उहा पोह (चौथी कड़ी)

अब बोलने की बारी उन दोनों कि थी..

अब आगे..

जी !!जी!! वो हम क्लासेस खत्म होने के बाद यूँही टहलते टहलते यहां आ गए थे, बैठे बैठे थोड़ी देर हो गयी, निकलने ही वाले थे कि अचानक से मौसम का मिज़ाज़ बदल गया। किसी तरह लड़के ने जोर लगा कर कहा।

फिर पुलिस वाले अंकल ने लड़की की तरफ आँखे तरेरी और फूट पड़े।

“घर से तुम लोग कह के निकलते हो कि पढ़ाई करने जा रहे और फिर इधर उधर आवारागर्दी करते फिरते हो, शर्म नहीं आती”

“जी नहीं अंकल ऐसा कुछ नहीं आप हमें गलत समझ रहे हो” लड़की ने कहा।

“हाँ हम पुलिस वाले तो हमेशा गलत ही समझते हैं, हम लोगों ने ऐसे ही खेल खेल में अपने सिर के बाल सफेद नहीं किये हैं, नाम क्या है तुम लोगों का और यहाँ कहाँ रहते हो ”

“जी सर मेरा नाम संध्या है, मैं केशरबाग के भाग्यश्री गर्ल्स हॉस्टल में रहती हूँ और ये राहुल है मेरा दोस्त और क्लासमेट”

“मैं यहीं पास विजयनगर में रहता हूँ”- लड़के ने भी तपाक से जवाब दिया।

अब पुलिस वाले अंकल ने मेरी तरफ देखा, इतनी देर में तो काफी दम भर चुका था सो थोड़ा सहज हो कर बोला मैं गौरव हूँ , लाहोटी कॉलोनी में रहता हूँ। मैं तो अकेला ही यूँही शाम के वक़्त गंगा जी के दर्शन करने चला आया था। मैंने ये अच्छा मौका समझा अपने आप को उनसे अलग दिखाने का।

अपनी राइफल को थोड़ा पीछे उचकाते हुए पुलिस वाले अंकल बोल उठे, ”

तुम सब को जरा भी परवाह है अपने वाल्दैन की, कितनी उम्मीदों से उन्होंने तुम लोगों को यहाँ बड़े शहर में पढ़ने लिखने भेजा है और तुम यहाँ अपना भविष्य बनाने की बजाय ये मटरगश्ती में अपना वक़्त जाया कर रहे।” और तुम्हें उन्होंने संध्या की तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हें जरा भी एहसास है कि शहर का माहौल कितना खराब है, आये दिन कुछ न कुछ वारदातें होती रहती, हम पुलिस वैसे ही परेशान है । सारी जिम्मेदारी हमारी ही थोड़े न है, कुछ तो अपना भी होश रखा करो। कम से कम अपना नहीं तो अपने माँ बाबू जी का ही ख्याल रख लिया करो। उन्होंने तुम पर विश्वास कर के ही इतनी दूर भेजा है पढ़ाई लिखाई के लिए, अगर कुछ ऊंच नीच हो गयी तो वो क्या अपने आप को माफ कर पायेंगे।”

शायद पुलिस वाले अंकल के अंदर का सोया हुआ पितृ भाव कहीं न कहीं जाग उठा था। उनकी इन बातों से थोड़ा बहुत अपराध बोध तो हम सब को हुआ, खासकर संध्या को, जो उसके चेहरे पे छलक भी आया था। उसने बड़ी शालीनतापूर्वक जवाब दिया, जी अंकल आप सही कह रहे हैं, आगे से वक़्त का और जगह का ध्यान रखेंगे।

(खैर आज जब इन बातों को याद करता हूँ तो यही सोचता हूँ की आज भी समाज में स्त्री जाति पर कितनी ही बंदिशें लागू है। हर पग पे नई किस्म की पाबंदियाँ और चुनौती। जन्म लेते ही वो एक ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर होती है जिसके अधिकांश फैसले उसके खुद के नहीं होते। और साथ ही साथ परिवार और समाज की मान मर्यादा की गठरी का बोझ भी उसे ही सर पे ढोना है।)

अभी वार्तालाप का दौर थमा ही था कि, मूसलाधार बारिश शुरू हो गई..

