पारुल – एक लघुकथा!

पारुल आ रही थी कुछ दिनों के लिए। यूँ तो दूरस्थ शिक्षा के अंतर्गत सारी पढ़ाई गाँव में ही रहकर करती थी, पर साल में एक बार आना होता ही था, परीक्षाएँ देने के लिए। इस बार स्नातकोत्तर का अंतिम वर्ष था। पारुल मुझसे तो यूँ चार वर्ष छोटी थी, पर हक मुझ पे बिलकुल बराबरी का रखती थी।

“क्या भैया क्या हाल कर रखा है कमरों का, रेगिस्तान की माफ़िक सिर्फ धूल ही धूल है”
“पर्दे कब धोए थे आखिरी बार, चादर कब से नहीं बदली”
“ढंग के कपड़े तो पहना करो, क्या कहते होंगे मोहल्ले वाले भी” बीते वर्षों की वो सारी नोक झोंक और बातें याद आने लगी, यूँ तो हर बार माँ भी आ ही जाती थी साथ में और बीच बचाव का काम उनके हिस्से था, पर इस बार अस्वस्थता के कारण वो नहीं आ पायीं।

पारुल को अहले सुबह स्टेशन से ला, दफ्तर के लिए रवाना हो गया, महीने के अंतिम दिनों की व्यस्तता की वजह से अवकाश मिलने में मुश्किल आ गयी। मुझे लगा था इस बात पे भी पारुल झगड़ेगी मुझसे, पर आश्चर्य हुआ जब उसने कहा “कोई बात नहीं भैया”। पारुल वाकई में समझदार हो गयी थी या फिर अब वो पहले जैसी बात नहीं रह गयी। रास्ते भर यही सब मंथन चलता रहा और निर्णय लिया चाहे जो हो इस बार लड़ाई नहीं होगी बस थोड़े ही दिनों की तो मेहमान है, इतना सोचते ही आँखें सजल हो उठीं।

शाम को घर आया तो वहाँ का नज़ारा देख बस ठगा का ठगा सा ही रह गया, टेबल, अलमिरे और किताबों के ऊपर जमी हुई धूल की मोटी परत गायब थी। हर समान व्यवस्थित हो अपनी जगह पर रखा हुआ मानों अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध कर रहा हो। बुझी हुई रसोई में एक नई चमक बिखरी गयी थी। भीनी भीनी सी खुश्बू का इल्म हो रहा था हवाओं में। माता रानी के दरबार में ज्योत न जाने आज कितने दिनों के बाद प्रज्वलित हुई होगी।

“भैया चाय पी लो, शहर के दूध की चाय में तो कोई जायका ही नहीं और माँ ने कुछ नमकीन भिजवाया है आपके लिए, लो चखो तो जरा” पारुल की आवाज से तंद्रा भंग हुई। उसने तपाक से यह भी पूछ लिया, “रात के खाने में क्या खाओगे भैया, आलू के पराँठे बना दूँ, तुम्हें तो बहुत पसंद है ना”

रात भर मन मस्तिष्क में अजीब सी उथल पुथल मचती रही, नींद का आँखों से कोई सरोकार न रह गया। सुबह पौ फटते ही पारुल को जगाया “छोटी उठ तो, चाय बना दे जरा, सुबह वाली पहली पैसेंजर से गाँव को जा रहा हूँ,”

पारुल हड़बड़ा कर उठ बैठी, क्या हुआ भैया “माँ तो ठीक है ना, मुझे नहीं आना था उन्हें अकेला छोड़कर, तबियत ठीक नहीं थी उनकी” और जोर जोर से रोने लगी।

“अरे पगली शांत हो जा, देर रात तक वापस आ जाऊँगा आज ही।”

“मतलब” पारुल अवाक हो मुझे घूर रही थी।

“माँ को लाने के लिए जा रहा, जैसे यहाँ शहर के दूध का कोई जायका नहीं, उसी तरह तुम दोनों के बिना, मेरी ज़िंदगी का भी कोई जायका नहीं”

पारुल जो आजतलक सिर्फ नोंक झोंक ही करती रही थी, आज गले से लिपट रो पड़ी।

मेरे बढ़ते कदमों के साथ साथ, नयी सुबह के क्षितिज में भास्कर का भी उदय हो चुका था।

Advertisements

Author: Gouri (Gourav Anand)

शब्दों को जोड़ तोड़ कर अपने मन में आये हुए विचारों को लिख डालता हूँ। कोई पेशेवर या उच्च कोटि का कवि या लेखक तो नहीं, हाँ पर साहित्यिक और ऐतिहासिक विचारों से प्रेरित जरुर हूँ। Native of silk city Bhagalpur and feel proud to be from a state which is well known for its historical, political and literary significance. By profession a housekeeper and hotelier, Graduated from IHM Pusa, New Delhi. Apart from Hindi and English well fluent in Urdu, Sanskrit and Maithli. Settled in cleanest city of India. Indore, Madhya Pradesh.

16 thoughts on “पारुल – एक लघुकथा!”

  1. खूबसूरत कहानी।
    परिवार के साथ जीने का मजा ही कुछ और है।माँ जिसके बारे में कुछ भी कहो कम है और बहन कब भाई की बुराई चाहती है।कहा जाए तो नारियां चाहे जिस रूप में हो पुरुषों के लिए भगवान समान है मगर पुरुष भला कब समझे।जिसने समझा उसका घर स्वर्ग और सबके चेहरे पर खिलखिलाहट होती है।

    Liked by 2 people

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s