रसोईघर से श्रुति के धीमे से सिसकने की आवाज सुनाई पड़ी। पारो और राहुल वक़्त की नजाकत को भाँपते हुए दरवाज़े को खिसक लिए। शिव बाबू को भी मामला पकड़ते देर न लगी, जरूर फिर से कोई रिश्ते की बात उठी होगी।

तभी दादी माँ कहीं बाहर से टहलते हुए आयी, श्रुति ने सबको चाय थमाई और अन्दर के कमरे में जाकर लेट गयी। लाल आंखों को छुपाने का कोई और तरीका भी तो न था। दादी ने मामा द्वारा भेजे हुए संदेश को और बढ़ चढ़ कर कह सुनाया, हर बार की तरह इस बार बाबा ने कोई जिरह न करी। इस बात पे तेजी से धड़कता हुआ श्रुति का दिल पूरी तरह धौंकनी देने लगा, उम्मीद अब पूरी तरह से जो टूट चुकी थी, आँखों से उसके अलकनंदा और मंदाकिनी की धार फूट पड़ी, पर कोई गर्जना न हुई। आज फिर से एक निरीह कन्या ने अपनी नियति को आत्मसात जो कर लिया था।

प्रीती ने किसी तरह रात्रि का भोजन अकेले ही तैयार किया, दादी का कोई मतलब था नहीं, माँ उठ नहीं सकती थी, और श्रुती उठी नहीं, न जाने कब की उसकी आँखें लग चुकी थी। धमाचौकड़ी मचाने वाला राहुल भी आज बहन को उठाने का भरसक प्रयास करता हुआ थक कर उस से लिपट कर सो रहा। बाल मन कहाँ जाने की उसकी सबसे बड़ी बहन आज उस से क्यूँ रूठ गयी है।

~ आगे जारी है..

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा, तीसरी कड़ी)

बाबा के वो शब्द ज्यों ही श्रुति के अवचेतन मन में गूंजे वो अपनी चेतना में वापस लौट आयी। उसे सुध बुध ही न थी कि वो कितनी देर तलक यूँ ही पेड़ के नीचे बैठी रही। ध्यान जब टिफ़िन पे गया तो हड़बड़ा कर उठी, फिक्र हो आया कि भोजन कहीं ठंडा न हो गया हो। सूरज थोड़ा और नीचे को उतर आया, धूप अब सीधे चेहरे पे आकर गिर रही थी मानो आँखों में ही उतरने को बेताब हो। पलकों के ऊपर हथेलियों का छांव करते हुए वह कुछ और तेज कदमों से चलने लगी। सुबह दो रोटी खाकर ही तो खेतों पे चले गए थे बाबा, पता नहीं कब से भूख लगी हो, खामखाँ सुस्ताने को बैठ गयी, उसे अब अपने ऊपर थोड़ी खीझ सी मची।

पचास की उम्र पार कर चुके शिवनारायण सिंह(बाबा), की कदकाठी यूँ थी मानों अभी भी अपने उम्र को हर रोज मात दे रहे हों, उनके साथ के कई लोगों ने तो बिस्तर की राह पकड़ ली, पर एक वो थे मानों सीने में अश्व का बल लिए घूम रहे हों। शिव बाबू अभी भी जोश और जुनून से भरे, मिट्टी में इस कदर गुथे थे जैसे बरगद की पुरानी जड़ें दूर तलक फैली हों। जिंदगी की झंझावातों ने कई दफा उनके हौंसलों पर आघात डालने की कोशिश करी पर वो अपने कर्तव्यों की कसौटी पे हमेशा अव्वल रहे। शायद उनके लिए तीनों बच्चे उस किले की प्राचीर की भांति थे, जिसे वो किसी कीमत पे टूटते हुए नहीं देख सकते थे, ये तो राजा के रूप में उनकी हार समान होती।

आज भले ही शिव बाबू एक निम्नवर्गीय किसान की हैसियत में आ गए हों, पर उनकी रगों में बहता खून अभी भी जमींदारी ही था। अतीत के पन्नों को टटोला जाए तो वे उन पूर्वजों के वंशज थे जो कभी हजारों एकड़ जमीन के मालिक हुआ करते थे। पर पूर्वजों के मानसिक दिवालियापन और विलासिता के दीमक ने सबकुछ तबाह कर डाला। पुरानी हवेली को खंडहर में तब्दील हुए तो अब सौ वर्ष बीत गए होंगे। गांव से कोई दो कोस दूर उसके अवशेष अपने इतिहास को रोते हुए दिख पड़ते हैं। अब गिनी चुनी पीढियां ही उस वंश की आखिरी हकदार के रूप में इस गांव में बची थी सो इस परिवार का मान अभी भी कम न हुआ था। कर्मठ मिजाज वाले शिव बाबू ने और भी इज़्ज़त अपने लिए सबके दिलों में कमाई। तीन भाइयों और चार बहनों में वो सबसे छोटे थे, घर की हालत इतनी तंग, कि पढ़ना लिखना तो बहुत दूर की बात थी। खेतों में दिन रात की मेहनत और कितनी ही जमीनों के बिकने के बाद चारों बहनों की शादी हो पाई, जो बचा उसी में से ढाई एकड़ उनके हिस्से आया। उन्होंने भी कमर कस ली और उसी जमीन के सहारे परिवार की आजीविका चलाने लगे। दो बेटियों ने भी इस आँगन में जब जन्म लिया तो भी उन दोनों को लक्ष्मी सा ही मान मिला। खेतों ने भी झूम के खुशियाँ बरसाई, फिर भी घर पे दरिद्रता ने अपने पंजों को गड़ाए ही रखा। बेशक सारी आमदनी का हिसाब किताब दादी माँ के पास हो, पर उनकी जेब हमेशा सारो और पारो की खुशियों के लिए भरा ही रहा करता था। हर साल दीपावली में जब नए कपड़ों की खरीदारी होती तो कुछ की कीमतों और उनके चमक में बड़ा भारी अंतर देख सब यही सोचते कि शिव बाबू ने बड़े सस्ते दामों में कितने अच्छे कपड़े खरीदे हैं, पर अंदर का भेद तो वही जानते थे।