(आगे आगले अंक में जारी)

IN URDU

اب آگے

جی !! جی !! وہ ہم طبقات ختم ہونے کے بعد یوںہی ٹہلتے ٹہلتے یہاں آ گئے تھے، بیٹھے بیٹھے تھوڑی دیر ہو گئی، نکلنے ہی والے تھے کہ اچانک سے موسم کا مزاج تبدیل کر دیا. کسی طرح لڑکے نے زور لگا کر کہا.

پھر پولیس والے انکل نے لڑکی کی طرف آنکھیں ترےري اور پھوٹ پڑے.

“گھر سے تم لوگ کہہ کے نکلتے ہو کہ تعلیم حاصل کرنے جا رہے اور پھر ادھر ادھر اواراگردي کرتے پھرتے ہو، شرم نہیں آتی”

“جی نہیں انکل ایسا کچھ نہیں آپ ہمیں غلط سمجھ رہے ہو” لڑکی نے کہا.

“ہاں ہم پولیس والے تو ہمیشہ غلط ہی سمجھتے ہیں، ہم لوگوں نے ایسے ہی کھیل کھیل میں آپ کے سر کے بال سفید نہیں کئے ہیں، نام کیا ہے تم لوگوں کا اور یہاں کہاں رہتے ہو”

“جی سر میرا نام شام ہے، میں كےشرباگ کے بھاگیہ لڑکیوں ہاسٹل میں رہتی ہوں اور یہ راہل ہے میرے دوست اور كلاسمےٹ”

“میں یہیں پاس وجئے نگر میں رہتا ہوں” – لڑکے نے بھی تپاک سے جواب دیا.

اب پولیس والے انکل نے میری طرف دیکھا، اتنی دیر میں تو کافی دم بھر چکا تھا سو تھوڑا آرام دہ ہو کر بولا میں فخر ہوں، لاهوٹي کالونی میں رہتا ہوں. میں تو اکیلا ہی یوںہی شام کے وقت گنگا جی کے درشن کرنے چلا آیا تھا. میں نے یہ اچھا موقع سمجھا اپنے آپ کو ان سے مختلف ظاہر کرنے کا.

اپنی رائفل کو تھوڑا پیچھے اچكاتے ہوئے پولیس اہلکار انکل بول اٹھے، “

تم سب کو ذرا بھی پرواہ ہے آپ والدین کی، کتنی توقعات سے انہوں نے تم لوگوں کو یہاں بڑے شہر میں پڑھنے لکھنے بھیجا ہے اور آپ کو یہاں اپنا مستقبل بنانے کی بجائے یہ مٹرگشتي میں اپنا وقت جایا کر رہے. “اور تمہیں انہوں نے شام کی جانب دیکھتے ہوئے کہا، “تمہیں ذرا بھی احساس ہے کہ شہر کا ماحول کتنا خراب ہے، آئے دن کچھ نہ کچھ وارداتیں ہوتی رہتی، ہم پولیس ویسے ہی پریشان ہے. ساری ذمہ داری ہماری ہی تھوڑے نہ ہے، کچھ تو اپنا بھی ہوش رکھا کرو. کم از کم اپنا نہیں تو اپنے ماں بابو جی کا ہی خیال رکھ لیا کرو. انہوں نے تم پر یقین کر کے ہی اتنی دور بھیجا ہے پڑھائی لکھائی کے لئے، اگر کچھ اونچ نیچ ہو گئی تو وہ کیا اپنے آپ کو معاف کر پائیں گے. “

شاید پولیس اہلکار انکل کے اندر کا سویا ہوا پتر اقتباس کہیں جاگ اٹھا تھا. ان کی ان باتوں سے تھوڑا بہت احساس جرم تو ہم سب کو ہوا، خاص طور پر شام کو، جو اس کے چہرے پہ چھلک بھی آیا تھا. اس نے بڑی شالينتاپوروك جواب دیا، جی انکل آپ صحیح کہہ رہے ہیں، آگے سے وقت کا اور جگہ کی توجہ رکھیں گے.

(ویسے آج جب ان باتوں کو یاد کرتا ہوں تو یہی سوچتا ہوں کی آج بھی معاشرے میں عورت ذات پر کتنی ہی بندشیں لاگو ہے. ہر چھوٹی چپٹی پہ نئی قسم کی پابندیاں اور چیلنج. پیدا ہوتے ہی وہ ایک ایسی زندگی جینے کو مجبور ہوتی ہے جس سب سے زیادہ فیصلے اس کے خود کے نہیں ہوتے. اور ساتھ ہی ساتھ خاندان اور معاشرے کی قدر عزت کی گٹھری کا بوجھ بھی اسے ہی سر پہ ٹوٹی ہے.)

