30. प्रियतम!

Dear all, we are publishing our second collaboration! To keep you informed the lines which I wrote are almost ten years old, and Nandita has penned a beautiful reply to that with her powerful words. I hope you all would love this, and do give your valuable feedbacks 😊

Straight ~ Gourav, Italics ~ Nandita

खामोश सर्द रातों के पसरे सन्नाटों में,
बीती बातों की बिखरी हुयी यादों में,
मोहपाश के पक्के धागों से बंध,
हृदय में बसता है जो अविरल स्पंदन,
उस निरंतरता की जननी हो तुम।
कैसे कहें कौन हो तुम?
बस इतना जान लो,
मेरी आराधना का देव संगम हो तुम।

संध्या-क्षितिज के चटकीले रंगों में,
गुजरे कल के धुंधले खयालातों में,
मन के खयाली फ़लक पे हो संग,
करती है जो निर्णय पथ को रोशन,
उषा की वो पहली किरण हो तुम।
कैसे कहें कौन हो तुम?
बस इतना जान लो,
मेरी उम्मीदों का सृजन गान हो तुम!

राहे गुज़र के पेचीदे भूल भुलैयों में,
दहकते गर्म निःश्वास के अंगारों में,
अश्क़ों को छुपाने में होकर परेशान,
आ जाती है लबों पर जो मुस्कान,
उस एहसासे जन्नत की जान हो तुम।
कैसे कहें कौन हो तुम?
बस इतना जान लो,
मेरी मन्नतो का मिला वरदान हो तुम!

राहे मंजिल के अनगिनत पड़ावों में,
इंतेज़ार ए सहर के लंबे ठहराओं में,
अलसाई आंखें कर पलकों को बंद
ढूंढे है जिसे फिर अपने अंतः करण,
वो मनमीत छुपे हुए रुस्तम हो तुम।
कैसे कहें कौन हो तुम?
बस इतना जान लो,
मेरी आरज़ू, जीवन संगीत हो तुम!


ठिठुरती शब में, सिहरती हैरतों से,
तिरछी नज़रों की काली हसरतों से,
भयभीत-व्यथित हो जिसे ढूँढे है मन,
मुझमें निहित दारा-मर्यादा के रक्षक,
पुरुषोत्तम के प्रगाण स्तंभ हो तुम।
कैसे कहूँ कौन हूँ मैं?
बस इतना मान लो,
तुम्हारे ही अस्तित्व का पर्याय हुँ मैं!

विस्मय – विलय के प्रत्येक क्षण में,
सत्य-असत्य के हर जटिल खेल में,
जिस अवलंब को तरसता है ये मन,
मेरे उस प्रगाढ़ स्नेह और निष्ठा के,
यथोचित, एक मात्र हकदार हो तुम।
कैसे कहूँ कौन हूँ मैं?
बस इतना मान लो,
तन-मन से, तुम्हारी ही अर्धांग हूँ मैं!

मुख – मंडल पे उभरी लालिमा के,
अधरों पे छलकती इस रसिका के,
जिसके चैतन्य में मेरा पूर्ण समागम,
मेरे प्राण-संगीत में बसा है जो नाम,
उन प्राणों की अतुल्य-सुधा हो तुम।
कैसे कहूँ कौन हूँ मैं?
बस इतना मान लो,
तुम्हारे ही तेज से रोशन पूनम हूँ मैं!

मन में आह्लादित इस हर्ष वंदन का,
अछों में बसे अमिट इस अक्स का,
कण-कण में शामिल इस मृदुला का,
श्वासों की ध्वनि पर होकर व्याप्त,
गूंजता हुआ अनंत प्रेम-नाद हो तुम।
क्या कहूँ कौन हूँ मैं?
बस इतना मान लो,
तुम्हारी ही माननी, जीवन संगिनी हूँ मैं!

A Collaboration by – Nandita and Gouri

काला कुत्ता!