श्रुती लगभग हाँफते हुये बासे पे पहुंची, पर वहाँ बाबा को न देख उसका दिल धक्क से रह गया। पता नही इन्तेजार करते करते वो कहाँ को चले गए होंगे वो सोच सोच कर के परेशान होने लगी। चौंकी का बिस्तर, वगेरह सबकुछ व्यवस्थित दिखा, गाय के चारे के दानों में भी भगोने पे बाकायदा उबाल आ रहा था और चूल्हे में आंच भी बराबर लगी हुई थी। हर दिन ये काम वो ही आकर किया करती थी, जो कि शिव बाबू पिछले कुछ दिनों से खुद ही करने लगे थे। वो सोचने को मजबूर हुई की कहीं बाबा मेरे चले जाने के बाद कि आदत तो नहीं डाल रहे, इतना सोचते ही एक कंपन की लहर सर से पांव तक दौड़ गयी।

वो टिफ़िन ले वहीं धम्म से मचान के ऊपर बैठ, बेमन हो झूलते अपने नंगे पाँवों को निहारने लगी। गीली पुतलियों से उंगलियों में अंतर कर पाना बड़ा मुश्किल था, और लाल नेलपॉलिश की लकीर ऐसी जान पड़ रही थी मानों नए घाव से बहता हुआ रक्त ही हो..

आगे जारी है..

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा, दूसरी कड़ी)

गतंक से आगे..

अतीत की सारी यादों को चलचित्र की भांति मन की आंखों से निहारते हुए वो चली जा रही थी, आधा रास्ता तय कर चुकने के बाद थक कर थोड़ी देर को सड़क किनारे पाखर के पेंड के नीचे बैठ गयी। पैरों के साथ साथ मन मस्तिष्क पे भी थकान ने डोरे डालने शुरू कर दिए थे।

सड़क वही था, बस वक़्त के कांटे को थोड़ा पीछे धकेलते हुए, श्रुती भूली बिसरी यादों के पन्नों को खोल बैठी..

“बाबा, पाँव दुख रहे मेरे” बस इतना ही तो कहना होता और बाबा कैसे एक हल्की झिड़की देते हुए उसे कांधे पे बिठाते हुए कहते , अब अगली बार से खेतों पर लेकर नहीं लाऊँगा तुझे, फिर कभी जिद मत करना। इतना सुनते ही, एक रोनी आवाज़ का नाटक कर बस उनके गर्दन पे बाहों का थोड़ा कसाव ही तो बढ़ाना होता और बाबा हार मानने का नाटक कर बोल पड़ते, ठीक है ठीक है, लाऊँगा, अब सांस तो आन को छोड़ दे।

तभी रंभाता हुआ गाय का एक बछड़ा वहाँ आ पहुंचा, शायद अपनी माँ से बिछड़ गया होगा, और उस कोलाहल से श्रुति का बैचैन मन फिर से वर्तमान में आकर टिक गया। उसने बछड़े को थोड़े प्यार से सहलाया तो वो भी अपना प्रेम वात्सल्य दर्शाता हुआ जीभ से उसकी गर्दन को चटोरने लगा। सिहरन और गुदगुदाहट की वजह से वो खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली “तू आया रे बड़ा छिछोरा”, बछड़ा सहम कर थोड़ा दूर को हट कर खड़ा हो गया। तभी उसे उसकी माँ नज़र आ गयी और तो फिर वो कुलाँचे मारता हुआ वहां से दौड़ पड़ा। दो घड़ी की खुशियां फिर से शून्य में विलुप्त हो गयी, श्रुति का खिला खिला मन फिर से व्याकुल हो उठा।

कितने मजबूत काँधे थे बाबा के पर जिंदगी की झंझावातों ने उसे भी झुकने को मजबूर कर दिया। ऐसा न था कि गरीबी ने घर की खुशियों पे शुरू से ही कोई पहरा डाल रखा हो। बाबा की दुलारी तो थी ही और माँ का भी स्नेह प्रगाढ़ था, पर प्रीति के आने के बाद चीजें बड़ी तेजी से बदलती चली गईं। दूसरी लड़की हो जाने से दादी और माँ दोनों के चेहरे पे स्थायी तौर पे शिकन की लकीरें खींच गयी जो फिर कभी न गयीं। थोड़ी बहुत जो कसर रह गयी थी वो माँ की निरंतर बनी रहने वाली अस्वस्थता ने पूरी कर दी। बहुत चिढ़चिढ़ी सी रहने लगी थी वो, बार बार का चीखना चिल्लाना और नसीब का रोना अब इस परिवार की नियति बन चुकी थी। दादी माँ उम्र के अंतिम पड़ाव पे खड़ी होने के बावजूद भी घर के अधिकार की बागडोर को छोड़ने को तैयार न थी। दादी और माँ के बीच होने वाली खटपट ने माहौल को और भी तनाव पूर्ण बना कर रख छोड़ा था। पर इन सब के बावजूद बाबा का स्नेह श्रुति और प्रीति के प्रति कम न हुआ। उन दोनों के लिए बाबा उस वट वृक्ष के समान थे जो किसी भी तूफान या विषम परिस्थिति में भी अपने आश्रय देने का धर्म निभाना नहीं भूल जाता।