اب گفتگو کا دور تھما ہی تھا کہ، موسلادھار بارش شروع ہو گئی ..

(آگے اگلے شمارے میں جاری)

~Gouri

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उहा पोह (तीसरी कड़ी)

अंधेरी सुनसान सड़क, बारिश होने की पूरी संभावना और ऐसे हालात में एक युगल को देख पुलिस धर्म का जागना तो लाज़िमी ही था। इस वक़्त मैंने उनसे थोड़ी दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझी..

अब आगे..

इसे एक प्रकार की विडम्बना ही कहेंगे कि जिस पुलिस तंत्र की स्थापना आम नागरिकों में सुरक्षा भाव को कायम रखने के लिए किया गया है, उसे देखते ही इस देश की जनता आशंकित हो उठती है। अब यह एक प्रकार का विचारणीय प्रश्न है सरकारी तंत्र और पुलिस विभाग के लिए की आखिर उनकी ऐसी छवि बनी तो कैसे बनी। लगभग कुछ ऐसे ही ज्वलंत सवाल मेरे मस्तिष्क में उस वक़्त भी शोर मचा रहे थे।

तभी भारी भरकम गर्जन भरे स्वर से, दिल अंतरात्मा तो क्या पूरे शरीर के रोंये रोंये सिहर उठे। किसी तरह हिम्मत कर के सर उठाया और एक नज़र पुलिस वाले अंकल पर डाली, वही जानी पहचानी सी डील डौल जो इस उम्र वाले लगभग सभी पुलिस वालों को एक जैसी पंक्ति में लाकर खड़ा कर देती है। उम्र पचास से ऊपर की रही होगी, सर के सफेद होते बाल और मूछें उनकी ढलती उम्र की ओर इशारे कर रही थी। उदर पे थोड़ी चर्बी जरूर इकट्ठा हो गयी थी पर हां एक बात तो थी कि इस उम्र में भी उन्होंने अपने आपको तंदरुस्त बनाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। ऊंची कद काठी और मूछों पे देता ताव उनके व्यक्तित्व पे एक आभा बिखेर रहीं थी। शायद इस उम्र में भी वो अपनी नौकरी तथा कर्तव्यों के लिए पूरी तरह समर्पित थे।

में अभी अपने आप को ठीक ढंग से संभाल भी नहीं पाया था कि वो फिर गरजे “इतने अंधेरे में इस सुनसान जगह पे तुम लोग अभी तक क्या कर रहे हो, वो भी एक अकेली लड़की को साथ में लिए” हालाँकि मैं उन दोनों से हटकर खड़ा था पर इस सवाल के लपेटे में मैं भी आ गया। जी में तो आया की बोल दूं मैं इनके साथ नहीं, और अपना पल्ला झाड़ किसी तरह खिसक लूँ यहाँ से। पर तभी मेरा कोमल हृदय भी मोम की तरह पिघल पड़ा और ये ख्याल आया कि इस तरह इन्हें, ख़ासकर कन्या को इस विकट समस्या में छोड़ भाग खड़े होने से तो पुरुसार्थ का अपमान होगा। मैं बस चुप रहा, इससे मैंने अपने सहयोग का उन्हें सांकेतिक समर्थन दे दिया। अब बोलने की बारी उन दोनों की थी…

(अगले अंक में जारी)

IN URDU

 

اندھیری ویران سڑک، بارش ہونے کا پورا امکان اور ایسے حالات میں ایک جوڑے کو دیکھ پولیس مذہب کا جاگنا تو لازمی ہی تھا. اس وقت میں نے ان سے تھوڑی دوری بنائے رکھنے میں ہی اپنی بھلائی سمجھی

اب آگے

اسے ایک قسم کی بدقسمتی ہی کہیں گے کہ جس پولیس نظام قائم عام شہریوں میں سیکورٹی اقتباس کو قائم رکھنے کے لئے کیا گیا ہے، اسے دیکھتے ہی اس ملک کے عوام خدشہ ہو اٹھتی ہے. اب یہ ایک قسم کا قابل غور سوال ہے سرکاری مشینری اور محکمہ پولیس کے لئے کی آخر ان اس طرح کی تصویر بنی تو کس طرح بنی. تقریبا کچھ ایسے ہی وشد سوال میرے دماغ میں اس وقت بھی شور مچا رہے تھے.