गली में कुछ छोटे बच्चे एक मासूम को घेर कर खड़े थे और उसे नसीहतें दी जा रही थी। मामला था की, मासूम ने एक कुत्ते पे पत्थर का छोटा सा टुकड़ा फेंक दिया था।

एक बच्चा – अब तो तुम्हे पुलिस पकड़ के ले जाएगी।

दूसरा बच्चा – कल सलमान अंकल को भी पुलिस पकड़ कर ले गयी।

तीसरा बच्चा – हां उन्होंने भी काले हिरण को मारा था, तुमने भी तो काले कुत्ते को मारा है।

मासूम बालमन तब से सकते में है! उसे क्या मालूम काले हिरण और काले कुत्ते का फर्क। उसके लिए तो वही चार पैर और वही एक जान।

~ Gouri

Rhythmic Words ~ 29

जल गए घर, फैला गया अंगार शहर की गलियों में।
नफरत की जलन, जब बन गयी प्रतिघाती!
बिंध कर रह गयी मोहब्बत, प्रतिशोध की दीवारों में।

29. वज़ह (In Collaboration)

Hi everyone, for the first time I am publishing a write-up, composed in collaboration. I would like to thanks Nandita (Poetic Periscope) for coming up with such beautiful lines over my initial paras.

In Italics ~ By Nandita,

मुस्कुराहटों के नाम पे,
अधरों पे छलकता जाम हूँ।
नशे में, कभी सब बयां,
तो कभी आयी हया की,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले!

टूट कर गिरा हूँ!!
फिर भी बड़े अदब से,
सोचता हूँ उलझनों में,
कि कहीं बिखरने की,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले।

चलता हूँ फ़लक पे!
खुद में समंदर भरकर।
भिंगोता हूँ धरा को,
बस मेरे वितृष्णा की,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले।

अंक कर लेता हूँ!!
हलचल मन के हृदय से,
घबराता हूँ सावन में,
की सूखे पतझड़ की,
कोई मुझसे वजह न पूछ लें।

सच को नज़रबंद किए!
सिहरता एक चश्म हूँ।
जलता हूँ मैं हृदय में,
बस जलमग्न होने की,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले।

बारिश का मोती हूँ,
भींगकर गीले जिस्म से,
लिपटता हूँ मैं अंगारों में,
बस राख होने की,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले।

अपराधों कि श्रृंखला की,
‘भर्त्सना’ करता वो शख्स हूँ,
पर्दे में तो जो खूब मचला,
बस सामने मुंह फेर लेने की,
कोई मुझसे वजह न पूछ लें।

भुरुकवा एक तारा हूँ!
बिंधकर नीले आसमां से,
विचरता हूँ मैं अनंत में,
बस गुमशुदा होने की,
कोई मुझसे वजह न पूछ लें।

सुनकर पुकार न्याय कि,
दहकता, बना अंगार हूँ ।
भीतर से तो मैं खूब जला,
पर बाहर राख हो जाने कि,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले।

विवश हूँ शायद,
या हूँ किंकर्तव्यविमूढ़!
मनुष्य तो ठहरा जरूर,
पर इंसानियत न बचने कि,
कोई मुझसे वजह न पूछ ले!

Rhythmic Words ~ 28 (योगी आदित्यनाथ)

जयचंदों की जमात से इतिहास होता रहा शर्मिंदा है,
हार पे नहीं कोई शोक मुझे, मेरे हृदय में योगी जिंदा है।

No doubt when I look upto the pool of leaders in today’s politics, for me one name always outshine among them, a sanyasi hindu monk “yogi adityanath”. Always trying his best as chief minister of largest state of India, Uttar Pradesh to provide better governance compared to previous ones. This state in itself is larger then many other prominent countries of world.

His fearlessness and ferocity has always intrigued me, I have watched his every speech in parliament! Just his face on TV screen used to bring happiness on my face, but alas when I heard about loss in Gorakhpur loksabha constituency, it broke me down to core! The sacrifice the dedication he showed towards the people of his constituency, They can’t even repayed him properly. As a history student I do remember a sad part of our past, sharing it below do ponder over it.