थोड़ी खुशियाँ आयी जब काफी लंबे अरसे बाद घर में फिर से नन्हे बालक की किलकारियों ने गूंज दी। श्रुति अब बारह वर्ष की हो चुकी थी और काफी कुछ समझने भी लगी थी। उसे अपने नवागंतुक भाई की किलकारियों में, दादी के सामने अपनी माँ की पराजय के रुदन गान का सा एहसास होता था। दादी के तानों से ही परास्त होकर इतनी अस्वस्थता में भी माँ दुबारे गर्भ को ठहराने को मजबूर हुई थी। बार बार के इसी रट से की “मरने से पहले पोते का मुंह तो दिखला दे” ने माँ को अंदर तक से तोड़ डाला था। कही न कही माँ भी इन सब के लिए दोनों बहनों को ही जिम्मेदार मानने लगी थी और उनके प्रति सारा स्नेह जाता रहा। भगवान ने माँ की सुन तो ली पर उसे किसी काम के लायक का न छोड़ा, अस्वस्थता के गम्भीर मकड़जाल में वो ऐसे घिरी की फिर बाहर न निकल पायी। ऐसा न था कि दोनों अपने भाई से लगाव न रखती थीं, जान छिड़कती थी उसपे।

जैसे तैसे वर्ष और गुजरते गए, दोनों बहनों के ऊपर घर की जिम्मेदारियों का भार बढ़ता ही चला गया। इतनी कम उम्र में ही दोनों ने काफी अरसे को जी लिया था और समझदारी ऐसी की बड़ों बड़ो को शर्म आ जाये। चूल्हे चौके, झाड़ू बहाडू से लेकर भाई को संभालने तक का काम इन्हीं के हिस्से था। पर इन सब को निभाते हुए भी उन्होंने स्कूल जाना न छोड़ा, इस बात को लेकर भी कई बार घर में तनातनी की स्तिथि बनी। दादी और बाबा इस बात को लेकर कई बार आमने सामने आ गए कि छोरियों को क्या जरूरत स्कूल जाने की जब घर मे बीमारी है। पर बाबा हर बार ढाल बन कर खड़े हो गए ~ “मेरी छोरियां पढ़ेंगी चाहे सूरज को पश्चिम से काहे को न उगने पड़े”

आगे जारी है/ to be continued..

~ग़ौरी

Novella – 2. बाबा ~ (एक दीर्घ कथा, पहली कड़ी)

Dear All, Greetings!! Based on entangled threads of socioeconomic conditions of our country, I have come up with a new story, which I would put here in few parts. I would like all of you to feel the depth of emotional gravity of human thoughts which would finally conquer the demonic forces of poverty and illiteracy. A bud of hope and aspirations would see the new day light. Do share your views and thoughts hope to hear from all of you)

पांव उसके कुछ उखड़े उखड़े से थे। मन अनमना सा हो रहा था। सड़क वही जानी पहचानी, फिर भी एक संशय की स्तिथि में गुम हो धीरे धीरे उसके कदम आगे को बढ़ रहे थे। बैसाख महीने की तेज धूप में अपने सर को पल्लू से ढंक, एक हाथ में टिफ़िन का डब्बा लिए वो चली जा रही थी। कच्ची सड़क पर तेज गर्म हवाओं से जब धूल का एक गुबार उठता तो परेशान हो वो मुह फेर कर थोड़ी देर के लिए खड़ी हो जाती। और वेग कम होते ही फिर चलने लगती। दियारा पास में होने की वजह से गर्म दुपहरी में ऐसा होना एक आम बात थी।

पर आज कुछ था जिस वजह से श्रुति अंदर ही अंदर घुली जा रही थी। दोपहर के समय रोज इसी एक चीज़ में उसे सबसे ज्यादा तसल्ली मिलती, जब वो स्कूल से वापस आकर अपने बाबा के लिए खाना लेकर बासा पे जाया करती। घर से कोई एक कोस की दूरी पे बासा था, फिर भी कच्ची सड़कों को रोज नापने में उसे सबसे ज्यादा ख़ुशी मिलती। उसे आया देख उसके बाबा के मुरझाए चेहरे पे जो हल्की सी मुस्कान बिख़र आया करती थी वो उसके लिए किसी जेवर की चमक से कमतर न मालूम पड़ती थी।

एक निम्नवर्गीय किसान परिवार में जन्मी श्रुति तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, उससे छोटी उसकी बहन प्रीति और सबसे छोटा भाई राहुल था। श्रुति नाम उसके नाना जी ने रखा जो उसके बाबा के जुबान पे कभी न चढ़ पाया, वे उसे सारो और प्रीति को पारो ही कहकर बुलाते थे, शायद ई की मात्रा से उनका पुराने जन्म का कोई बैर रहा होगा, क्योंकि उन्होंने राहुल के नाम से कोई छेड़ छाड़ जो नहीं करी। सारो से तो कोई दिक्कत न हुई पर पारो नाम से बेचारी प्रीति कई मर्तबा व्यंग्य का शिकार हुई, इस बात को लेकर उसकी बाबा से एक अघोषित नाराजगी आज तलक जारी है।