تبھی بھاری بھرکم گرجنے بھرے لہجے سے، دل ضمیر تو کیا پورے جسم کے رويے رويے سہر اٹھے. کسی طرح ہمت کر کے سر اٹھایا اور ایک نظر پولیس اہلکار انکل پر ڈالی، وہی جانی پہچانی سی ڈیل ڈول جو اس عمر والے تقریبا تمام پولیس والوں کو ایک جیسی قطار میں لا کر کھڑا کر دیتی ہے. عمر پچاس سے اوپر کی رہی ہوگی، سر کے سفید ہوتے بال اور موچھے ان ڈھلتی عمر کی طرف اشارہ کر رہی تھی. پیٹ پہ تھوڑی چربی ضرور جمع ہو گئی تھی پر جی ہاں ایک بات تو تھی کہ اس عمر میں بھی انہوں نے اپنے آپ کو تندرست بنائے رکھنے میں کوئی کسر نہیں چھوڑ رکھی تھی. بلند قد کاٹھی اور موچھوں پہ دیتا تاؤ ان کی شخصیت پہ ایک چمک بکھیر رہیں تھی. شاید اس عمر میں بھی وہ اپنی ملازمت اور فرائض کے لئے مکمل طور پر وقف تھے.

میں ابھی اپنے آپ کو مناسب طریقے سے ہینڈل بھی نہیں پایا تھا کہ وہ پھر دھاڑتا “اتنے اندھیرے میں اس ویران جگہ پہ تم لوگ ابھی تک کیا کر رہے ہو، وہ بھی ایک شرم لڑکی کے ساتھ میں لئے” حالانکہ میں ان دونوں سے ہٹ کر کھڑا تھا پر اس سوال کے لپیٹے میں میں بھی آ گیا. جی میں تو آیا کی غزلیں دوں میں ان کے ساتھ نہیں، اور اپنا پلہ جھاڑ کسی طرح کھسک لوں یہاں سے. پر تبھی میرا نرم دل بھی موم کی طرح پگھل پڑا اور یہ خیال آیا کہ اس طرح انہیں، خاص کر کنیا کو اس وکٹ مسئلہ میں چھوڑ بھاگ کھڑے ہونے سے تو پرسارتھ کی توہین گے. میں نے صرف چپ رہا، اس سے میں نے اپنے تعاون کا انہیں علامتی حمایت دے دیا. ابھی بولنے کی باری ان دونوں کی تھی …

(اگلے شمارے میں جاری)

गौरी (gourav anand)

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उहा पोह (दूसरी कड़ी)

गतांक से आगे,

मटमैले पानी के नीचे कुछ भी देख पाना मुश्किल था, हिम्मत कर के झुका ताकि पानी के कुछ छींटे सर पके डाल सकूँ.

इस उत्क्रम से निवृत्त हो पीछे मुड़ पांव में जूतियाँ डाल ही रहा था कि नज़र एक प्रेमी जोड़े पे पड़ गयी। दोनों घाट पे बने कंक्रीट के ऊंचे बांध पर बैठे अपनी ही खयाली दुनिया में मशगूल थे। उनके हाव भाव देखकर ये अंदाज़ा कर पाना जरा भी मुश्किल नहीं रहा कि, उनके इश्क़ का परवान अभी बिल्कुल नया ही चढ़ा था। उम्र के लगभग उसी दौर से मैं भी गुज़र रहा था तो उनके मनोभावों को समझना मेरे लिए थोड़ा आसान था। सारे शहर की भीड़ भाड़ में एक एकान्त स्थान वो भी गँगा के किनारे, इस से बेहतर रमणीय स्थान की परिकल्पना इस प्रेमी युगल ने की भी नहीं होगी। सारे फिक्र गम भूल वो तो बस गलबहियां में व्यस्त थे, और इस भुलावे में उन्हें वक़्त का जरा भी होंश नहीं रहा।