सन 1757 में जब पलासी का युद्ध लड़ा जा रहा था तो नवाब की सेना में जितने योद्धा थे उस से कहीं ज्यादा बग़ावती लोग, युद्ध के मैदान के बाहर खड़े होकर अंग्रेजों के हाथों उनकी होती हार का तमाशा देख रहे थे और तालियाँ बजा रहे थे। इतिहास गवाह है उस युद्ध में हुई हार ने भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने के लिए विवश कर दिया।
आज भी वैसे लोग या कहें उनके वंशज हमारे समाज मे मौजूद हैं, जो वोट देने के लिए बूथ तक तो जाने की ज़हमत नहीं उठाते परंतु बाद में अपनी इस भूल पे बैठ कर पश्चाताप जरूर करते है।

बस इतना ही कहूँगा गोरखपुर वाशियों-

28. जिंदगी ये तेरा वहम!

ये गुमनाम सी डगर,
किस सफर पे बढ़ चले?
ज़िन्दगी भी एक वहम,
ढूंढने जिसे सब निकले।

देख ये अकेला बिंब,
दर्पण में उतरते,
ठहर सा मैं जाता हूँ।
कांधों पे ढूंढते,
उस सलोने चेहरे को,
थोड़ा मुरझा सा जाता हूँ।

उम्मीदों से मोह रखना,
क्या ये भी वाज़िब नहीं?
बैठे बिठाये दुपहरी में,
सितारे जो सजा लेता हूँ।
टुट जाते हैं वो तो,
शिशे सा बिखर जाता हूँ।

दुविधाओं में उलझकर,
तेरे हर जवाब को,
सवाल ही मान लेता हूँ।
और तेरे पीछे पीछे,
फैसलों का ताना बाना
बदस्तूर बुनता रहता हूँ।

अनसुलझी ये पहेली,
क्या लिखूँ तुम्हें,
ऐ परेशां ज़िन्दगी!!!
बस ढूंढते तेरा पता,
अनजान सड़कों पे,
दौड़ा चला जाता हूँ।

~Gouri

27. भावशून्य

उचित है की,
भावशून्य होते मन की व्यथा को,
समेटकर फिर से नई आवाज़ दे दूँ।
लिख दूँ सब कुछ ज़ुबानी,
ले अपनी वो कलम पुरानी,
और कोरे कागज़ की शहादत को,
नामे अल्फ़ाज़-ऐ-जंग से नवाज़ दूँ।

लिखने को तो,
विद्रोही होती अपनी कुण्ठाओं को,
संजोकर संगीतमय वेदों सा रच दूँ।
छेड़ क्षुब्ध मन के तान तांडवकारी,
प्रवाहित कर दूँ शब्द मैं प्रलयंकारी,
और बेसुरे अस्फुट ग्रीवा के गान को,
तीक्ष्ण उष्ण ज्वलंत स्वरों से सींच दूँ।

संभव है की,
सहेजी हुई अपनी इच्छाओं को,
बांधे मृत्यु शैया, साथ लिए चल दूँ।
रोक लूँ हृदय के अविरल स्पन्दन,
तोड़ लूँ सांसों से जीवन का बंधन,
और पीड़ा की इन परकाष्ठाओं को,
सदा के लिये शांत अविचल कर दूँ।

फिर सोचता हूँ,
पत्थर भी बिकते जहां इबादत को,
वहाँ बेच प्रेम, सब चुकता कर दूँ।
मिली है हिस्से अपनी धोखेबाजी,
सो कर लूँ मैं भी थोड़ी सौदेबाज़ी,
और नसीब आये फ़रेबी चाहत को,
नफरत की आग में भस्मात कर दूँ।

परवरदिगारे! दे हौंसला,
की नई उम्मीदों संग मैं फिर से जी लूँ।
आये जो शाम-ए-जिन्दगी कभी
तेरे नाम का अमृत जी भर के पी लूँ।

Camera – नामा ~ 06 (With Captain Cool)

Being hotelier and that to be of a standalone property of its kind in city, gives you certain benefits.

That was a wonderful day and I would say one of the luckiest day of my life, when I got some lovely moments to spend with our own captain cool “MSD”.

And as per the popular beliefs he turned out to be really cool. Have met and seen so many cricketers and celebrities till date but mahi turned out to be totally different.

Love you sir… Will always love to see you playing cricket for our country!!

One of your die hard fan😊😊