कुछ दिन पहले ही श्रुति के बारहवीं के नतीजे घोषित हुए थे, अपने स्कूल में विज्ञान सर्ग में सबसे अच्छे दर्ज़े में पास हुयी थी। पर पूरे घर मे मानों सिर्फ वो और उसके बाबा ही थे जो इस बात पे फुले न समा रहे हों। माँ और दादी तो जैसे कोई बूत हो, कोई प्रतिक्रिया ही न हुई उनकी तरफ से, बहुत बड़ा भेद था ये, जिसे सिर्फ श्रुति ही जानती थी। अपने दिल पे एक भारी सा पत्थर रख कर उसने भी अपनी नियति से समझौता करने की तैयारी कर ली थी। पर कहीं न कहीं इस बोझ के तले उसका मन और हृदय गहरे गर्त में फिसलता जा रहा था। घर में कोई भी पढ़ा लिखा न था न माँ न बाबा, दादी अभी भी पुरातन ख़यालों की पूजक थी। ऐसा न था कि उसके अशिक्षित बाबा अपनी पढ़ी लिखी बच्ची के मनोभावों से अवगत न थे, पर वो भी मज़बूरी की जंजीरों में जकड़े हुये थे..

आगे अगले अंक में जारी /To be continued in next episode.

Image source google.

~ गौरी

उहा पोह (छठवीं कड़ी)

(Dear Readers. Initially I had a thought to finish off this story in only two parts, but due to free flow of word waves and amazing positive responses from all of you I had to postpone that plan. But I dont want to stretch this story too long, so here I am posting the second last episode and next one would be the last, including all episodes into one. Happy reading and thank you all of you once again for support and care)

तभी अंकल ने चुप्पी तोड़ी..

बूंदा बांदी के शोर में उनकी आवाज भी थोड़ी छन कर आ रही थी। वो बोले, सबसे पहले विजयनगर सर्कल आएगा, फिर आगे को केशरबाग है। लाहोटी कालोनी उल्टे रास्ते को पड़ेगा, अगर तुम चाहो तो यहीं विजयनगर सर्कल पे उतर कर बस ले सकते हो, वैसे हम थोड़ी देर में गश्त पे उस ओर को ही निकलेंगे, तुम चाहो तो हमारे साथ तब तक रुक सकते हो। उन्होंने मेरी तरफ इशारा किया।

अगले दिन रविवार होने की वजह से छुट्टी थी!! और मैं तो वैसे भी बहाने ढूंढ ही रहा था की आज की शाम को यादगार कैसे बनाया जाये। मैंने एक अल्प विराम लेकर तुरंत हामी भर दी। थोड़ी ही देर में वहाँ एक चुप्पी फिर पसर गयी, जिसे इस बार संध्या ने तोड़ा। उसने अंकल से उनका परिचय पूछ लिया, ये शिष्टाचार का वो पहलू था जिसे निभाना बहुत ही जरूरी था। मैं भी काफी देर से उनका परिचय जानना चाह रहा था, पर एक संशय सा था की पता नहीं वो कहीं बुरा ना मान जाएं आखिर थे तो पुलिस वाले।

“मैं रघुवर सिंह हूँ, यहाँ लालगंज थाने में पोस्टेड हूँ, मूलतः बस्ती जिले का रहने वाला हूँ, इस शहर में पोस्टिंग हुए दो साल से ऊपर हो गए। ये जो मेरे साथ में सहकर्मी हैं वो महेंद्र यादव हैं गोरखपुर के रहने वाले” एक ही साँस में उन्होंने अपना और अपने साथी का परिचय कह डाला। महेंद्र यादव जी वहाँ उपस्थित होते हुए भी मानो गैरहाज़िर थे उनका सारा का सारा ध्यान गाड़ी चलाते वक्त सड़क पर केंद्रित हो रखा था, मोटी बारिश की बूंदों की वज़ह से दृश्यता बहुत ही गिर गयी थी जिसकी वजह से वो बहुत ही धीमे और संभल कर गाड़ी चला रहे थे, और ये एक बहुत ही अच्छी बात थी।

दस मिनट में हम विजयनगर सर्कल पहुँच चुके थे, महेंद्र जी ने जीप बिल्कुल बस स्टॉप के पास खड़ी की। राहुल के हाव भाव देख कर ऐसा लग रहा था कि उसे उतरने की कितनी जल्दी मची हुई है। गाड़ी रुकते ही वो सीधे उतरा और स्टॉप की ओर दौड़ पड़ा। संध्या ने उसे बाय बोलने के लिए हाथ भी उठाया, पर राहुल इतनी तेजी में आगे की ओर लपका की उसने पीछे मुड़ना भी मुनासिब नहीं समझा। जीप आगे की ओर बढ़ गयी। संध्या ने अपना उठा हुआ हाथ धीरे से अपने गोद में रख लिया। राहुल के इस व्यवहार ने जितनी ठेस संध्या को पहुंचाई थी उतना ही मुझे भी असमंजस में डाल के रख दिया। मैं संध्या के पेशानी पे खींची शिकन की लकीरों को देख ये समझ गया था कि उसे ये बात बहुत ही बुरी लगी थी। बुरी लगनी भी चाहिए थी क्योंकि बात सिर्फ़ बाय बोल देने भर तक की नहीं थी। राहुल चाहता तो वो भी संध्या को छोड़ने साथ साथ चल सकता था और वापसी में मेरे साथ आ जाता, पर उसने ऐसा नहीं किया। पक्के तौर पे तो नहीं कह सकता पर हाँ शायद इस रिश्ते में खटास की पहली बूँद पड़ चुकी थी।