घाट पूरा खाली हो चुका था मेरे अलावा वे दोनों और पास के छोटे मंदिर में संध्या वदन करता हुआ एक पुजारी, बस ईतने ही मौजूद रह गए थे। मैं तो वैसे भी ठहरा भक्त आदमी सो आरती में सामिल हो गया, और फिर मुंह मीठा करना किसे पसंद नहीं। आरती समाप्त होते होते अंधेरा थोड़ा और घना हो गया साथ ही साथ आसमां पे भादों के बादल भी उमड़ने घुमड़ने लगे।

बदले इस मौसम के मिजाज से उनके पेशानी पे सिकन के निशां उभर आये थे जिन्हें मैंने आसानी से ताड़ लिया। अगर बारिश सुरु हो जाती तो वहीँ मंदिर में फंस जाते और अगर निकल भी पड़ते तो बस पड़ाव तक पहुंचते पहुँचते भींगना तय था। बड़ी असमंजस की स्तिथि उत्पन्न हो गयी। क्या करूं क्या न करूं के उधेड़ बुन में वो फँसे ही थे कि, एक पुलिस जीप जो पास से गुज़र रही थी वो ठीक उनके पास आकर रुक गयी।

अब तो हम सब की सिट्टी पिट्टी गुम । जीप में कुल मिलाकर सिर्फ दो ही लोग थे, ड्राइवर सीट पे बैठा व्यक्ति तो वहीँ रहा, पर साथ वाले सीट पे जो बैठे थे वो अपनी राइफल संभालते हुए नीचे उतरे और हमारी तरफ बढ़ने लगे। हमारे चेहरे पे हवाइयाँ उड़ रही थी। खैर मैंने अंदाजा लगा लिया था कि उन्होंने रुकने की जहमत क्यूँ उठायी होगी। अंधेरी सुनसान सड़क, बारिश होने की पूरी संभावना और ऐसे हालात में एक युगल को देख पुलिस धर्म का जागना तो लाज़िमी ही था। इस वक़्त मैंने उनसे थोड़ी दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझी…

(अगले अंक में जारी)

IN URDU

گتاك سے آگے،

مٹمےلے پانی کے اندر کچھ بھی دیکھ پانا مشکل تھا، ہمت کر کے جھکا تاکہ پانی کے چند چھینٹے سر سینکا ڈال سکوں.

اس اتكرم سے نورتت ہو پیچھے مڑ پاؤں میں جوتيا ڈال ہی رہا تھا کہ نظر ایک پریمی جوڑے پہ پڑ گئی. دونوں گھاٹ پہ بنے کنکریٹ کے اونچے ڈیم پر بیٹھے اپنی خیالی دنیا میں مشغول تھے. ان ہاو بھاو دیکھ یہ اندازہ کر پانا ذرا بھی مشکل نہیں رہا کہ، ان کے عشق کا پروان اب نئے برانڈ ہی چڑھا تھا. عمر کے تقریبا اسی دور سے میں نے بھی گزر رہا تھا تو ان کے جذبات کو سمجھنا میرے لئے تھوڑا سا آسان تھا. سارے شہر کی بھیڑ بھاڑ میں ایک تنہا مقام وہ بھی گگا کے کنارے، اس سے بہتر لذت مقام کی پرختیارپنا اس کے پریمی جوڑے نے کی بھی نہیں ہوگی. سارے فکر گم بھول وہ تو بس گلبهيا میں مصروف تھے، اور اس بھلاوے میں انہیں وقت کا ذرا بھی هوش نہیں رہا.

گھاٹ مکمل خالی ہو چکا تھا میرے علاوہ وہ دونوں اور پاس کے چھوٹے مندر میں شام ودن کرتا ہوا ایک پادری، بس يتنے ہی موجود رہ گئے تھے. میں تو ویسے بھی ٹھہرا بکت آدمی سو آرتی میں اضافہ کردیں ہو گیا، اور پھر منہ میٹھا کرنا کسے پسند نہیں. آرتی ختم ہوتے ہوتے سیاہ تھوڑا سا گھنا ہو گیا ساتھ ہی ساتھ آسماں پہ بھادو کے بادل بھی امڑنے گھمڑنے لگے.

بدلے اس موسم کے پیٹرن سے ان پیشانی پہ سكن کے نشاں ابھر آئے تھے جنہیں میں نے آسانی سے کھجور لیا. اگر بارش سر ہو جاتی تو وہیں مندر میں پھنس جاتے اور اگر نکل بھی پڑتے تو صرف پڑاؤ تک پہنچتے پہنچتے بھيگنا طے تھا. بڑی کشمکش کی حیثیت پیدا ہو گئی. کیا کروں کیا نہ کروں کے ادھیڑ بنائی میں وہ پھنسے ہی تھے کہ، ایک پولیس جیپ کو پاس سے گزر رہی تھی وہ ٹھیک ان کے پاس آکر رک گئی.

اب تو ہم سب کی سٹٹي پٹٹي لاپتہ. جیپ میں مجموعی طور پر صرف دو ہی لوگ تھے، ڈرائیور سیٹ پہ بیٹھا شخص تو وہیں رہا، پر ساتھ والے سیٹ پہ جو بیٹھے تھے وہ اپنی رائفل سنبھالتے ہوئے نیچے اترے اور ہماری طرف بڑھنے لگے. ہمارے چہرے پہ ہوائیاں اڑ رہی تھی. ویسے میں نے اندازہ لگا لیا تھا کہ انہوں نے رکنے کی زحمت کیوں اٹھائی ہوگی. اندھیری ویران سڑک، بارش ہونے کا پورا امکان اور ایسے حالات میں ایک جوڑے کو دیکھ پولیس مذہب کا جاگنا تو لازمی ہی تھا. اس وقت میں نے ان سے تھوڑی دوری بنائے رکھنے میں ہی اپنی بھلائی سمجھی …

(اگلے شمارے میں جاری)

~ Gouri

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उहा पोह (पहली कड़ी)

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बात थोड़ी पुरानी है, पर है प्रासंगिक इसलिए ये विचार आया कि इस वाकये को क्यों न लिखा जाए। मैं शहर का नाम नहीं लिखूंगा इसके पीछे भी एक व्यक्तिगत कारण है। खैर चलिए

सुबह से ही रुक रुक कर बारिश हो रही थी, अगस्त का महीना था। हवाओं में रूह तक को गला डालने वाली उमस भरी थी। हर जिंदा वजूद मौसम के इस कहर से परेशान था।

शाम के वक़्त का मिज़ाज़ थोड़ा नरम हो चुका था, अपने किराये के मकान के दलान पर बैठा बैठा यूँही समय को बेवजह तिलांजलि देने में मुझे भी कोई आनंद की अनुभूति नहीं हो रही थी। अचानक पतित पावनी गंगा जी का स्मरण हो आया। दो या ज्यादा से ज्यादा तीन किलोमीटर, यही दूरी रही होगी घर से गंगा तट की। शहर में आये हुए एक साल से ऊपर हो आया था परंतु बमुश्किल से कुछ एक बार ही उधर को जाना हुआ। कहते है ना जब चीज हासिल हो तो उसकी कद्र नहीं रहती।

घड़ी में सुइयाँ शाम के 6 बजाने ही वाली थी पर गर्मी के दिनों में सूर्यास्त वैसे भी देर से ही होती इसलिए आसमां में अस्ताचल सूर्य की लालिमा बिखरी हुई थी। मैंने भी सरपट से कमीज़ चढ़ाई और निकल पड़ा गँगा मैया के दर्शन को। जिस गँगा तट की और मैं निकला वो सबसे पास वाली थी और एन.आई.टी कॉलेज के बिल्कुल पास होने की वजह से छात्रों में बहुत लोकप्रिय भी। कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार तक सड़क काफी चौड़ी थी और छात्रावास पास में होने की वजह से चहल पहल भी अच्छी खासी रहा करती। लेकिन कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर गँगा तट तक जाने वाली सड़क थोड़ी संकरी थी, खैर अब 10 वर्षों में तो बहुत कुछ बदल चुका है कुछ दिनों पहले भी मैं वहाँ गया था, विकासवाद की छाप साफ साफ नजर आने लगी है। सबकुछ बदल चुका है लैंप पोस्ट , रेलिंग, और अब तो गँगा आरती भी होने लगी है।

अंधेरा अब अपने पांव पसारने को आतुर हो चुकी थी, सड़क पे सन्नाटा भी पसर चुका था, इक्के दुक्के लोग ही दिख रहे थे वो भी वही थे जो वापस लौट रहे थे। जब मैं पहुंचा भीड़ लगभग छट चूँकि थी और जो भी बचे थे वो भी जाने को तैयार हो रहे थे। गँगा जी का वो विकराल रूप देख एक बार तो दिल भी सिहर उठा, लहरें तट पे बनी सीढ़ियों पे काफी ऊपर तक चढ़ी हुई थीं कुछ एक ही दिखायी पड़ रही थी। मैन भी बड़े प्रेम से अपनी चप्पल उतारी और एक दो सीढ़ियां पानी में नीचे उतर आया। मटमैले पानी के नीचे कुछ भी देख पाना मुश्किल था, हिम्मत कर के झुका ताकि पानी के कुछ छींटे सर पे डाल सकूँ…