मैंने मौके की नज़ाकत को समझते हुए, संध्या का ध्यान राहुल की तरफ से हटाना चाहा। हम दोनों के बीच बातचीत का एक लंबा दौर चला जो कि मुख्यतः हम दोनों की पढ़ाई से संबंधित बातों पर ही केंद्रित रहा। पता चला कि वो राजनीति शास्त्र में स्नातक की द्वितीय वर्ष की छात्रा थी, और यहाँ रह कर सिविल सेवा की तैयारी कर रही थी। इसी लक्ष्य की तैयारी में मैं भी लगा था। मैं इतिहास में स्नातक के अंतिम वर्ष में था। वास्तव में हम दोनों को बहुत ख़ुशी हुई की हमारा लक्ष्य और उद्देष्य एक ही था। हमने भविष्य में भी एक दूसरे से संपर्क में बने रहने के लिए अपने अपने फ़ोन नंबर एक्सचेंज कर लिए। हाँ पर यहाँ ये बता दूँ की इसकी पहल संध्या ने ही कि थी। मैं तो उन किस्म के लड़कों की श्रेणी में आता हूँ जिनके लिए लड़कियों से सिर्फ उनका नाम तक पूछ लेना भी गणितीय अलजेब्रा के किसी भारी भरकम सवाल से कम पेचीदा मालूम नहीं जान पड़ता।

केशरबाग बस आने ही वाला था, वस्तुतः यह कॉलोनी शहर के काफी रिहायसी इलाकों में से एक माना जाता रहा है। विश्वविद्यालय के बहुत करीब होने की वजह से ये जगह छात्राओं की पहली पसंद बना हुआ है। इस इलाके में ढेर सारे पेइंग गेस्ट और गर्ल्स होस्टल के विकल्प मौजूद हैं। सबसे मज़ेदार बात तो ये है की इस इलाके के रहने वाले, लड़कों को किराये पे रखते ही नहीं है। ये बात पूरी यूनिवर्सिटी में चर्चित है कि आज तक जिस किसी भी लड़के ने इस मामले में अपना हाथ आजमाने की कोशिश करी है उसे असफलता के अलावा कुछ और हाथ नहीं लगा। वैसे जिस समझदारी की नज़ीर यहाँ के रहवासियों ने पेश की है वो बात काफी काबिले गौर और तारीफ़ की हक़दार है, ये तो मानना पड़ेगा।

बारिश का वेग अब बिल्कुल धीमा पड़ चुका था, और हवाओं में सिर्फ पानी के फुहारे तैर रहे थे। तभी रघुवीर अंकल ने संध्या से पूछा “बेटी आपका होस्टल किस तरफ को है” संध्या ने जवाब दिया “जी अंकल बस यही सामने वाले मोड़ से अंदर जाने वाली सड़क पर है”। रघुवीर अंकल ने महेंद्र को गाड़ी यहीं किनारे में खड़े कर देने को कहा। हम दोनों को थोड़ा आचम्भा सा भी हुआ की जब इतने दूर तक लेकर आ ही गये थे तो थोड़ी दूर के लिए गाड़ी पहले ही क्यूँ रुकवा दी।

गाड़ी रुकते ही अंकल संध्या की और मुखातिब हुए और बोले “बच्चे अगर इसी गाड़ी में बैठ कर होस्टल तक गए तो खामखाँ तुम्हारे नाम के चर्चे होंगे, ये कोई आम गाड़ी नहीं पुलिस वालों की जीप है, इसलिए अच्छा है यहाँ से थोड़ी दूर पैदल ही चले जाओ, वैसे भी बारिश अब थम चुकी है। उन्होंने हंसते हुए कहा, उनकी इस बात पे महेंद्र भी हँस पड़े।

वास्तविकता का भान होते ही हम भी मुस्कुरा पड़े…

(अगले अंक में जारी)

IN URDU

تبھی انکل نے خاموشی توڑ ..

بوندا باندی کے شور میں ان کی آواز بھی تھوڑی چھن کر آ رہی تھی. وہ بولے، سب سے پہلے وجئے نگر دائرے آئے گا، پھر آگے کو كےشرباگ ہے. لاهوٹي کالونی الٹی راستے کو پڑے گا، اگر آپ چاہیں تو یہیں وجئے نگر دائرے پہ اتر کر بس لے سکتے ہو، ویسے ہم تھوڑی دیر میں گشت پہ اس طرف کو ہی نکلیں، آپ چاہیں تو ہمارے ساتھ اس وقت تک رک سکتے ہو. انہوں نے میری طرف اشارہ کیا.

اگلے دن اتوار ہونے کی وجہ سے چھٹی تھی !! اور میں تو ویسے بھی بہانے ڈھونڈ ہی رہا تھا کی آج کی شام کو یادگار کس طرح بنایا جائے. میں نے ایک کوما لے کر فوری طور پر حامی بھر دی. تھوڑی ہی دیر میں وہاں ایک خاموشی پھر پسر گئی، جسے اس وقت شام نے توڑا. اس نے انکل سے ان کا تعارف پوچھ لیا، یہ آداب کا وہ پہلو تھا جسے نبھانا بہت ہی ضروری تھا. میں نے بھی کافی دیر سے ان کا تعارف جاننا چاہ رہا تھا، پر ایک شک سا تھا پتہ نہیں وہ کہیں برا نہ مان جائیں آخر تھے تو پولیس والے.

“میں رگھوور سنگھ ہوں، یہاں لال گنج تھانے میں پوسٹےڈ ہوں، اصل بستی ضلع کا رہنے والا ہوں، اس شہر میں پوسٹنگ ہوئے دو سال سے اوپر ہو گئے. یہ جو میرے ساتھ میں ہم مرتبہ ہیں وہ مہندر یادو ہیں گورکھپور کے رہنے والے “ایک ہی سانس میں انہوں نے اپنا اور آپ کے ساتھی کا تعارف کہہ ڈالا. مہندر یادو جی وہاں موجود ہوتے ہوئے بھی گویا گےرهاذر تھے ان کا سارا کا سارا دھیان گاڑی چلاتے وقت سڑک پر مرکوز ہو رکھا تھا، موٹی بارش کے قطرے کی وجہ سے نمائش بہت گر گئی تھی جس کی وجہ سے وہ بہت ہی سست اور سنبھل کر گاڑی چلا رہے تھے، اور یہ ایک بہت ہی اچھی بات تھی.

دس منٹ میں ہم وجئے نگر دائرے پہنچ چکے تھے، مہندر جی نے جیپ بالکل بس سٹاپ کے قریب کھڑی کی. راہل کے ہاو بھاو دیکھ کر ایسا لگ رہا تھا کہ اسے اترنے کی کتنی جلدی مچی ہوئی ہے. گاڑی رکتے ہی وہ براہ راست اترا اور سٹاپ کی طرف دوڑ پڑا. شام نے اسے بائی بولنے کے لئے ہاتھ بھی اٹھایا، پر راہل اتنی تیزی میں آگے کی جانب لپکا کی اس نے پیچھے مڑنا بھی مناسب نہیں سمجھا. جیپ آگے کی طرف بڑھ گئی. شام نے اپنا اٹھا ہوا ہاتھ آہستہ سے اپنے گود میں رکھ لیا. راہل کے اس رویے نے جتنی ٹھیس شام کو پہنچائی تھی اتنا ہی مجھے بھی کشمکش میں ڈال کے رکھ دیا. میں شام کے پیشانی پہ کھینچی شیکن کی لکیروں کو دیکھ یہ سمجھ گیا تھا کہ اسے یہ بات بہت ہی بری لگی تھی. بری لگنی بھی چاہیے تھی کیونکہ بات صرف بائی دھن دینے بھر تک کی نہیں تھی. راہل چاہتا تو وہ بھی شام کو چھوڑنے ساتھ ساتھ چل سکتا تھا اور واپسی میں میرے ساتھ آ جاتا، پر اس نے ایسا نہیں کیا. پکے طور پہ تو نہیں کہہ سکتا پر جی ہاں شاید اس رشتے میں کھٹاس کی پہلی بلاب پڑ چکی تھی.

میں نے موقع کی نزاکت کو سمجھتے ہوئے، شام کی توجہ راہل کی جانب سے ہٹانا چاہا. ہم دونوں کے درمیان بات چیت کا ایک طویل دور چلا جو بنیادی طور ہم دونوں کی پڑھائی سے متعلق باتوں پر ہی مرکوز رہا. پتہ چلا کہ وہ سیاسیات میں بیچلر کی دوم سال سکول تھی، اور یہاں رہ کر سول سروس کی تیاری کر رہی تھی. اسی مقصد کی تیاری میں میں بھی لگا تھا. میں تاریخ میں گریجویشن کے آخری سال میں تھا. اصل میں ہم دونوں کو بہت خوشی ہوئی کی ہمارا مقصد اور اددےشي ایک ہی تھا. ہم نے مستقبل میں بھی ایک دوسرے سے رابطے میں رہنے کے لئے اپنے اپنے فون نمبر ایکسچینج کر لئے. جی ہاں پر یہاں یہ بتا دوں کے اس پہل موقع نے ہی کہ تھی. میں تو ان قسم کے لڑکوں کے زمرے میں آتا ہوں جن کے لئے لڑکیوں سے صرف ان کا نام تک پوچھ لینا بھی ریاضی الجےبرا کے کسی بھاری بھرکم سوال سے کم دلچسپ معلوم نہیں جان پڑتا.

كےشرباگ بس آنے ہی والا تھا، عملی طور یہ کالونی شہر کے کافی رهايسي علاقوں میں سے ایک سمجھا جاتا رہا ہے. یونیورسٹی کے بہت قریب ہونے کی وجہ سے یہ جگہ طالبات کی پہلی پسند بنا ہوا ہے. اس علاقے میں ڈھیر سارے ادائیگی مہمان اور لڑکیاں ہوسٹل کے اختیارات موجود ہیں. سب سے مزیدار بات تو یہ ہے کی اس علاقے کے رہنے والے، لڑکوں کو رینٹل پہ رکھتے ہی نہیں ہے. یہ بات پوری یونیورسٹی میں مشہور ہے کہ آج تک جس کسی بھی لڑکے نے اس معاملے میں اپنا ہاتھ کرنے کی کوشش کرنے کی کوشش کری ہے اس ناکامی کے علاوہ کچھ اور ہاتھ نہیں لگا. ویسے جس سمجھداری کی نذیر یہاں کے رهواسيو نے پیش کی ہے وہ بات کافی قابل غور اور تعریف کی حق دار ہے، یہ تو ماننا پڑے گا.