(अगले अंक  में जारी…)

(IN URDU)

بات تھوڑی پرانی ہے، پر ہے متعلقہ اس لئے یہ خیال آیا کہ اس واقعے کو کیوں نہ لکھا جائے. میں شہر کا نام نہیں لکھوں گا اس کے پیچھے بھی ایک ذاتی وجہ ہے. ویسے چلئے

صبح سے ہی رک رک کر بارش ہو رہی تھی، اگست کا مہینہ تھا. ہواؤں میں روح تک کو گلے ڈالنے والی امس بھری تھی. ہر زندہ وجود موسم کے اس قہر سے پریشان تھا.

شام کے وقت کا مزاج تھوڑا سا نرم ہو چکا تھا، آپ کرایہ کے مکان کے دلان پر بیٹھا بیٹھا یوںہی وقت کو بے وجہ بالائے طاق دینے میں مجھے بھی کوئی لطف کے احساس نہیں ہو رہی تھی. اچانک پلٹا پاوني گنگا جی یاد ہو آیا. دو یا زیادہ سے زیادہ تین کلومیٹر، یہی فاصلے رہی ہوگی گھر سے گنگا کے کنارے کی. شہر میں آئے ہوئے ایک سال سے اوپر ہو آیا تھا لیکن بمشکل سے کچھ ایک بار ہی ادھر کو جانا ہوا. کہتے ہے نا جب چیز حاصل ہو تو اس قدر نہیں رہتی.

گھڑی میں سيا شام کے 6 بجانے ہی والی تھی پر گرمی کے دنوں میں غروب ویسے بھی دیر سے ہی ہوتی لہذا آسماں میں غروب سورج کی لالی بکھری ہوئی تھی. میں نے بھی سرپٹ سے قمیض چڑھنے اور نکل پڑا گگا میا کے فلسفہ کو. جس گگا سمندر کی اور میں نکلا وہ قریب ترین والی تھی اور اےنايٹي کالج کے بالکل پاس ہونے کی وجہ سے طالب علموں میں بہت مقبول بھی. کالج کے مرکزی دروازے تک سڑک کافی چوڑی تھی اور ہاسٹل پاس میں ہونے کی وجہ سے چہل پہل بھی اچھی خاصی رہا کرتی. لیکن کالج کے مرکزی دروازے سے لے کر گگا سمندر تک جانے والی سڑک تھوڑی تنگ تھی، ویسے اب 10 سالوں میں تو بہت کچھ بدل چکا ہے کچھ دنوں پہلے بھی میں وہاں گیا تھا، وكاسواد پرنٹ صاف صاف نظر آنے لگی ہے. سب کچھ بدل چکا ہے لیمپ پوسٹ، ریلنگ، اور اب تو گگا آرتی بھی ہونے لگی ہے.

سیاہ اب اپنے پاؤں پھیلانے کو آتر ہو چکی تھی، سڑک پہ سناٹا بھی پسر چکا تھا، اکے دككے لوگ ہی دکھائی دے رہے تھے وہ بھی وہی تھے جو واپس لوٹ رہے تھے. جب میں پہنچا بھیڑ تقریبا چھٹ چونکہ تھی اور جو بھی بچے تھے وہ بھی جانے کو تیار ہو رہے تھے. گگا جی کا وہ بھیانک شکل دیکھ کر ایک بار تو دل بھی ابل اٹھا، لہروں کے کنارے پہ بنی سیڑھیاں پہ کافی اوپر تک چڑھی ہوئی تھیں کچھ ایک ہی دکھائی پڑ رہی تھی. انسان بھی بڑے محبت سے اپنی چپل اتاری اور ایک دو سیڑھیوں پانی میں نیچے اتر آیا. مٹمےلے پانی کے اندر کچھ بھی دیکھ پانا مشکل تھا، ہمت کر کے جھکا تاکہ پانی کے چند چھینٹے سر پے ڈال سکوں

~ Gouri

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