بارش کی رفتار اب بالکل سست پڑ چکا تھا، اور ہواؤں میں صرف پانی کے پھهارے تیر رہے تھے. تبھی رگھوویر اںکل نے موقع سے پوچھا “بیٹی خوش ہوسٹل کس طرف کو ہے” شام نے جواب دیا “جی انکل بس یہی سامنے والے موڑ سے اندر جانے والی سڑک پر ہے”. رگھو ویر انکل نے مہندر ٹوکری یہیں کنارے میں کھڑے کر دینے کو کہا. ہم دونوں کو تھوڑا اچمبھا سا بھی ہوا جب اتنے دور تک لے کر آ ہی گئے تھے تو تھوڑی دور کے لئے کی ٹوکری پہلے ہی کیوں رکوا دی.

گاڑی رکتے ہی انکل شام کی اور مخاطب ہوئے اور بولے “بچے اگر اسی گاڑی میں بیٹھ کر ہوسٹل تک گئے تو كھامكھا تمہارے نام کے چرچے ہوں گے، یہ کوئی عام گاڑی نہیں پولیس والوں کی جیپ ہے، تو اچھا ہے یہاں سے تھوڑی دور پیدل ہی چلے جاؤ، ویسے بھی بارش ابھی تھم چکی ہے. انہوں نے ہنستے ہوئے کہا، ان کی اس بات پہ مہندر بھی ہنس پڑے.

حقیقت کا بھان ہوتے ہی ہم بھی مسکرا پڑے …

(اگلے شمارے میں جاری)

~ ग़ौरी

उहा पोह (चौथी कड़ी)

अब बोलने की बारी उन दोनों कि थी..

अब आगे..

जी !!जी!! वो हम क्लासेस खत्म होने के बाद यूँही टहलते टहलते यहां आ गए थे, बैठे बैठे थोड़ी देर हो गयी, निकलने ही वाले थे कि अचानक से मौसम का मिज़ाज़ बदल गया। किसी तरह लड़के ने जोर लगा कर कहा।

फिर पुलिस वाले अंकल ने लड़की की तरफ आँखे तरेरी और फूट पड़े।

“घर से तुम लोग कह के निकलते हो कि पढ़ाई करने जा रहे और फिर इधर उधर आवारागर्दी करते फिरते हो, शर्म नहीं आती”

“जी नहीं अंकल ऐसा कुछ नहीं आप हमें गलत समझ रहे हो” लड़की ने कहा।

“हाँ हम पुलिस वाले तो हमेशा गलत ही समझते हैं, हम लोगों ने ऐसे ही खेल खेल में अपने सिर के बाल सफेद नहीं किये हैं, नाम क्या है तुम लोगों का और यहाँ कहाँ रहते हो ”

“जी सर मेरा नाम संध्या है, मैं केशरबाग के भाग्यश्री गर्ल्स हॉस्टल में रहती हूँ और ये राहुल है मेरा दोस्त और क्लासमेट”

“मैं यहीं पास विजयनगर में रहता हूँ”- लड़के ने भी तपाक से जवाब दिया।

अब पुलिस वाले अंकल ने मेरी तरफ देखा, इतनी देर में तो काफी दम भर चुका था सो थोड़ा सहज हो कर बोला मैं गौरव हूँ , लाहोटी कॉलोनी में रहता हूँ। मैं तो अकेला ही यूँही शाम के वक़्त गंगा जी के दर्शन करने चला आया था। मैंने ये अच्छा मौका समझा अपने आप को उनसे अलग दिखाने का।

अपनी राइफल को थोड़ा पीछे उचकाते हुए पुलिस वाले अंकल बोल उठे, ”

तुम सब को जरा भी परवाह है अपने वाल्दैन की, कितनी उम्मीदों से उन्होंने तुम लोगों को यहाँ बड़े शहर में पढ़ने लिखने भेजा है और तुम यहाँ अपना भविष्य बनाने की बजाय ये मटरगश्ती में अपना वक़्त जाया कर रहे।” और तुम्हें उन्होंने संध्या की तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हें जरा भी एहसास है कि शहर का माहौल कितना खराब है, आये दिन कुछ न कुछ वारदातें होती रहती, हम पुलिस वैसे ही परेशान है । सारी जिम्मेदारी हमारी ही थोड़े न है, कुछ तो अपना भी होश रखा करो। कम से कम अपना नहीं तो अपने माँ बाबू जी का ही ख्याल रख लिया करो। उन्होंने तुम पर विश्वास कर के ही इतनी दूर भेजा है पढ़ाई लिखाई के लिए, अगर कुछ ऊंच नीच हो गयी तो वो क्या अपने आप को माफ कर पायेंगे।”

शायद पुलिस वाले अंकल के अंदर का सोया हुआ पितृ भाव कहीं न कहीं जाग उठा था। उनकी इन बातों से थोड़ा बहुत अपराध बोध तो हम सब को हुआ, खासकर संध्या को, जो उसके चेहरे पे छलक भी आया था। उसने बड़ी शालीनतापूर्वक जवाब दिया, जी अंकल आप सही कह रहे हैं, आगे से वक़्त का और जगह का ध्यान रखेंगे।

(खैर आज जब इन बातों को याद करता हूँ तो यही सोचता हूँ की आज भी समाज में स्त्री जाति पर कितनी ही बंदिशें लागू है। हर पग पे नई किस्म की पाबंदियाँ और चुनौती। जन्म लेते ही वो एक ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर होती है जिसके अधिकांश फैसले उसके खुद के नहीं होते। और साथ ही साथ परिवार और समाज की मान मर्यादा की गठरी का बोझ भी उसे ही सर पे ढोना है।)

अभी वार्तालाप का दौर थमा ही था कि, मूसलाधार बारिश शुरू हो गई..

(आगे आगले अंक में जारी)

IN URDU

اب آگے

جی !! جی !! وہ ہم طبقات ختم ہونے کے بعد یوںہی ٹہلتے ٹہلتے یہاں آ گئے تھے، بیٹھے بیٹھے تھوڑی دیر ہو گئی، نکلنے ہی والے تھے کہ اچانک سے موسم کا مزاج تبدیل کر دیا. کسی طرح لڑکے نے زور لگا کر کہا.

پھر پولیس والے انکل نے لڑکی کی طرف آنکھیں ترےري اور پھوٹ پڑے.

“گھر سے تم لوگ کہہ کے نکلتے ہو کہ تعلیم حاصل کرنے جا رہے اور پھر ادھر ادھر اواراگردي کرتے پھرتے ہو، شرم نہیں آتی”

“جی نہیں انکل ایسا کچھ نہیں آپ ہمیں غلط سمجھ رہے ہو” لڑکی نے کہا.

“ہاں ہم پولیس والے تو ہمیشہ غلط ہی سمجھتے ہیں، ہم لوگوں نے ایسے ہی کھیل کھیل میں آپ کے سر کے بال سفید نہیں کئے ہیں، نام کیا ہے تم لوگوں کا اور یہاں کہاں رہتے ہو”

“جی سر میرا نام شام ہے، میں كےشرباگ کے بھاگیہ لڑکیوں ہاسٹل میں رہتی ہوں اور یہ راہل ہے میرے دوست اور كلاسمےٹ”

“میں یہیں پاس وجئے نگر میں رہتا ہوں” – لڑکے نے بھی تپاک سے جواب دیا.

اب پولیس والے انکل نے میری طرف دیکھا، اتنی دیر میں تو کافی دم بھر چکا تھا سو تھوڑا آرام دہ ہو کر بولا میں فخر ہوں، لاهوٹي کالونی میں رہتا ہوں. میں تو اکیلا ہی یوںہی شام کے وقت گنگا جی کے درشن کرنے چلا آیا تھا. میں نے یہ اچھا موقع سمجھا اپنے آپ کو ان سے مختلف ظاہر کرنے کا.

اپنی رائفل کو تھوڑا پیچھے اچكاتے ہوئے پولیس اہلکار انکل بول اٹھے، “

تم سب کو ذرا بھی پرواہ ہے آپ والدین کی، کتنی توقعات سے انہوں نے تم لوگوں کو یہاں بڑے شہر میں پڑھنے لکھنے بھیجا ہے اور آپ کو یہاں اپنا مستقبل بنانے کی بجائے یہ مٹرگشتي میں اپنا وقت جایا کر رہے. “اور تمہیں انہوں نے شام کی جانب دیکھتے ہوئے کہا، “تمہیں ذرا بھی احساس ہے کہ شہر کا ماحول کتنا خراب ہے، آئے دن کچھ نہ کچھ وارداتیں ہوتی رہتی، ہم پولیس ویسے ہی پریشان ہے. ساری ذمہ داری ہماری ہی تھوڑے نہ ہے، کچھ تو اپنا بھی ہوش رکھا کرو. کم از کم اپنا نہیں تو اپنے ماں بابو جی کا ہی خیال رکھ لیا کرو. انہوں نے تم پر یقین کر کے ہی اتنی دور بھیجا ہے پڑھائی لکھائی کے لئے، اگر کچھ اونچ نیچ ہو گئی تو وہ کیا اپنے آپ کو معاف کر پائیں گے. “

شاید پولیس اہلکار انکل کے اندر کا سویا ہوا پتر اقتباس کہیں جاگ اٹھا تھا. ان کی ان باتوں سے تھوڑا بہت احساس جرم تو ہم سب کو ہوا، خاص طور پر شام کو، جو اس کے چہرے پہ چھلک بھی آیا تھا. اس نے بڑی شالينتاپوروك جواب دیا، جی انکل آپ صحیح کہہ رہے ہیں، آگے سے وقت کا اور جگہ کی توجہ رکھیں گے.

(ویسے آج جب ان باتوں کو یاد کرتا ہوں تو یہی سوچتا ہوں کی آج بھی معاشرے میں عورت ذات پر کتنی ہی بندشیں لاگو ہے. ہر چھوٹی چپٹی پہ نئی قسم کی پابندیاں اور چیلنج. پیدا ہوتے ہی وہ ایک ایسی زندگی جینے کو مجبور ہوتی ہے جس سب سے زیادہ فیصلے اس کے خود کے نہیں ہوتے. اور ساتھ ہی ساتھ خاندان اور معاشرے کی قدر عزت کی گٹھری کا بوجھ بھی اسے ہی سر پہ ٹوٹی ہے.)

اب گفتگو کا دور تھما ہی تھا کہ، موسلادھار بارش شروع ہو گئی ..

(آگے اگلے شمارے میں جاری)

~Gouri

© 2017: Shabd Ragini By Gouri

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